
by Chitra mali
नेहरू के भारत विजन को लेकर अगर हम नए सिरे से विमर्श कर रहे हैं तो यह उनकी दूरदृष्टिता का ही कमाल है जो हमें सोचने के लिए एक नई और व्यापक दृष्टि प्रदान कर रहा है ।महात्मा गांधी ने 1929 में लाहौर में नेहरू को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने से पहले लोगों से यह कहकर उनका परिचय कराया था कि “ वह निस्संदेह एक चरमपंथी हैं, जो अपने वक्त से कहीं आगे की सोचते हैं, लेकिन वह इतने विनम्र और व्यवहारिक हैं कि रफ़्तार को इतना तेज नहीं करते कि चीज़ें टूट जाएं, वह स्फटिक की तरह शुद्ध हैं, उनकी सत्यनिष्ठा संदेह से परे है. वह एक ऐसे योद्धा हैं जो भय और निंदा से परे हैं,राष्ट्र उनके हाथों में सुरक्षित है।”1
कई असमानताओं और असहमतियों में गांधी-नेहरू एक-दूसरे के बरक्स खड़े दिखते हैं
गांधी और नेहरू के विचारों में काफी अंतर भी है जो उन्हें कभी – कभी एक दूसरे के बरक्स भी खड़ा करता हैं । गांधी राजनीति में धर्म का समावेश करना चाहते थे वही नेहरू इसके विरोधी थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए गांधी जी ने कई धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल किया जिसकी आलोचना नेहरू के द्वारा लगातार की गई|
गांधी के बारे में एक और धारणा प्रचलित थी कि वे आधुनिकता के विरोधी थे और यह भी कहा जाता है कि वे सनातन धर्म से प्रेरणा ग्रहण करते है । वहीं नेहरू आधुनिकता से प्रभावित थे,उसी के साथ साथ वे भारतीय संस्कृति और सभ्यता की एक अलग व्याख्या भी करते है जिसे उनकी किताब “भारत एक खोज” से समझा जा सकता है।
गांधी और नेहरू में कई असमानताओं और असहमतियों को देखा जा सकता है लेकिन भारत देश को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में देखना और सभी धर्मों की साझी विरासत संस्कृति को संजोए रखने का उनका सपना एक था। गांधी ने जिस कांग्रेस पर अपना विश्वास जताया था उसे बरकरार रखने में नेहरु को काफी आंतरिक और बाहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ा था।
नेहरु और अपने बीच मतभेदों के लिए गांधी जी ने 15 जनवरी 1941 को कहा था “कुछ लोग कहते हैं कि पंडित नेहरू और मेरे बीच नाराजगी है लेकिन,हम दोनों को अलग करने के लिए केवल मतभेद काफी नहीं हैं । जब से हमने साथ काम करना शुरू किया है,मतभेद तो हमारे बीच तभी से हैं । इसके बावजूद मैं पहले भी कहता रहा हूं और अब फिर कहता हूं कि जवाहरलाल ही मेरे उत्तराधिकारी होंगे” ।2
जिंदगी की आखरी सांस तक सांप्रदायिकता से लड़ता रहूंगा
1952 के पहले आम चुनाव के बाद प्रसिद्ध भारतीय लेखक नीदर सी.चौधरी ने एक मशहूर पत्रिका में जवाहर लाल नेहरू पर लेख लिखा । अपने लेख में चौधरी लिखते है कि “नेहरू का नेतृत्व भारत की एकता के पीछे की सबसे बड़ी नैतिक शक्ति है । वह सिर्फ कांग्रेस पार्टी के ही नेता नहीं है, बल्कि हिंदुस्तान की जनता के नेता हैं और महात्मा गांधी के सही उत्तराधिकारी हैं”।3
चौधरी के लेख में कही गई बात कई मायनों में महत्वपूर्ण है । भारत का पहला आम चुनाव नेहरू के नेतृत्व में हुआ और वो भी तब जब संसाधनों का पर्याप्त अभाव था और सुदूर क्षेत्रों में पंहुचने के साधन भी नहीं थे । भारतीय आवाम मतदान की प्रकिया से भी अनभिज्ञ थी । आवाम की भारी संख्या को मतदान की प्रक्रिया में प्रशिक्षित करना और चुनाव के महत्व तथा चुनाव की प्रक्रिया लोकतंत्र व लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाए रखने में क्यों आवश्यक हैं इस समझ को विकसित करना भी जटिल कार्य था ।
इस कार्य के लिए तीस हजार सिनेमाघरों में मतदान की प्रक्रिया और मतदाताओं के कर्तव्य पर एक डॉक्युमेंट्री दिखाई गई।ऑल इंडिया रेडियो के माध्यम से लाखों करोड़ों लोगों तक सूचनाएं प्रेषित की गयीं । भारत का पहला आम चुनाव लोकतंत्र को विकसित करने की एक मुहिम के तौर पर देखा जा सकता है जो एक लोकतांत्रिक उत्सव भी था ।
इन चुनावों के समय विभाजन के जख्म भी ताजा थे जिससे सांप्रदायिक संगठनों का प्रभाव आवाम पर आसानी से पड़ सकता था लेकिन नेहरू ने अपने चुनाव प्रचार के भाषणों में “सांप्रदायिकता के खिलाफ एक आर-पार की लड़ाई छेड़ने का आह्वान किया”4
उन्होंने सांप्रदायिक संगठनों की आलोचना की,जो हिंदू और मुस्लिम संस्कृति के नाम पर मुल्क में फिरकापरस्ती फैला रही थी । नेहरू ने कहा कि ये “शैतानी सांप्रदायिक तत्व अगर सत्ता में आ गए तो मुल्क में बर्बादी और मौत का तांडव लाएंगे । लाखों लोगों की जनसभा में नेहरू ने लोगों से आह्वान किया कि “वे अपने दिमाग की खिड़की खुली रखें और पूरी दुनिया की हवा उसमें आने दें”।5
नेहरू ने अपनी विभिन्न जनसभाओं में सांप्रदायिकता को सबसे बड़ा दुश्मन करार दिया और कहा इसके लिए मुल्क में कोई भी जगह नहीं रहने दी जाएगी और हम अपनी पूरी ताकत के साथ इस पर प्रहार करेंगे । उन्होंने आगे कहा कि अगर कोई आदमी किसी दूसरे आदमी पर धर्म की वजह से हाथ उठता है तो मैं सरकार का मुखिया होने के नाते और सरकार से बाहर भी, जिंदगी की आखरी सांस तक उससे लड़ता रहूंगा ।
सांप्रदायिक सौहार्द के लिए नेहरू गांधी के मार्ग पर चलते रहे
दिल्ली में 2 अक्टूबर की दोपहर गांधी जी के जन्मदिन के अवसर पर जनसभा की गई जिसमें नेहरू ने कहा कि “ सरकार छुआछूत और जमींदारी को मिटाने के प्रति कृतसंकल्प है”।6 नेहरू के करिश्माई व्यक्तित्व ने उनकी तार्किक बातों ने लोगों का यकीन जीता और 1952 के पहले आम चुनाव में कांग्रेस भारी मतों से विजयी हुई ।
ये सिर्फ लोगों का यकीन ही था जो गांधी के बाद नेहरू ने हासिल किया था सांप्रदायिक ताकतों से कांग्रेस भी अछूती नहीं थी इसलिए नेहरू को देश में सांप्रदायिक सौहार्द को कायम रखने के लिए अपनी ही पार्टी के नेताओं और पार्टी की आलोचना करनी पड़ी और वे बेखौफ सत्य और अहिंसा के गांधी के मार्ग पर चलते रहे ।
नेहरू ने कई प्रेस वक्तव्य जारी किए जिसमें उन्होंने कहा कि वे इस बात से दुखी हैं कि “सांप्रदायिक और पुनरुत्थानवादी भावनाओं ने धीरे-धीरे कांग्रेस पर हमला कर दिया है और कभी कभी वे सरकार की नीतियों को प्रभावित करने में सफल भी हो जाते हैं । लेकिन पाकिस्तान के विपरीत भारत एक सेक्यूलर राष्ट्र है”।7
कांग्रेस पार्टी में बढ़ते हिंदूकरण के चलते कई युवा नेताओं ने कांग्रेस पार्टी को छोड़कर सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना कर ली । 1951 में गांधीवादी नेता जे.बी.कृपलानी ने भी कांग्रेस पार्टी को छोड़कर ‘किसान मजदूर प्रजा पार्टी’ की स्थापना कर ली ।
सोशलिस्ट पार्टी के नेताओं की तरह ही कृपलानी ने आरोप लगाया कि पुरुषोत्तम दास टंडन के नेतृत्व में कांग्रेस एक अति पुरातनपंथी पार्टी बन गई है ।
आजकल नेहरू पर ये आरोप भी लगाए जा रहे हैं कि वे कांग्रेस के अध्यक्ष फिर से बनना चाहते थे इसलिए वे पुरुषोत्तमदास टंडन की आलोचना कर रहे थे साथ ही ये आरोप भी लगा रहे हैं कि जे.बी.कृपलानी ने नेहरू के कारण पार्टी को छोड़ा जबकि कृपलानी नेहरू की बात की ही पुष्टि कर रहे थे और पुरुषोत्तमदास टंडन को इसका जिम्मेदार ठहरा रहे थे ।
इन सभी घटनाओं के बाद बेंगलोर अधिवेशन में नेहरू पार्टी अध्यक्ष चुने गए और प्रतिक्रियावादी रास्ते पर चल पड़ी पार्टी को एक सर्वसमावेशी और लोकतांत्रिक मार्ग पर चलने वाली पार्टी बनाने के लिए प्रयत्नशील रहे । नेहरू आजीवन सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ लड़ते रहे ।
credible history से साभार