
हिंदुस्तान की कहानी’ पंडित जवाहरलाल नेहरू की सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय कृतियों में से है। यह पुस्तक विश्वविख्यात ‘दि डिस्कवरी ऑव इंडिया’ का अनुवाद है। हम उनकी पुस्तक हिन्दुस्तान की कहानी को धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। उम्मीद है धारावाहिक में छोटे आलेख पाठकों को पसंद आयेंगे और वे इस तरह नेहरू के हिन्दुस्तान को पूरा पढ़ पायेंगे। हमें आपकी प्रतिक्रिया और सुझावों का इंतजार रहेगा ताकि हम और बेहतर कर सकें। आज पुस्तक का चैप्टर चैप्टर :३ : तलाश -भाग ६ : हिंदुस्तान को विविधता और एकता
६ : हिंदुस्तान की विविधता और एकता
हिंदुस्तान में अपार विविधता है; यह जाहिर सी चीज है, यह इस तरह सतह पर है कि कोई भी इसे देख सकता है। इसका ताल्लुक उन भौतिक चीजों से भो है, जिन्हें हम ऊपर-ऊपर देखते हैं और कुछ दिमागो आदतों और स्वभाव से भी है। बाहरी ढंग से देखें, तो उत्तर-पच्छिम के पठान में और धुर दक्खिन के तमिल में बहुत कम ऐसी बाते हैं, जो आपस में समान कही जायेगी। नस्ल के लिहाज से ये जुदा-जुदा है, अगरचे हो सकता है कि दोनों के दरम्यान कुछ ऐसे धागे हो, जो एक-दूसरे को जोड़ रहे हों, सूरत-शक्ल में, खाने-पीने ओर पोशाक में ये जुदा-जुदा है और भाषा में तो है ही। उत्तर-पच्छिम के सरहदी सूबे में मध्य-एशिया की हवा पहुंची हुई है, और यहां के रीति-रिवाज हमें हिमालय के परली तरफ के मुल्कों की याद दिलाते हैं। पठानों के देहाती नाचों में और रूस के करजाकों के नाचों में अद्भुत समानता है। लेकिन इन भेदों के रहते हुए भी इस बात में एक नहीं हो सकता कि पठान पर हिंदुस्तान की छाप है, उसी तरह, जिस तरह कि हम तमिळ पर यह छाप साफ़ तोर पर देखते हैं। इसमें अचरज की कोई बात नहीं, क्योंकि यह सरहदी देश और सच पूछिये, तो अफ़ग़ानिस्तान भी, हजारों बरस तक हिंदुस्तान से मिले रहे हैं। अफ़ग़ानिस्तान में बसनेवाली पुरानी तुर्की कीमें इस्लाम के आने से पहले ज्यादातर बौद्ध थीं, और उससे पहले भी रामायण और महाभारत के जमाने में हिंदू थी। सरहदी प्रदेश पुरानी हिंदुस्तानी तहजीब का एक केंद्र था और आज मी न जाने कितने मठा और इमारतों के खंडहर हमें वहां दिखाई देते हैं; खास तौर से तक्षशिला के विश्वविद्यालय के, जो दो हजार बरस पहले मशहूर हो चुका था, और जहा हिंदुस्तान-मर से और मध्य-एशिया से भी विद्यार्थी पढ़ने आते थे। घर्म की तबदीली ने फ़र्क जरूर पैदा किया था,लेकिन उस हिस्से के लोगों की जो मानसिक दृष्ठभूमि तैयार हो चुकी थी, उसे बदलने में वह नाकामयाब रही।
पठान और त मिळ, दो अलग-अलग सिरों की मिसाले हैं। और लोग इनके बीच में आते हैं। सभी के रूप जुदा हैं, लेकिन जो बात सबसे बढ़कर है, वह यह है कि सभी पर हिंदुस्तान की अपनी छाप है। यह एक दिलचस्प बात है कि बंगाली, मराठा, गुजराती, तमिळ, आंध्र, उड़िया, असमी, कन्नड़, मलयाली, सिथी, पंजाबी, पठान, काश्मीरी, राजपूत और बीच के लोगों का एक बड़ा टुकड़ा, जो हिंदुस्तानी भाषा बोलता है-इन सबने, सैकड़ों वर्षों से अपनी खासियते कायम रखी हैं, और अब भी उनमें वही गण या दोष मिलते हैं, जिनका पता परंपरा और पुराने लेखों से मिलता है। फिर भी इन युगों में वे बराबर हिंदुस्तानी बने रहे हैं, कोमी बपोती के रूप में उन्हें जो कुछ हासिल है और उनके आचार-विचार के आदर्श एक-से हैं। इस बपोतो में कुछ ऐसी जीती-जागती बात है, जिसका पता हमें जिंदगी के मसलों की तरफ उनके फ़िलसफे से लगता है। पुराने चीन की तरह पुराना हिंदु- स्तान एक अलग दुनिया थी। यहां की संस्कृति और तहजीब हर चीज को एक खास शक्ल दे देती थी। विदेशी प्रभाव आते और अकसर इस तहजीब पर अपना असर डालते थे और बाद में उसीमें समा जाते थे। जहां फुट की प्रवृत्तियां दिखाई दीं, वहां समन्वय को कोशिश होने लगती थी। सभ्यता के उषा-काल से लेकर आजतक, हिंदुस्तान के दिमाग में एकता का एक स्वप्न बराबर रहा है। इस एकता की कल्पना इस तरह से नहीं की गई कि मानो वह बाहर से लागू की गई चीज हो, या बाहरी बातों या विश्वासों तक में एक- रूपता आ जाय। यह कुछ और ही गहरी चीज थी; इसके दायरे के भीतर रीति-रिवाजों और विश्वासों की तरफ ज्यादा-से-ज्यादा सहिष्णुता बरती गई है और उनके सभी अलग-अलग रूपों को कुबूल किया गया है और उन्हें बढ़ावा दिया गया है।
एक क़ौम के लोगों के अंदर भी, वे आपस में चाहे जितने नजदीक क्यों न हों, छोटे या बड़े भेद हमेशा देखने को मिल सकते हैं। किसी गिरोह की एकता का अंदाज तब होता है, जब हम उसका मुकाबला दूसरे कौमी गिरोह से करते हैं। अगर दो गिरोह पास-पास के देशों के हुए, तो सरहदी हिस्सों में उनके मेद-भाव कम ओर नहीं के बराबर मालूम देते हैं। यों भी इस जमाने में कौमियत का यह खयाल, जिससे हम परिचित हैं, मौजूद न था। जागीर- दारी, धर्म, जाति और संस्कृति के रिश्तों को ज्यादा महत्त्व दिया जाता था। फिर भी मैं समझता हूं कि हिंदुस्तान के किसी भी जमाने में, जिसका इतिहास अलमबंद हो चुका है, एक हिंदुस्तानी अपने को हिदुस्तान के किसी भी हिस्से में अजनबो न समझता, और वही हिदुस्तानी किसी भी दूसरे मुल्क में अपने को अजनबी और बिदेशी महसूस करता, हां, यकीनी तौर पर वह अपने को उन मुल्कों में कम अजनवी पाता, जिन्होंने उसकी तहजीब और धर्म को अपना लिया था। हिंदुस्तान से बाहर के मुल्कों में शुरू होनेवाले मजहबों के अनुयायी हिदुस्तान में आने और यहां पर बसने के कुछ पोड़ियों के भीतर साफ़ तौर पर हिदुस्तानी बन जाते थे, जैसे ईसाई, यहूदी, पारसी और मुसल- मान। ऐसे हिंदुस्तानी, जिन्होंने इनमें से किसी एक मजहब को कुबल कर लिया, एक क्षण के लिए भी इस धर्म-परिवर्तन के कारण गैर- हिंदुस्तानी नहीं हुए। दूसरे मुल्कों में इन्हें हिंदुस्तानी और बिदेशी समझा जाता रहा, चाहे इनका धर्म वही रहा हो, जो इन दूसरे मुल्कवालां का था।
आज भी, जबकि क़ौमियत का खयाल बहुत बदल गया और तरक्की कर गया है, विदेशों में हिंदुस्तानियों का गिरोह एक अलग गिरोह समझा जाता है और अपने भीतरी मेदों के बावजूद उन्हें एक गिना जाता है। हिंदु- स्तानी ईसाई चाहे जहां जाय, हिंदुस्तानी ही समझा जाता है, और हिंदुस्तानी मुसलमान चाहे तुर्की में हो, चाहे ईरान और अरब में, सभी मुसलमानी मुल्कों में वह हिदुस्तानी ही समझा जाता है।
मैं समझता हूं कि हममें से सभी ने अपनी जन्मभूमि की अलग-अलग तस्वीर बना रखी होगी और कोई दो आदमी एक-सा विचार न रखते होंगे। जब मैं हिंदुस्तान के बारे में सोचता हूं, तो कई बातों का ध्यान आता है- दूर तक फैले हुए मैदानों का, जिन पर अनगिनत छोटे-छोटे गांव बसे हुए हैं। उन शहरों और क्रसबों का, जहां मैं हो आया हूं; बरसात के मौसम के जादू का, जो सूखे और जले हुए मैदानों में जिदगी बिखेरता है और उन्हें अचानक हरियाली और सौंदर्य का और बड़ी और जोर-शोर से बहनेवाली नदियों का प्रदेश बना देता है; खैबर के सुनसान दरें का, हिंदुस्तान के दक्खिनी छोर का और सबसे बढ़कर, बर्फ से ढके हुए हिमालय का, या काश्मीर में बसंत ऋतु में किसी पहाड़ी घाटो का, जिसमें नये-नये फूल फूल रहे हैं और जिसमें पानी के सोते फूटकर गुनगुना रहे हैं। हम लोग अपने पसंद की तस्वीरे बनाते हैं और उनकी हिफाजत करते है। इसलिए बजाय गरम मैदानी हिस्सों के, जो ज्यादा आम हैं, मैंने पहाड़ो मजर पसंद किया है। दोनों तस्वीरें ठीक हैं, क्योंकि हिंदुस्तान उष्ण कटिबंध से लेकर समशीतोष्ण कटिबंध तक और भूमध्य रेखा से लेकर एशिया के ठंडे प्रदेश तक फैला है।
जारी …