
हिंदुस्तान की कहानी’ पंडित जवाहरलाल नेहरू की सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय कृतियों में से है। यह पुस्तक विश्वविख्यात ‘दि डिस्कवरी ऑव इंडिया’ का अनुवाद है। हम उनकी पुस्तक हिन्दुस्तान की कहानी को धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। उम्मीद है धारावाहिक में छोटे आलेख पाठकों को पसंद आयेंगे और वे इस तरह नेहरू के हिन्दुस्तान को पूरा पढ़ पायेंगे। हमें आपकी प्रतिक्रिया और सुझावों का इंतजार रहेगा ताकि हम और बेहतर कर सकें। आज पुस्तक का चैप्टर चैप्टर :३ : तलाश -भाग ७ : हिंदुस्तान की यात्रा
७ : हिंदुस्तान की यात्रा
सन १९३६ के आखिर और १९३७ के शुरू के महीनों में मेरी यात्रा की गति बढ़ी ही नहीं, बल्कि प्रचंड हो गई। इस बड़े मुल्क में, रात-दिन सफ़र करते हुए, मैंने तूफ़ान की तरह चक्कर लगाया। बराबर चलता ही रहता था; मुश्किल से कहीं ठहरता, मुश्किल से दम भारता। सभी तरफ से जरूरी बुलावे थे, और वक्त थोड़ा था, क्योंकि आम चुनाव के दिन निर पर थे और मैं दूसरों के चुनावों को जिता देनेवाला खयाल किया जाता था। मैंने ज्यादा- तर मोटर से और कभी-कभी हवाई जहाज और रेल से सफर किया। कमी- कभी थोड़ा रास्ता तय करने के लिए मैंने हाथी, अंड या घोड़े की भी सवारी की, या अगनबोट, नाव या डोंगी की मदद ली या वाइनिकिल पर सवार हुआ या पैदल भी चल पड़ा। यात्रा के ये जुदा-जुदा और अनोखे साधन बड़े यात्रा-मागों से हटकर देश में पैठने के लिए अकसर जरूरी हो जाते हैं। मैं माइकोफ़ोन और लाउडस्पीकर इन मंत्रों के दोहरे सेंट साथ में रखता था। उनके बिना बड़े-बड़े मजमों में बोलना या अपनी आवाज की हिफाजत कर सकना गैर-मुमकिन हो जाता। ये माइक्रोफोन मेरे साथ-साथ न जाने कितनी अनोखी जगहों में घूमे हैं-तिब्बत की सीमा से लेकर बचिस्तान की सीमा तक जहां इस तरह की कोई चीज इससे पहले देखी या सुनी नहीं गई थी।
सवेरे से लेकर रात में देर तक एक जगह से दूसरी जगह तक मेरी यात्रा का सिलसिला बलता रहता और बड़े-बड़े मजमे मेरे इंतजार में इकट्ठा होते, और इन मजमों के बीच में भी मुझे रुरुना पड़ता, क्योंकि मेरा स्वागत करने के लिए किसान लोग देर से आगरा लगाये बड़े होते थे। चूंकि मुझे इनकी पहले से खबर न होती, इसलिए मेरा सारा प्रोग्राम अस्त- व्यस्त हो जाता, और बाद को, जहां समाजों का निश्चय हुआ होता, वहां मैं देर से पहुंच पाता। फिर भी यह मेरे लिए कैसे मुमकिन था कि इन गरीबों की परवा न करके में आगे बढ़ जाऊं ? इस तरह देर-पर-देर होती रहती। खुले मैदानों में जो सभाएं होती, उनमें बीच तक पहुंचने में कई मिनट लगे जाया करते। एक-एक मिनट की गिनती करना जरूरी था, और ये मिनट इकट्ठा होकर घंटों ले लेते। इस तरह जब शाम होने को आती, तो मैं घंटों पिछड़ा हुआ होता। लेकिन भीड़ सत्र के साथ इंतजार करती होती, गोकि जाड़े के दिन थे और बिना काफी कपड़ों के लोग खुले मैदानों में इंतजार करते हुए कांप जाते थे। इस तरह से हमारा दिन का प्रोग्राम कमी-कमी १८ घंटों का हो जाता और दिन का सफर अकसर आधी रात या इसके बाद खत्म होता। एक बार कर्नाटक में बीच फरवरी में यह हालत अपनी हृद को पार कर गई। हमने अपना रिकार्ड तोड़ दिया। दिन का प्रोग्राम भारी था, और हमें एक बड़े रमणीक पहाड़ी जंगल से होकर गुजरना था। वहां की सड़कें बहुत अच्छी न थी और उन पर तेजी से मफर कर सकना मुमकिन नथा। आधी दर्जन तो बड़ी-बड़ी सभाओं में जाना था और बहुतेरी छोटी- छोटी सभाएं थी। आठ बजे सवेरे से हमारा कार्यक्रम शुरू हुआ। हमारी आखिरी समा चार बजे सबेरे हो पाई। इसे सात घंटे पहले खत्म हो जाना चाहिए था और इसके बाद हमें ७० मील की यात्रा करके उस जगह पहुंचना था, जहां हमारे आराम करने का इंतजाम था। हम ७ बजे वहां पहुंच पाये। रात-दिन में, न जाने कितनी समाएं करने के अलावा हमने ४१५ मील तब किये थे। दिन के काम में २३ घंटे लग गए। एक घंटे के बाद दूसरे दिन का कार्यक्रम शुरू कर देना था।
किसीने यह बंदाज लगाने की तकलीफ की थी कि इन महीनों में कोई एक करोड़ आदमी उन जलसों में आये, जिनमें मैंने व्याख्यान दिए, बऔर सड़कों से गुजरते हुए और कई लाख आदमी मुझसे किसी-न-किसी रूप में संपर्क में आये। सबसे बड़े मजमों में एक लाख आदमी तक मौजूद होते। बीस-बीस हजार के जलसे तो काफी आम थे। कभी-कभी छोटे क्रसबों से होकर गुजरते हुए देखता, और यह देखकर ताज्जुब होता कि सारी दूकानें बंद है और कसबा करीब-करीब सुनसान है। इसका मेद तब सुलता, जब मैं खुली सभा में पहुंचता, जहां कसबे की सारी आबादी, मर्द औरतें, बच्चे तक, सभी मौजूद होते और मेरे पहुंचने का इंतजार करते होते।
बपने जिस्म को कायम रखते हुए मैं यह सब कैसे कर पाया, यह अब समझ में नहीं बाता। जिस्म की बरदाश्त करने की ताकत की यह गैर- मामूली मिसाल थी। मैं समझता हूं कि रफ़्ता-रफ़्ता जिस्म इस सैलानी जिंदगी का आदी हो गया था। दो समाजों के बीच के वक्त में मैं चलती मोटर में ऐसी गहरी नींद में सो जाता कि जगाना मुश्किल होता, लेकिन मुझे उठना ही पड़ता और एक बड़े स्वागत करते हुए मजमे का सामना करना पड़ता। मैंने अपना खाना घटाकर कम-से-कम जितना हो सकता था कर दिया था। कभी-कभी एक वक्त का खाना टाल हो जाता था-खान- कर शाम का, और इसकी वजह से तबीयत हलकी रहती थी। लेकिन जिस बात ने मुझे कायम रहा और याक्ति दी, यह थी वह मुहब्बत और उमंग, जिसे मैंने सब जगह पाया। मैं इसका बादी हो गया था, फिर भी पूरी तरह आदी न हो पाता, क्योंकि रोज किसी-न-किसी नई अचरज की बात का अनुभव होता ही था।
जारी…..