हिंदुस्तान की कहानी:जवाहरलाल नेहरू– चेप्टर3 : तलाश भाग -९ : जनता की संस्कृति

इस तरह में आज की हिदुस्तान की जनता का मार्मिक नाटक देखता था और अकसर मैं उन पानी का पता लगा पाता था, जो उनकी जिदगी को गुजरे हुए जमाने से जोड़ रहे थे, जबकि उनकी निगाहें आनेवाले जमाने की तरफ लगी हुई थी। मैं पाता था कि तहजीब की एक पृष्ठभूमि है, जो उनकी जिंदगी पर गहरा असर डाल रही है। यह पृष्ठभूमि साधारण क्रिउसके, परंपरा, इतिहास, पुराण की और कल्पित कयाओं के मेल-जोल से तैयार हुई थी और इन विविध अंगों को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता था। जो लोग बिलकुल अनपढ़ और अशिक्षित थे, उनकी भी यही पृष्ठभूमि थी। अपने पुराने महाकाव्यों, रामायण और महाभारत में, और दूसरी किताबों से, सुगम अनुवादों या संक्षेपों के जरिये जनता अच्छी तरह परिचित थी। एक-एक घटना और उपदेश उनके मन में टंके हुए थे और इस तरह उनके दिमाग भरे-पूरे थे। अनपढ़ देहातियों को भी सैकड़ों पद जबानी याद थे और उनकी बातचीत में इनके या किसी प्राचीन कथा या उपदेश के हवाले आते रहते थे। मुझे इस बात पर अचरज होता था कि गांव के लोग आजकल की साधारण बातों को साहित्यिक लिबास दे देते थे। अगर मेरे दिमाग में लिखे हुए इतिहास और कमोबेश जाने हुए वाक्यों के चित्र मरे हुए थे, तो मैंने अनुभव किया कि अनपढ़ किसान के दिमाग्र में भी एक चित्र-शाला थी; हां, इसका आधार परंपरा, पुराण की कथाएं और महाकाव्य के नायकों और नायिकाओं के चरित्र थे। इसमें इतिहास कम या, फिर भी चित्र काफ़ी सजीव थे।

मैं उनके जिस्मों और उनकी सूरतों की तरफ देखता और उनके रहने-सहने के ढंग पर गौर करता। उनमें बहुत-सी सूरतें ऐसी थी, जो बातों का जल्द असर लेनेवाली थीं, उनमें हट्टे-कट्टे, सीधे और साफ़ अंगवाले लोग मिलते, और औरतों में अदा और लोच तया शान और समतील होतो और बहुत अकसर उनके चेहरों पर उदासी दिखाई पड़ती। आमतौर पर ऊंची जात के लोगों में, जिनकी माली हालत दूसरों के मुक़ाबले में कुछ अच्छो होती, अच्छे शरीरवाले मिलते। कभी-कभी जब मैं किसी देहाती सड़क या गांव से होकर गुजरता, तो मुझे किसी अच्छे बदन के आदमी को देखकर या रूपवाली स्त्री को देखकर अचरज होता और मुझे पुराने जमाने के दीवालों पर बने चित्रों की याद हो आती। युगों की कुलफत और मुसीबत के बाद भी हिंदुस्तान में आज ऐसे नमूने किस तरह मिल जाते हैं, इस बात पर मुझे हैरत होती। अच्छी हालत में और अच्छे अवसर मिलने पर ये लोग क्या नहीं कर सकते थे ?

गरीबी और गरीबी से उपजी हुई अनगिनत बातें सभी जगह दिखाई पढ़ती थीं और इसके हैवानी पंजे के निशान हर एक माथे पर लगे हुए थे। जिंदगी इस तरह कुचल और मरोड़ दी गई थी कि एक पाप बन गई थी, और दमन और असुरक्षा की हालत ने बहुतेरी बुराइयां पैदा कर दी थी। ये बातें देखने में खुशरावार नहीं हो सकती थी, फिर भी हिंदुस्तान में बुनि- यादी हक़ीक़त यहीं थी। लोग जरूरत से ज्यादा भाग्य पर भरोसा करते थे और जैसी भी बीतती, उसे कुबूल करते थे। साथ हो उनमें एक नरमी और भलमनसी थी, जो हजारों साल की तहजीब का नतीजा थी और जिसे सख्त-से-सख्त बदकिस्मती भी नहीं मिटा पाई थी।

जारी …..

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