हिंदुस्तान की कहानी:जवाहरलाल नेहरू– चेप्टर 3 : तलाश भाग – १० : दो जीवन

१० : दो जीवन

इस तरह और दूसरे तरीकों से भी मैंने प्राचीन और आज के हिंदुस्तान की तलाश की कोशिश की। जिंदा और गुजरी हुई। हस्तियां मुझमें खयाल और जज्बे की लहरें  पैदा करती। उनसे मैं अपने को असर लेने देता। इस न खत्म होने वाले जुलूस में मिलकर उससे एक हो जाने की मैंने कोशिश की, गोया कुछ वक़्त के लिए मैं भी इस जुलूस के बिलकुल पोछे हो लिया और उसके साथ-साथ चलता रहा। इसके बाद मैं अपने को अलग कर लेता और जिस तरह कोई पहाड़ की चोटी पर खड़ा होकर तलह‌टी की तरफ़ झांकता है, उस तरह अलग-अलग होकर मैं इसे देखता।

इस लंबी यात्रा का मक़सद क्या है ? यह न खत्म होनेवाला जुलूस आखिर हमें कहां तक पहुंचायेगा ? कभी-कभी मुझ पर थकान छा जाती और मोह का जादू दूर-सा हो जाता। तब मैं अपने में एक अलहदगी पैदा करके अपनी बचत करता। रफ़्ता रफ़्ता मैंने अपने को इसके लिए तैयार कर लिया था और जो भी अपने ऊपर बीते, उसे अहमियत देना छोड़ दिया था। वा कम-से-कम मैंने ऐसी कोशिश की, और कुछ हदतक उसमें कामयाब भी रहा-गोकि मुझे ज्यादा कामयाबी मिली नहीं, क्योंकि मेरे अंदर जो एक ज्वालामुखी है, वह सचमुच मुझे अलहदा रहने नहीं दे सकता। अचानक मेरे सब रोक-थाम टूट जाते और मेरी अलहदगी खत्म हो जाती।

लेकिन जो अधूरी-सी कामयाबी मुझे मिली वह बड़ी मददगार सावित हुई। काम में लगे रहते हुए, बीच-बीच में मैं अपने को उससे अलग करके उस पर गीर करता। कभी-कभी में घंटा-दो-घंटा वक़्त चुराकर और अपने धंधों को भूलकर दिमागी चुप्पी हासिल करता और एक क्षणके लिए दूसरी ही जिदगी बिताने लगता। और इस तरह, एक ढंग से, ये दो जिंदगियां साथ-साथ चलतीं, एक-दूसरे से जुड़ी हुई और अलग भी।

तीसरा चैप्टर समाप्त ।

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