
हिंदुस्तान की कहानी – हिंदुस्तान की कहानी’ पंडित जवाहरलाल नेहरू की सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय कृतियों में से है। यह पुस्तक विश्वविख्यात ‘दि डिस्कवरी ऑव इंडिया’ का अनुवाद है। हम उनकी पुस्तक हिन्दुस्तान की कहानी को धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। उम्मीद है धारावाहिक में छोटे आलेख पाठकों को पसंद आयेंगे और वे इस तरह नेहरू के हिन्दुस्तान को पूरा पढ़ पायेंगे। हमें आपकी प्रतिक्रिया और सुझावों का इंतजार रहेगा ताकि हम और बेहतर कर सकें। आज पुस्तक का चैप्टर :४ हिंदुस्तान की खोज भाग ९
उपनिषद् उपनिषद्, जिनका समय ईसा से ८०० वर्ष पहले से लेकर है, हमें भारतीय आयों के विचार के विकास में एक कदम आगे ले जाते हैं और यह बडा लंबा कदम है। आयें लोगों को बसे हुए अब काफ़ी समय बीत चुका है और एक पायदार और सुमहाल सभ्यता, जिसमें पुराने और नये का मेल हो चुका है, बन गई है। इसमें आर्यों के विचार और आदर्श प्रभाव रखते है, लेकिन इनको पृष्ठभूमि में पूजा के जो रूप हैं, वे और भी पहले के ओर आदिम है।
वेदों का नाम आदर से, लेकिन एक मोठे व्यंग्य के भाव से लिया जाता है। वैदिक देवताओं से अब संतोष नहीं रह जाता और पुरोहितों के कर्म-कांड का मजाक उड़ाया जाता है। लेकिन अतीत से नाता तोड़ लेने की कोशिश नहीं होती; उसे वह मुकाम समझा जाता है, जहां से तरक्की की मंजिल शुरू होती है।
उपनिषद् छान-बीन की, मानसिक साहस की और सत्य की खोज के उत्साह की भावना से भर-पूर है। यह सही है कि यह सत्य की खोज मोजूदा जमाने के विज्ञान के प्रयोग के तरीकों से नहीं हुई है, फिर भी जो तरीक़ा अश्तियार किया गया है, उसमें वैज्ञानिक तरीके का एक अंश है। हठवाद को दूर कर दिया गया है। उनमें बहुत कुछ ऐसा है, जो साधारण है और जिसका आजकल हम लोगों के लिए कोई अर्थ या प्रसंग नहीं। खास जोर आत्म-बोध या आत्मा-परमात्मा के ज्ञान पर दिया गया है और इन दोनों को मूल में एक ही बताया गया है। बाहरी दुनिया या वस्तु-जगत को असत् नहीं बताया गया है, बल्कि निस्बती तौर पर सत् और भीतरी सत्य का एक पहलू बताया गया है।
उपनविदों में बहुत-सी अस्पष्ट बातें हैं और उनकी मुख्तलिफ़ शरहें हुई हैं। लेकिन ये फ़िलसूफ़ों और विद्वानों के जांच करने की चीजें हैं। आम झुकाव अद्वैतवाद की तरफ़ है और इस सारे नजरिये का जाहिरा मकसद यह मालूम पड़ता है कि उस जमाने की जो आपस की कड़ी बहसें रही है और भेद-भाव रहे हैं, उन्हें कम किया जाय। यह समन्वयं का रास्ता रहा है। जादू-टोने में दिलचस्पी को और इसी तरह दैवी बातों के ज्ञान को बढ़ावा देने से रोका गया है और बिना सच्चे ज्ञान के पूजा-पाठ और कर्म-कांड को फिजूल बताया गया है। कहा गया है-“इनमें लगे हुए लोग अपने को समझदार और विद्वान मानते हुए इस तरह मटकते रहते हैं, जैसे अंबे को अंबा रास्ता दिखा रहा हो और ये अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाते।” वेदों तक को नीचे दर्जे का ज्ञान बताया गया है; भीतरी मन के प्रकाश को ऊंचा ज्ञान कहा है। बिना संयम के फ़िलसफे के ज्ञान की तरफ से होशियार किया गया है और समाज के धंधों और रुहानी बातों में सामंजस्य पैदा करने को बराबर कोशिश की गई है। जिदगी ने जो कर्तव्य और फ़र्ज ऊपर डाले ही, उनका पालन होना ही चाहिए, लेकिन अलहूदगी का भाव रखते हुए, ऐसा कहा गया है।
व्यक्तिगत पूर्णता की नीति पर शायद इतना ज्यादा जोर दिया गया कि सामाजिक दृष्टिकोण को नुकसान पहुंचा। उपनिषदों में कहा गया है कि “आत्मा से बढ़कर कोई चीज नहीं।” यह समझा गया होगा कि समाज में पायदारी आ गई है, इसलिए आदमी का दिमाग व्यक्तिगत पूर्णता का बराबर ध्यान किया करता था और इसकी खोज में उसने आसमान और दिल के सबने अंदरूनी कोनों को छान डाला। यह पुराना हिंदुस्तानी नजरिया कोई संकुचित कोमो नजरिया न था, अगरचे इस बात का जरूर खयाल रहा होगा कि हिंदुस्तान सारी दुनिया का केंद्र है, उसी तरह, जिस तरह कि चीन, पूनान और राम ने अपने बारे में मुख्तलिफ़ वक़्तों में खयाल किया है। महाभारत में कहा गया है- “यह सारा मर्त्यलोक एक परस्पर आश्रित संगठन है।”
जिन सवालों पर उपनिषदों में विचार किया गया है, उनके आधि-भौतिक पहलुओं को समझना मेरे लिए कठित है, लेकिन इन सवालों पर गौर करने का जो ढंग है, उसने मुझ पर असर डाला है, क्योंकि यह हठवाद या अंब-विश्वास का ढंग नहीं है। यह ढंग मजहबी न होकर फ़िलसक्रियाना है। खवालों के कस-बल की, जांच की भावना को ओर दलील की पृष्ठ-भूमि को मैं पसंद करता हूं। बयान के ढंग में कसाव है। यह अकसर गुरु और शिष्य के वोच सवाल-जवाब के रूप में मिलता है, ओर यह अनुमान किया गया है कि उपनिषद् व्याख्यानों के एक तरह की याददाश्त हैं, जिन्हें गुरु ने तैयार किया है या शिष्यों ने टांक लिया है। प्रोफ़ेसर एफ० डब्ल्यू० टामस अपनो किताब ‘दि लीगेसी ऑव इंडिया’ (‘हिंदुस्तान की देन’) में कहते हैं-“उपनिषदों का जो खास गुण है और जिसकी वजह से उनमें इन्सानी दिल काशी है, वह यह है कि उनके लहजे में बड़ा निष्कपटपन है, वह इस तरह का है, मानी दोस्त वापस में किसी गहरे मसले पर सोच-विचार कर रहे हैं।” चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य उनके बारे में इस तरह जोश के साथ कहते हैं-“प्रशस्त बहाना, विचारों की शानदार उड़ान, जांच-पड़ताल की बेधड़क भावना, जिसके पीछे सचाई तक पहुंचने की गहरी प्यास है-इनसे प्रेरित होकर उपनिषदों में गुरु और शिष्य विश्व के ‘खुले हुए रहस्य में पैठते हैं, और यह बात दुनिया की इन सबसे पुरानी पवित्र पुस्तकों को सबसे आधुनिक और संतोष देनेवाली बना देती है।”
उपनिषदों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनमें सचाई पर बड़ा जोर दिया गया है। “सचाई की सदा जीत होतो है. झूठ को नहीं। सचाई के रास्ते से ही हम परमात्मा तक पहुंच सकते हैं।” और उपनिषदों में आई हुई यह प्रार्थना मशहूर है: “असत् से मुझे सत् को तरफ से बत! अंधकार से मुझे प्रकाश की तरफ ले चल। मृत्यु से मुझे अमरत्व की तरफ से चल!”
हमें बार-बार एक बेचैन दिमाग को झांकी मिलती है, ऐसे दिमाग़ की, जो जिज्ञासा और छान-बीन में लगा हुआ है- “किसको आज्ञा से मन अपने विषय पर उतरता है? किसकी आज्ञा से जीवन, जो सबसे पहली चीज है. आगे बढ़ता है? किसकी आज्ञा से मनुष्य में वचन कहते हैं? किस देवता ने आंख और कान दिये हैं?” और फिर वायु शांत क्यों नहीं रहती? आदमी के मन को चैन क्यों नहीं मिलता? क्यों और किसकी खोज में जत बहता रहता है और एक क्षण नहीं करता?” आदमी बराबर एक साहस-पूर्ण यात्रा में लगा हुआ है, उसके लिए बड़ी दम लेना है और न उसकी यात्रा का अंत है। ऐतरेय ब्राह्मण’ में हमारी इस अनंत यात्रा के बारे में एक मंग है और इसके हर श्लोक के आखीर में है- परवेति, चरैवेति” -“हे यामी, इसलिए बहते रहो, चलते रहो।”
इस खोज के बारे में कोई विनय की भावना नहीं है, वैसा बिगर, जैसा धमों में एक सर्व-शक्तिमान परमात्मा के प्रति दिखाया जाता है। यहां हमें मन की परिस्थिति के ऊपर विजय मिलती है। “मेरा शरीर राख हो जायगा और मेरी सस इस चंचल और अमर बायु में मिल जायगी, लेकिन मैं और मेरे कर्मों का अंत नहीं। हे मन इस बात का सदा ध्यान रख !” सवेरे की एक प्रार्थना में सूर्य को इस तरह संबोधन किया गया है- हे देदीप्यमान सूर्य में वही पुरुष हूं. जो तुझे ऐसा बनाता हूं!” कितना ऊंचा आत्म-विश्वास है!
आत्मा क्या है? इसका बयान या इतकी परिमाया सिर्फ नकारात्मक ढंग से हो सकती है- “वह यह नहीं है, यह नहीं है।” या, एक प्रकार से स्वीकारात्मक ढंग से – “तू वह है!” व्यक्तिगत आत्मा परमात्मा के महत् ज्वाल की एक चिनगारी है, जो उससे निकल उसीमें समा जाती है। “जिस तरह से अग्नि अखंड होते हुए भी दुनिया में आकर जिन चीजों को जलाती है, उन्होंके अनुसार अलग-अलग रूप ले लेती है, इसी तरह से अंत रात्मा जिस चोज में प्रवेश करती है, उसीके अनुसार अलग रूप ग्रहण कर शेती है, लेकिन वह खुद बिना किसी रूप के है।” यह अनुभूति कि सब बोडों के मोतर एक हो तत्त्व है, हमारे और उनके बीच के मेद ही हटा देती है और हममें यह भावना पैदा करती है कि इन्सान और प्रकृति के बीच एकता है और यह एकता बाहरी दुनिया की विविधता और अनेकरूपता की तह में है। “जो जानता है कि सभी चीजें आत्मरूप हैं, उसके लिए क्या शोक, क्या भ्रम रह जाते हैं, जबकि वह इस एकता को देखता है?” “हा, जो सभी वस्तुएं उस आत्मा में देखता है और सभी चीजों में आत्मा को देखता है, उससे (आत्मा) वह फिर न छिपेगा।”
भारतीय आर्यों के इस गहरे व्यक्तिवाद और अलहदगी की भावना का इस व्यापक नजरिये के साथ, जो जाति, वर्ग और दूसरे बाहरी और मोतरी मेदों की रुकावटें लांघ जाती है, मिलान और मुकाबला करना दिलचस्प है। यह दूसरी चीज तो एक तरह की आधिभौतिक जनसत्ता है। “बह जो बात्मा को सब चीजों में और सब चीजों में आत्मा को देखता है, फिर किसी जीव को हिकारत से देख ही नहीं सकता।” अगरचे यह महज सिद्धांत की बात थी, फिर भी इसमें शक नहीं कि इसने जिदगी पर असर डाला होगा और उस रवादारी और माकूलपसंदी, मजहबी मामलों में उस आजाद-खयाली, जीने और जीने देने की उस भावना का वातावरण पैदा किया होगा, जो हिंदुस्तानी और चीनी संस्कृति के खास लक्षण हैं। मजहब और संस्कृति के बारे में कोई दबाव नहीं था और इससे एक ऐसी पुरानी और अक्लमंद तहजीब का पता चलता है, जिसके पास दिमाग्री शक्ति का अक्षय खजाना है।
उपनिषदों में एक सवाल है, जिसका बहुत अनोखा, लेकिन मार्के का जवाव दिया गया है। सवाल यह है कि “यह विश्व क्या है? यह कहां से उत्पन्न होता है और कहां जाता है?” और उत्तर है- “स्वतंत्रता से इसका जन्म है, स्वतंत्रता में ही बह टिका है और स्वतंत्रता में ही वह लय हो जाता है।” इसका ठीक-ठीक अर्थ क्या है, मैं नहीं समझ सकता, सिवाय इसके कि उपनिषदों की रचना करनेवालों में स्वतंत्रता के खयाल के लिए बढ़ा जोश या और वे सब कुछ उसी रूप में देखना चाहते थे। स्वामी विवेका-नंद इस पहलू पर हमेशा जोर दिया करते थे।
हमारे लिए यह सहज नहीं कि कल्पना में भी हम अपने को इतने पुराने जमाने में जा बिठायें और उस जमाने के दिमाग्री वातावरण में दाखिल हो सकें। लिखने का ढंग ही कुछ ऐसा है कि हम उसके आदी नहीं। यह देखने में अटपटा और तरजुमे के खयाल से मुश्किल है और इसकी पृष्ठभूमि में जो जिदगी है, वह अब से बिलकुल जुदा है। आज बहुत-सी चीजे हैं, जिनके हम आदी हो गए हैं, इसलिए उन्हें मानकर चलते हैं, अगरचे ये विचित्र हैं और काफी गैर-माकूल है। लेकिन जिन चीजों के हम आदी नहीं हैं, उनका समझना और पसंद करना कहीं ज्यादा कठिन है। लेकिन इन सब मुश्किलों और करीब-करीब दूर हो सकनेवाली रुकावटों के उपनिषदों के संदेशों को चाव और उत्सुकता से सुननेवाले हिंदुस्तान के इतिहास में बराबर मिलते हैं और इन संदेशों ने कौमी दिमाग और चरित्र पर जोरदार असर डाला है।
व्लम फ़ोल्ड का कहना है कि “विरोधी बीद्ध-मत के लिये-दिये हिंदू-विचार का कोई ऐसा खास रूप नहीं है, जिसको जड़ उपनिषदों में न हो।”
कदीम हिंदुस्तानी खयाल ईरान के रास्ते यूनान तक पहुंचा था और इसने वहां के कुछ विचारकों और फ़िलसूफों पर असर डाला था। बहुत बाद में प्लोटिनस ईरानी और हिंदुस्तानी फ़िलसफ़े को पढ़ने के लिए पूरब में आया और उस पर खासतौर पर उपनिषदों के रहस्यवाद का प्रभाव पड़ा। कहा जाता है कि इन विचारों में से बहुत-से प्लोटिनस से संत अगस्टाइन तक पहुंचे थे और उसकी मारफत इन्होंने ओज के ईसाई धर्म पर असर डाला है।’
पिछली डेढ़ सदी में हिंदुस्तानी फ़िलसफे को जो यूरोप ने फिर से खोज निकाला, उसका नतीजा यह हुआ कि यूरोप के फ़िलसूफ़ी और विचारकों पर उसका गहरा प्रभाव पड़ा है। इस सिलसिले में निराशावादी शोपेनहार का कहना अकसर उद्धृत किया जाता है-” (उपनिषदों के) हर एक शब्द से गहरे, मौलिक और ऊंचे विचार उठते हैं और इन सब पर एकऊंबी पवित्र और उत्सुक भावना छाई हुई है. सारे संसार में कोई ऐसी रचना नहीं
जिसका पड़ना… इतना उपयोगी, इतना ऊंचा उठानेवाला हो, जितना उपनिषदों का… (ये) सबसे ऊंचे ज्ञान की उपज हैं… एक-न-एक दिन सारी दुनिया का इन पर विश्वास होकर रहेगा।” और फिर वह लिखते हैं- “उपनिषदों के पढ़ने से मेरी जिदगी को शांति मिली है; यही मेरी
‘रोम्यां रोलां ने विवेकानंद-संबंधी अपनी किताब के परिशिष्ट में ‘शुरू की सदियों में यूनानी-ईसाई रहस्यवाद और उसका हिंदू रहस्यवाद से संबंध’ पर एक लंबा नोट दिया है। वह बताते हैं कि संकड़ों बातों से इसका सबूत मिलता है कि हमारे युग की दूसरी सदी में पूनानी विचार धारा में पूरबी असर मिल-जुल गया था।
मोत के समय की तमकीन बनेगा।” इस पर लिखते हुए मैक्समूलर कहते – “कोपेनहार हरगिज ऐसे आदमी न थे की बहको हुई बातें लिखें, या तथा कथित रहस्यवादी या अधकचरे विचारों पर बाह-वाह करने लगे। और यह कहते हुए न मुझे गर्म या हर मालूम पड़ता है कि वेदांत के बारे में उनका जो उत्साह था, उसमें मैं शरीक हूं और अपनी जिदगी में बहुत-सुस मुझे इससे मदद मिली है और मैं इसका ऋणी हूं।
एक दूसरी जगह जगह मैक्समूलर लिखते। हैं-उपनिषद् वेदांत के। का सोता है, जिसमें इन्सानो सोच-विचार अपनी चोटी पर पहुंच गया जान पड़ता है।” “मेरी सबसे सुमी को घड़ियों वेदांत की किताबों के पड़ने में बोलती हैं। मेरे लिए वे बरे की रोशनी और पहाड़ों की साफ हवा-जैमो है-एक बार समझ में आ जाने पर उनमें कितन। सादगी, कितनी सचाई मिलती है!”
लेकिन शायद उपनिषदों की और उसके बाद की पुस्तक भगवद्गीता को मुक्तकंठ से जैसी तारीफ आयरिश कवि ए०६० जी० डब्ल्यू रमेड) में की है, वैसी दूसरे ने नहीं इस जमाने के लोगों में, मेटे, वर्डस्वर्थ, इनगंन और थोरी में यह ज्ञान और जीवनी-कित कुछ अंशों में मिलेगी बिन जो कुछ भी इन्होंने कहा है और उससे बहुत स्वादा, हमें पूरब के महान आर पवित्र बदी में मिलेगा। भगवद्गीता और उपनिषदों में सभी बातों के बारे में ज्ञान की ऐवी दिव्य पूर्णता मिलती है कि मुझे खयाल होता है रि उनके रचनेवालों ने हजारों भाव भरे पुराने जन्मों में बैठकर ही, उन जन्मों में, जिनमें खाया के लिए और छाया के साथ संपर्व होता रहा है- इतने अधिकार के साथ उन बातों को लिखा है, जिन्हें आत्मा निश्चित समझती है।””
जारी….