हिंदुस्तान की कहानी- चेप्टर ४: हिंदुस्तान की खोज- भाग १०: व्यक्तिवादी फ़िलसाफे के फ़ायदे और नुकसान

कारगर तरक्की हासिल करने के लिए उपनिषदों में तन को चुस्ती और मन को पवित्रता और तन-मन दोनों के संयम पर बराबर जोर दिया गया है।

‘छांदोग्य उपनिषद् में एक विचित्र और दिलचस्प टुकड़ा है-

“सूर्य़ कभी डूबता नहीं, न उदय होता है। जब लोग समझते हैं कि सूर्य हुब रहा है. तब होता यह है कि व वह दिन के अंत तक पहुंचकर महज बदल जाता है और यहां नोचे रात कर देता है और जो कुछ दूसरी तरफ है, उसके लिए बिन कर देता है। जल लोग समझते हैं कि वह सवेरे उगता है, तब वह रात के छोर तक पहुंचकर पलट जाता है और यहां नीचे दिन कर देता है जोर को कुछ दूसरी तरफ है, उसके लिए रात कर देता है। सच बात तो यह है कि वह कभी डूबता नहीं।”

चाहे ज्ञान सीखना हो, चाहे दूसरी ही कामयाबी हासिल करना हो; संयम, तप और कुरबानी जरूरी होती है। किसी-न-किसी तरह की तपस्या का खयाल हिंदुस्तानी विचारधारा का एक अंग है, और ऐसा खयाल न सिर्फ़ चोटी के विचारकों के यहां है, बल्कि साधारण अनपढ़ जनता में फैला हुआ है। हजार बरस पहले यह बात रही है, और आज भी यह बात है, और अगर गांधीजी की रहनुमाई में हिदुस्तान को हिला देनेवाले जनता के आंदोलनों के पीछे जो मनोवृत्ति काम करती है, उसे हम समझना चाहते हैं, तो जरूरी है कि हम इस खयाल को समझ लें।

यह जाहिर है कि उपनिषदों की रचना करनेवालों के विचार, और वह ऊंचे दर्जे का मानसिक वातावरण, जिसमें वे रहते थे, एक छोटे, चुने हुए लोगों के दायरे तक महदूद थे। आम जनता की समझ से ये बिलकुल बाहर थे। ऐसे लोगों की तादाद, जो रचनात्मक काम करते हैं, हमेशा थोड़ी ही होती है। लेकिन अगर बड़ी संख्या के लोगों से उनके विचार मिलते रहे और यह छोटा दल बड़े दल को ऊपर उठाने और उसे बढ़ाने की कोशिश में लगा रहा, इस तरह कि दोनों के बीच की खाई कम हो जाय, तो एक पायदार और तरक़्क़ी करनेवाली संस्कृति पैदा होती है। बिना इस रचनात्मक छोटे दल के सभ्यता का ह्रास होने लगता है। लेकिन इसका ह्रास उस वक़्त भी हो सकता है, जबकि एक रचनात्मक छोटे-दल का बड़े दल से संबंध टूट जाय और कुल मिलाकर समाज की एकता बाकी न रह जाय। ऐसो हालत में छोटा दल अपनी रचना-शक्ति खो बैठता है और बांझ हो जाता है। नहीं तो इसकी जगह पर कोई दूसरी रचनात्मक या जोवनी-शक्ति, जिसे समाज पैदा करे, आ जाती है।

मेरे लिए और ज्यादातर औरों के लिए भी, उपनिषदों के जमाने की तस्वीर सामने लाना और उस वक्त क्या-क्या ताकतें काम कर रही थीं, इनकी जांच-पड़ताल करना मुश्किल है। फिर भी मैं खयाल करता हूं कि मुट्ठी-भर विचारकों और आंख मूंदकर चलनेवाली बहुत बड़ी जनता के बीच गहरे मानसिक भेद के बावजूद उन दोनों के बीच एक लगाव था, कम-से-कम कोई दिखनेवाली खाई नहीं थी। जिस तरह से उस वक़्त के समाज में अलग-अलग दर्ज थे, उसी तरह मानसिक दर्ज भी थे और इन्हें स्वीकार कर लिया गया था और उसका इंतजाम भी कर दिया गया था। इससे समाज में कुछ मेल पैदा हो गया था और झगड़े-फ़िसाद से बचत हो गई थी। उपनिषदों के नये विचार को भी आम लोगों के लिए इस तरह से समझाया जाता था कि वह रायज खयालों से और अंधविश्वासों से मिल-जुल जाता था और इस तरह वह अपने खास मानी की बहुत-कुछ खो बैठता था। समाज में जो दर्जे कायम हो चुके थे, खाएँ नहीं छेड़ा जाता था, बल्कि उनकी हिफाजत की जाती थी। अद्वैतवाद जन्मजहबी मामलों में एकेश्वरवाद की शक्ल ले ली थी, और इससे भी नीची सतह के अक़ीदों और पूजा के तरीकों को न सिर्फ गवारा किया जाता बल्कि यह समझा जाता था कि विकास की एक खास सीढ़ी के लिए मुनासिब भी है। था, यह इस तरह उपनिषदों की विचारधारा आम लोगों में बहुत ज्यादा फैली नहीं और चंद विचारकों और आम लोगों के बीच मानसिक भेद और भी जाहिर हो गया। यक़्त पाकर इसने नई तहरीकों पैदा की। जड़वादी फ़िल सफ़ की, बुद्धिवाद की और अनीश्वरवाद को जबरदस्त लहरें उठीं। और फिर इसके भीतर से बौद्ध-धर्म और जैन-धर्म पैदा हुए, रामायण और महामारत-जैसे प्रसिद्ध संस्कृत महाकाव्य रचे गए, और इनमें एक बार फिर इस बात की कोशिश की गई कि विरोधी मतों और विचार के तरीक़ों में समन्वय किया जाय। लोगों की स्रजन शक्ति, बल्कि स्रजन-बुद्धिवाले थोड़े से लोगों की स्रजन-यशक्ति, इन जमानों में बहुत साफ़ ढंग से सामने आती है और फिर इन थोड़े-से लोगों में और बड़ी जनता के बीच एक लगाव कायम हो गया जान पड़ता है। कुल मिलाकर दोनों मिल-जुलकर आगे बढ़ते हैं।

इस तरह से, एक-एक करके कई जमाने आते हैं, जबकि विचारों और काम के मैदान में, साहित्य में, नाटक में, मूत्तिकला में, इमारतों के तैयार करने में, और हिंदुस्तान की सीमा से दूर संस्कृति, धर्म और उपनिवेशों के फैलाने के साहसी कामों में रचनात्मक कोशिशें फूट पड़ती हैं। इन जमानों में, झगड़े-फ़िसाद के वक़्त आते हैं और इसकी वजह कुछ भीतरी बातें होती हैं और कुछ बाहर से होनेवाली छेड़-छाड़ भी। लेकिन आखिर में यह हालत क़ाबू में आती है और रचनात्मक स्फूत्ति का जमाना फिर लौटता है। ऐसा आखिरी जमाना, जिसमें बहुत तरह के काम हुए, वह शानदार जमाना था, जो ईसा से बाद की चौथी सदी में शुरू हुआ। ईसा के १००० वर्ष बाद तक, या पहले ही, हिंदुस्तान में भीतरी गिरावट के निशान हो जाते हैं, अगरचे पुरानी कलात्मक लहर जारी रहती है, और बहुत सुंदर चीजें तैयार होती रहती हैं। नई जातियां आती हैं, जिनकी भूमिका दूसरी ही होती है और ये हिंदुस्तान के थके हुए दिल और दिमाग़ के लिए एक नया शौक़ ले आती हैं; और इस टक्करका नतीजा यह भी होता है कि नये मसले उठते हैं और उनकी हल की तदवीरें की जाती हैं।

ऐसा जान पड़ता है कि भारतीय-आर्यों के गहरे व्यक्तिवाद ने, आखिरकार, अच्छे और बुरे दोनों ही नतीजे दिखाये, जो उनकी संस्कृति से उपजे । इसने बहुत ऊंचे टप्पे के लोग पैदा किये, और यह बात इतिहास के किसी एक खास जमाने तक महदूद न रही, बल्कि हर एक युग में और बार-बार ऐसा होता रहा। इसने पूरी संस्कृति को एक आदर्शवादी और इखलाकी पृष्ठभूमि दी, जो क़ायम रही और अभी क़ायम है, चाहे हमारे व्यवहार पर ज्यादा असर न डाल रही हो। इस पृष्ठभूमि की मदद से और ऊंचे लोगों की मिसालों के जोर पर उन्होंने समाज को बनावट को कायम रखा, और जब-जब उसके टूटने का अंदेसा हुआ, तब-तब उसे संभाला। उन्होंने सभ्यता और संस्कृति के अचरज पैदा करनेवाले फूल खिलाये, और अगरचे वे ऊंचे दायरों तक महदूद थे, फिर भी हो-न-हो, वे कुछ हदतक जनता में भी फैले। दूसरे मतों और रास्तों के लिए हद दर्जे की रखादारी दिखाकर वे उन झगड़ों को बचाते रहे, जिन्होंने अकसर समाज को टूक-टूक कर डाला है और इस तरह उन्होंने बराबर किसी-न-किसी तरह का समतील बनाये रखा है। एक बड़े संगठन के भीतर, लोगों को अपने पसंद की जिंदगी बसर करने की आजादी देकर, उन्होंने एक प्राचीन और तजुरबेकार जाति के लोगों की बुद्धिमानी दिखाई है। ये सभी कारनामे बड़े मार्क के रहे हैं।

लेकिन इसी व्यक्तिवाद का यह नतीजा हुआ कि इन्सान के समाजी पहलू पर और समाज के प्रति इन्सान के फ़र्ज पर, कम ध्यान दिया जाने लगा। हर शख्स की जिंदगी बंट और बंब गई थी और दर्जी में बंटे हुए समाज में अपने तंग दायरे के अंदर वह फ़जों और जिम्मेदारियों की एक गठड़ी बनकर रह गया था। पूरे समाज की न उसे कल्पना थी, न इस समाज के प्रति उसका कोई फ़र्ज बाक़ी रहा था और न इस बात की कोई कोशिश की गई कि वह समाज से अपनी मजबूती समझे। इस खयाल का शायद मौजूदा जमाने में विकास हुआ है और यह किसी क़दीम समाज में नहीं मिलता। इसलिए क़दीम हिंदुस्तान में इसकी उम्मीद करना मुनासिब नहीं। फिर भी व्यक्तिवाद, अलहदगी और दर्जेवार जातें हिंदुस्तान में बहुत ज्यादा नुमायां रही हैं। बाद के जमानों में तो ये हमारे लोगों के दिमाग़ के लिए एक पूरा कैदखाना वन गई हैं-न सिर्फ नीची जात के लोगों के लिए, जिन्हें इससे सबसे ज्यादा तकलीफ़ पहुंची, बल्कि ऊंची जात के लोगों के लिए भी। हमारे इतिहास के पूरे दौर में यह हमें एक कमजोर करनेवाली बात रही है, और शायद यह भी कहना बेजान होगा कि ज्यों-ज्यों जात-पांत की सख्ती बढ़ी है, त्यों-त्यों हमारे दिमाग भी जड़ होते गए हैं और हमारी जाति की रचनात्मक शक्ति मिटती गई है।

एक और अजीब बात सामने आती है। सभी तरह के अहीदों और व्यवहारों, अंधविश्वासों और बेवकूफियों के प्रति जो रवादारी दिखाई गई थी, उसके नुकसानदेह पहलू भी थे, क्योंकि इसने बहुत-सी बुरी रसमा की जड़ पकड़ लेने दी और परंपरा के उस बोझ को उखाड़कर फेंकने से रोका, जो हमारी बाढ़ को रोक रहा था। पुरोहितों के बढ़ते हुए दल के इस हालत से अपना अलग ही फ़ायदा उठाया और आम लोगों के अंधविश्वास की नीत्र पर अपने स्वार्थों के गढ़ बना लिये। इस पुरोहित वर्ग की शायद उत्तनी ताकत कभी नहीं रही, जितनी ईसाई मजहब की कुछ शाखों के पुरोहित-वर्ग की रही, क्योंकि यहां हमेशा कुछ-न-कुछ ऐसे विचारवान नेता रहे हैं, जिन्होंने इन व्यवहारों की निदा की है। इसके अलावा इतने अलग-अलग मत रहे हैं कि लोग अपना मत बदल सकते थे। फिर भी यह पुरोहित-वर्ग इतना मजबूत था कि जनता को अपने वश में रख सके और उसके अंधविश्वासों से लाभ उठाता रह सके।

इस तरह से, आजाद खयाल और कट्टरपन, ये साथ साथ बने रहे और उनमें से नुक्ताचीनी करनेवाले मजहबी फ़िलसफ़े और आचार-विचार-वाले कर्म-कांड पैदा हुए। पुराने धर्म-ग्रंथों के प्रमाण की दुहाई बराबर दी जाती थी, लेकिन उनकी सचाइयों को बदलते हुए जमाने के लिहाज से पेण करने की कोई कोशिश नहीं की जाती थी। रचनात्मक और रूहानी शक्तियां कमजोर पड़ने लगीं और उस चीज का, जिसमें इतनी जान थी, इतना अर्थ था, केबल छिलका बाकी रह गया। अरविंद घोय ने लिखा है- “अगर उप-निषदों या बुद्ध के जमाने का, या बाद के संस्कृत-युग का कोई पुराना हिंदु-स्तानी आज के हिंदुस्तान में ला बिठाया जाय, तो वह देखेगा कि उसकी जाति पुराने वक़्त के बाहरी रूपों, छिलकों और चीथड़ों से चिपटी हुई है और उसके ऊंचे मतलब के दस हिस्सों में से नौ को खो बैठी है… उसे अचरज होगा कि यहां इतना दिमागी लचरपन, इतनी जड़ता है, बातों का इस तरह दोहराते रहना है, जो हमें आगे नहीं बढ़ाता; विज्ञान का खात्मा हो गया है, कला बहुत दिनों से बांझ हो रही है और रचनात्मक बुद्धि कितमी कमजोर हो गई है।”

जारी….

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *