
हिंदुस्तान की कहानी – हिंदुस्तान की कहानी’ पंडित जवाहरलाल नेहरू की सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय कृतियों में से है। यह पुस्तक विश्वविख्यात ‘दि डिस्कवरी ऑव इंडिया’ का अनुवाद है। हम उनकी पुस्तक हिन्दुस्तान की कहानी को धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। उम्मीद है धारावाहिक में छोटे आलेख पाठकों को पसंद आयेंगे और वे इस तरह नेहरू के हिन्दुस्तान को पूरा पढ़ पायेंगे। हमें आपकी प्रतिक्रिया और सुझावों का इंतजार रहेगा ताकि हम और बेहतर कर सकें। आज पुस्तक का चैप्टर :४ हिंदुस्तान की खोज भाग ११ : जड़वाद
हमारी बड़ी बदक़िस्मतियों में एक यह है कि हम यूनान में, हिंदुस्तान में और सभी जगह दुनिया के पुराने साहित्य का एक बड़ा हिस्सा खो बैठे हैं। शायद इससे बचत न थी, क्योंकि शुरू में किताबें ताड़-पत्रों पर या भोज-पत्र पर, जो मूर्ज वृक्ष की छाल होता है-लिखी जाती थीं और इनके छिलके बहुत आसानी से उचड़ जाते थे और कागज पर लिखने का रिवाज बाद में हुआ। किसी भी किताब की चंद प्रतियों से ज्यादा न होतीं और अगर वे नष्ट हो जातीं, तो वह रचना ही गुम हो जाती और उसका पता हमें महज उन हवालों या या उद्धरणों से मिलता, जो उसके बारे में और पुस्तकों में होते। फिर भी पचास-साठ हजार संस्कृत को हाथ की लिखी पुस्तकों या उनके रूपांतरों का पता लग चुका है और उनकी सूची बन चुकी है और नये-नये ग्रंथ बराबर मिलते जा रहे हैं। हिंदुस्तान की बहुत-सी पुरानी पुस्तकें अबतक हिंदुस्तान में मिली ही नहीं हैं, लेकिन उनके अनुवाद चीनी या तिब्बती भाषा में मिले हैं। हाथ की लिखी पुरानी पुस्तकों की धार्मिक संस्थाओं के भंडारों में, मठों में और निजी संग्रहों में अगर संगठित रूप में खोज की जाय, तो शायद बहुत अच्छा नतीजा निकले। यह काम, और हाथ की लिखी इन किताबों को छान-बोन करने का काम, और अगर जरूरी समझा जाय, तो इनके छपाने और अनुवाद का काम, ऐसी बातें है, जिन्हें और बातों के साथ-साथ उस वक़्त हाथ में लेना है, जब हम अपनी मौजूदा बेड़ियों को तोड़ने में कामयाब हो जायें। इस तरह का अध्ययन यक़ीनी तौर पर हिंदुस्तान के इतिहास के बहुतेरे पहलुओं पर रोशनी डालेगा, खासकर तारीखी घटनाओं और बदलते रहनेवाले विचारों की सामाजिक पृष्ठभूमि पर। बार-बार के नुकसान और बरबादी के बाबजूद और बगैर किसी खास-संगठित कोशिश के पंचास हजार से ज्यादा हाय को लिखो पुस्तकों का पता लग जाना इस बात को बताता है कि साहित्य, नाटक फ़िलसफ़े और और विषयों में पुराने जमाने में कितनो अद्भुत बहुतायत से रचनाएं हुई थीं। बहुत-सी पांडु लिपियों की, जिनका पता लगा है, अभी ठीक तरह से जांच तक नहीं हुई है।
उन किताबों में, जो बिलकुल खो गई हैं, जड़वाद का पूरा साहित्य है, जो शुरू के उपनिवदों के जमाने से ठीक बाद रचा गया था। इस साहित्य के जो हवाले अब मिलते हैं, वे सिर्फ उन किताबों में हैं, जिनमें उन पर टीका-टिप्पणी की गई है और जिनमें जड़वादी सिद्धांतों के खंडन की लंबी कोशिश की गई है। इसमें तो कोई शक हो नहीं है कि जड़वादी फ़िलसफ़े का हिंदुस्तान में सदियों तक चलन रहा है और अपने जमाने में इसका लोगों पर गहरा असर रहा है। ईसा से पहले को चौथी सदी में राजनैतिक ओर आर्थिक संगठन के बारे में कौटिल्य की जो मशहूर पुस्तक ‘अर्थशास्त्र’ है उसमें इसका जिक्र हिंदुस्तान के खास फ़िलसफ़ों में किया गया है।
इसलिए इस फ़िलसफे के बारे में जानने के लिए हमें उन आलोचकों और व्यक्तियों पर भरोसा करना पड़ता है, जिनकी दिलचस्पी इसे गिराने में रही है और उन्होंने इसकी हँसी उड़ाई है और बताया है कि यह कैसी बेतुकी चीज है। यह फ़िलसफ़ा था क्या, इसे जानने का यह बड़ा गैर-वाजिव तरीका है। फिर भी इसके खंडन में जो उत्साह और जोश इन मुक्ताचीनों ने दिखाया है, उत्तोसे पता चलता है कि उन लोगों की नजरों में इसकी कितनी अहमियत थी। संभव जान पड़ता है कि जड़वाद के साहित्य का ज्यादा हिस्सा, बाद के जनानों में, पुरोहितों ने या कट्टर मजहब के माननेवालों ने नष्ट कर दिया हो।
जड़वादियों ने विचार, मजहब और अध्यात्म में प्रमाण का और सभी निहित स्वार्थ का विरोध किया। उन्होंने बेदों की, पुरोहिताई की परंपरा से आये हुए यक़ीनों की निदा की और यह ऐलान किया कि अक़ीदे को आजाद होना चाहिए और उसे पहले से मान ली गई बातों या सिर्फ पुराने जमाने के प्रमाण का भरोसा न कर लेना चाहिए। सभी तरह के मंत्र-तंत्र और अंब-विश्वास की उन्होंने बुराई की। उनका आम रवैया बहुत-कुछ आज के जड़-बादिय। जैसा था- ये अपने को गुजरे हुए जमाने की जंजीरों और बोझ से, जां चोजें नहीं दिखाई देतीं, उनकी कल्पना से और खयाली देवताओं की पूजा से आजाद करना चाहते थे। सिर्फ उसका वजूद तो माना जा सकता था, जिसे कि संत्धे-सीधे देखा जा सके। इसके अलावा और सभी अनुमानों या क़यासों के सच होने की उतनी ही संभावना थो. जितनी कि झूठ होने की। इसलिए अपने मुख्तलिफ़ रूपों में पदार्थ के और दुनिया के हो वजूद को माना जा सकता था। मन और बुद्धि और और सभां चीजें इन्हीं बुनियादी तत्त्वों से बनी हैं। प्रकृति के व्यापार आदमी के जरिये क़ायम की गई क़ीमतों की परवाह नहीं करते और अच्छे या बुरे से उन्हें कोई प्रयोजन नहीं रहता। नैतिक मान आदमियों के कायम किये गए रिवाज हैं।
इन सब विचारों को हम समझते हैं; ये दो हजार बरस पुराने नहीं, बल्कि कुछ अजीब तौर पर हमारे जमाने के विचार जान पड़ते हैं। इस तरह के शक़-व-शुबहे के विचार, ऐसी कश-मकश, इन्सानी दिमाग की परंपरा के खिलाफ़ यह बगावत, आखिर आई कहां से ? हम उस जमाने के सामाजिक और राजनैतिक हालात ठीक तौर पर नहीं जानते, लेकिन यह बात काफ़ी जाहिर है कि यह जमाना राजनैतिक संघर्ष और समाजी उथल-पुथल का रहा है, जिसका नतीजा यह हुआ है कि मजहब से यक्तीन उठ गया है और लोग दिमाग्री जांच-पड़ताल में लगे हैं और खोज किसी ऐसे रास्ते से की हुई है। जिससे मन की संतोष मिले। इसी दिमासी उथल-पुथल और समाजा अबतरी से नये रास्ते निकले हैं और नये फिलसफ़ों ने शक्ले अख्तियार की है।
उपनिषदों के सहज-ज्ञान से जुदा बाकायदा फ़िलसफों का दिखाई पड़ना शुरू होता है, और ये अनेक रूपों में जैन, बौद्ध और जिसे हम दूसरे शब्दों के अभाव से हिंदू कहेंगे-सामने आते हैं। इसी जमाने के महाकाव्य हैं और भगवद्गीता भी इसी जमाने की चीज है। इस जमाने का काल-क्रम ठीक-ठीक मुर्कारर कर सकना मुश्किल है, चूंकि विचार और सिद्धांत एक-दूसरे पर छाये हुए थे और आपस में उनकी क्रिया-प्रतिक्रिया होती रहती थी। बुद्ध ईसा से पहले की छठी सदी में हुए हैं। इनमें कुछ का विकास उनसे कब्ल हुआ, कुछ का बाद में, या अकसर इन दोनों के विकास साथ-साथ चलते रहे।
बोद्ध-धर्म के उदय के लगभग फ़ारसी-साम्राज्य सिघ नदी तक फैला हुआ था। एक बड़ी ता ताक़त के हिंदुस्तान की ठीक सीमा तक आ जाने ने लोगों के विचारों पर असर डाला होगा। ईसा से पहले की चौथी सदी में सिकंदर का उत्तर-पच्छिम हिंदुस्तान पर थोड़े वक़्त का धावा हुआ। यह वजात खुद तो कुछ ऐसी अहमियत नहीं रखता, लेकिन यह बड़े मार्के की तबदोलियों का पेशरी अग्रदूत था। सिकंदर की मौत के क़रीब-करीब ठीक बाद चंद्र-गुप्त ने आलीशान मोर्य सल्तनत बनाकर खड़ी की। इतिहास की नजर से हिंदुस्तान में यह पहला दूर-दूर तक फैला हुआ केंद्रीय राज्य था। परंपरा इस तरह के बहुत-से हाकिमों और अधिपतियों की चर्चा करती है, और एक महाकाव्य में हिंदुस्तान के आधिपत्य के लिए युद्ध होने का हाल दिया है। यहां मक़सद शायद उत्तरी हिंदुस्तान से है। लेकिन ज्यादा संभव यह है कि क़दीम हिंदुस्तान क़दीम यूनान की तरह छोटी रियासतों का एक गिरोह था। बहुत-से गणराज्य थे, और इनमें से कुछ का बड़ा विस्तार था; छोटी-छोटो रियासतें भी थीं, इनके अलावा, लावा, यूनान की तरह यहां शहरी रियासतें भी थीं और इनमें सौदागरों के जबरदस्त संघ थे। बुद्ध के जमाने में बहुत-से गण-राज्य थे और मध्य और उत्तरी हिंदुस्तान में (जिसमें अफ़ग़ानिस्तान का एक भाग, गंवार, भी था) चार बड़े राज्य थे। संगठन जैसा भी रहा हो, शहरी या गांव को खुद-अख्तियारी की परंपरा बड़ी मजबूत थी, और उस हालत में भी, जब किसी का आधिपत्य मान लिया जाता था, रियासत के अंदरूनी इंतजाम में कोई बाहरी दखल न देता था। यहां एक किस्म का आदिम लोकतंत्र था, अगरचे यूनान की तरह यहां भी यह ऊंचे वर्ग के लोगों तक महदूद थी।
क़ीम हिंदुस्तान और क़दीम यूनान बहुत-सी बातों में एक-दूसरे से बहुत मुख्तलिफ़ रहे हैं, फिर भी इनमें इतनी ज्यादा बातें ऐसी हैं, जो आपस में एक-सी हैं कि मेरा खयाल होता है कि इनकी जिंदगी की पृष्ठभूमि बहुत मिलती-जुलती रही होगी। पेलोपोनीसियन युद्ध का, जिसने एथेन्स के लोकतंत्र का खात्मा किया, कुछ बातों में कदीम हिंदुस्तान के बड़े युद्ध, महामारत, से मुकाबला हो सकता है। यूनानी सभ्यता और आजाद शहरी रियासतों की नाकामयाबी ने संदेह और निराशा के भाव पैदा किये और इससे लोग रहस्यों और करिश्मों के पीछे पड़े और जाति के आदर्श गिरने लगे। बाद में फ़िलसफे के नये मतों-स्टोइक’ और एपिक्यूरियन का विकास हुआ।
जरा-सी और कमी-कभी परस्पर विरोधी सामग्री की बिनाह पर ऐति-हासिक तुलनाएं करना खतरनाक और मुलावे में डालनेवाली बात हो सकती है। लेकिन हिंदुस्तान में महाभारत की लड़ाई के बाद का जमाना, जबकि मानसिक वातावरण बड़ा अस्त-व्यस्त हो गया था, हमें यूनान के उस जमाने की याद दिलाता है, जब यूनानी संस्कृति का अंत हो गया था। आदों में पस्ती आ गई थी और नये फ़िलसफ़ों की तलाश थी, राजनैतिक और आर्थिक दृष्टि से भीतरी तबदीलियां होती रही होंगी, जैसे गणराज्यों और शहरी रियासतों का कमजोर हो जाना और केंद्रीय राज्यों की तरफ रुझान होना।
लेकिन यह मुक़ाबला हमें बहुत दूर नहीं ले जाता। दरअसल यूनान इन धक्कों से कभी संभला नहीं, अगरचे यूनानी सभ्यता कुछ और सदियों तक भूमध्यसागरीय प्रदेश में बनी रही और उसने रोम और यूरोप पर अपना असर डाला। हिंदुस्तान अद्भुत रूप से संभला और महाकाव्यों और बुद्ध के जमाने के बाद के एक हजार सालों में रचनात्मक शक्ति की हम बहुतायत पाते हैं। फ़िलसफ़ा, साहित्य, नाटक, गणित और कलाओं में हमें अनगिनत बड़े-बड़े नाम मिलते हैं। ईसवी सन की शुरू की सदियों में मानो स्फूत्ति फूटी पड़ती है और इसका नतीजा यह होता है कि उपनिवेशों के साहसी संगठन होते हैं और ये हिंदुस्तान के लोगों और उनकी संस्कृति को पूर्वी समुद्र के दूर-दूर देशों तक पहुंचाते हैं।
‘इस मत का कायम करनेवाला जेनो नाम का फ़िलसूफ़ था। इस मत के लोग अपने आवेगों को क़ाबू में रखने पर जोर देते थे ।(इस मत का संस्थापक एपीक्यूरस नाम का फ़िलसूफ़ था। बुनिया की चीजों का आनंद लेने के पक्ष में इसकी शिक्षा थी।)
जारी….