
हिंदुस्तान की कहानी – हिंदुस्तान की कहानी’ पंडित जवाहरलाल नेहरू की सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय कृतियों में से है। यह पुस्तक विश्वविख्यात ‘दि डिस्कवरी ऑव इंडिया’ का अनुवाद है। हम उनकी पुस्तक हिन्दुस्तान की कहानी को धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। उम्मीद है धारावाहिक में छोटे आलेख पाठकों को पसंद आयेंगे और वे इस तरह नेहरू के हिन्दुस्तान को पूरा पढ़ पायेंगे। हमें आपकी प्रतिक्रिया और सुझावों का इंतजार रहेगा ताकि हम और बेहतर कर सकें। आज पुस्तक का चैप्टर :४ हिंदुस्तान की खोज भाग १२ : महाकाव्य, इतिहास, परंपरा और कहानी-क़िस्से का शेष—
जांच-पड़ताल के नजरिये क़ौमी परंपरा के बीच टक्कर की एक बहुत हाल की, अहमियत रखनेवाली और भेद प्रकट करनेवाली मिसाल है। हिंदुस्तान के बहुत बड़े हिस्से में विक्रम संवत चलता है। इसका आधार सौर-गिनती पर है, लेकिन महीने चांद के अनुसार गिने जाते हैं। पिछले महीने में, यानी अप्रैल १९४४ में, इस संवत के हिसाब से, दो हजार साल पूरे हुए, और एक नई सहस्राब्दी शुरू हुई। इस मौके पर सारे हिंदुस्तान में उत्सव मनाये गए, और यह उत्सव मनाया जाना वाजिब था, क्योंकि एक तो काल-गणना के खयाल से यह बहुत बड़ा मौक़ा था, दूसरे विक्रम या विक्रमादित्य, जिसके नाम से यह संवत चलता है, बहुत पुराने वक़्त से लोक-परंपरा का एक प्रधान पुरुष रहा है। उसके नाम के साथ अनगिनत कहानियां गुंथी हुई हैं और उनमें से बहुत-सी मध्य-युग में जुदा-जुदा पोशाकों में, एशिया के जुदा-जुदा हिस्सों में पहुंची हैं और बाद में यूरोप में भी।
विक्रम बहुत ज़माने से एक क़ौमी सूरमा और आदर्श राजा समझा जाता रहा है। उसकी याद एक ऐसे शासक के रूप में की जाती है, जिसने विदेशी हमला करनेवालों को मार भगाया। लेकिन उसकी कीति की खास वजह उसके दरबार की साहित्यिक और सांस्कृतिक चमक-दमक है, जहां उसने कुछ बहुत मशहूर कवियों, कलावंतों और गवैयों को इकट्ठा किया था और ये उसके दरबार के ‘नवरत्न’ कहलाते थे। उसके बारे में जो कथाएं हैं, ज्यादातर ऐसी हैं, जिनसे उसकी अपनी प्रजा की मलाई करने की ख्वाहिश जाहिर होती है, और यह कि वह जरा-सी जरूरत पड़ने पर दूसरे को लाभ पहुंचाने के लिए अपने स्वार्थ का त्याग करता था। वह अपनी उदारता, दूसरों की सेवा, साहस और निरभिमान के लिए मशहूर है। वह खासकर इस वजह से लोकप्रिय है कि वह एक अच्छा आदमी, कलाओं का हामी और सरपरस्त समझा जाता था। वह सफल योद्धा या विजेता था, यह बात कहानियों में नहीं प्रकट की गई है। भलाई और आत्म-त्याग पर यह जोर हिंदुस्तानी दिमाग़ और आदर्शों की विशेषता है। सीजर की तरह विक्रमादित्य का नाम एक तरह की पदवी और प्रतीक बन गया और बाद के बहुत-से शासकों ने इसे अपने नामों के साथ जोड़ लिया। इस वजह से गड़बड़ी पैदा हो गई, क्योंकि बहुत-से विक्रमादित्यों का बयान इतिहास में आता है।
लेकिन यह विक्रम था कौन ? और वह कब हुआ ? इतिहास की दृष्टि से यह बात बिलकुल अस्पष्ट है। ईसा से ५७ वर्ष पहले, जब इस संवत का आरंभ होता है, इस तरह के किसी शासक का पता नहीं है। हां, उत्तर हिंदुस्तान में, चौथी सदी ईसवी में एक विक्रमादित्य था, जो हूणों के साथ लड़ा था और जिसने उन्हें मार भगाया था। यही वह व्यवित है, जिसके दरबार में ‘नवरत्नों’ का होना समझा जाता है और जिसके आस-पास ये कहानियां बनी हैं। अब सवाल यह होता है कि चौथी सदी ईसवी के इस विक्रमादित्य का ताल्लुक़्क़ उस संवत से कैसे हो सकता है, जिसका आरंभ इसा से ५७ वर्ष पहले होता है? शायद इसकी व्याख्या इस तरह है कि मध्य-भारत की मालवा रियासत में ५७ ई० पू० से शुरू होनेवाला एक संवत चला आ रहा था, विक्रम के बहुत बाद यह संवत उसके नाम के साथ किसी तरह जुड़ गया और उसका नया नामकरण हुआ। लेकिन ये सभी बातें अस्पष्ट और अनिश्चित हैं।
जो सबसे अचरज की बात है, वह यह है कि काफ़ी समझ-बूझ के हिंदुस्तानियों ने परंपरा के इस वीर-पुरुष विक्रम के नाम के साथ जैसे भी हो,२००० वर्ष पुराने इस संवत को जोड़ने के लिए इतिहास के साथ किस तरीके पर खिलवाड़ किया है। यह बात भी दिलचस्प है कि विदेशी के खिलाफ़ लड़ाई करने पर और एक क़ौमी राज्य के अंतर्गत हिंदुस्तान की एकता कायम करने की इच्छा पर जोर दिया गया है। दरअसल विक्रम का राज्य उत्तरी और मध्य-हिंदुस्तान तक महदूद था।
हिंदुस्तानी ही अकेले नहीं हैं, जिन पर इतिहास के लिखने या उस पर विचार करने में क़ौमी भावनाओं और क़ौमी समझी गई दिलचस्पियों का असर पड़ता हो। हर कौम और सभी लोगों में गुजरे हुए जमाने को ज्यादा अच्छा करके दिखलाने और चमकाने तथा अपने पक्ष में तोड़ने-मरोडने की ख्वाहिश रहती है। हिंदुस्तान के जिन इतिहासों को हममें से बहुतों को पढ़ना पड़ा है, वे ज्यादातर अंग्रेजों के लिखे हुए हैं और जो आमतौर पर ब्रिटिश हुकूमत की तरफदारी में या तो सफ़ाइयां पेश करते हैं, या उसके गुण गाते हैं और उसके साथ-साथ यहां की हजारों बरस पहले होनेवाली घटनाओं का मुश्किल से छिपाई हुई हिकारत के साथ बयान है। दरअसल, उनके लिए मतलब का इतिहास तो हिंदुस्तान में अंग्रेजों के आने के साथ शुरू होता है; उसके पहले जो कुछ हुआ, वह किसी भेद-मरे ढंग से इस दैवी उत्कर्ष की तैयारी में हुआ है। ब्रिटिश जमाने के इतिहास का भी अंग्रेजों के गुणों और अंग्रेजी हुकूमत का बड़प्पन जाहिर करने के लिए, तोड़-मरोड़ किया गया है। बहुत धीरे-धीरे एक ज्यादा सही नजरिया अब बन रहा है। लेकिन इतिहास में अपने मतलब के मुताबिक़ उलट-फेर करने की मिसाल के लिए गुजरे जमाने के इतिहास में पैठने की जरूरत नहीं। आज का जमाना ऐसी मिसालों से भरा पड़ा है, और अगर मौजूदा जमाने की, जिसे हम देख रहे हैं और जिसका अनुभव कर रहे हैं, इस तरह तोड़-मरोड़ हो सकती है, तो गुजरे हुए जमाने के बारे में क्या कहा जाय ? फिर भी यह सच है कि हिंदुस्तान के लोगों में परंपरा और चली आई बात को बगैर पूरी-पूरी जांच-परख के इतिहास के रूप में मान लेने की आदत है। उन्हें इस तरह के शिथिल विचारों से और नतीजों पर पहुंचने के सहज तरीकों से अपने को छुड़ाना पड़ेगा।
लेकिन मैं देवताओं और देवियों की और उन दिनों की चर्चा कर रहा था, जब पुराण के क़िस्सों और कथाओं का आरंभ हुआ था, औरं इस चर्चा से बहुत दूर हट आया। वे ऐसे दिन थे, जब जिंदगी मरी-पूरी थी और प्रकृति के साथ उसका तार-तार मिला हुआ था, जब आदमी का दिमाग़ विश्व के रहस्यों पर अचरज और आनंद से निगाह डालता था, जब स्वर्ग और धरती एक-दूसरे के बहुत क़रीब जान पड़ते थे और देवता लोग तथा देवियां कैलास से, या हिमालय में स्थित अपने धामों से आलिपस के देवताओं की तरह आदमियों और औरतों के बीच खेल करने या कभी-कभी उन्हे दंड देने के लिए उतर आते थे। इस मरी-पूरी जिंदगी और शान-दार कल्पना से कथा-कहानियों का और बली तथा सुंदर देवताओं एवं देवियों का जन्म हुआ, क्योंकि यूनानियों की तरह हिंदुस्तानी भी जिदगो और सौंदर्य के प्रेमी थे। प्रोफेसर गिल्बर्ट मरे हमें ओलिपयन देवी-देवताओं की अपार सुंदरता बताते हैं। उनका बयान हिंदुस्तानी दिमाग़ की शुरू की सृष्टियों के बारे में भी ठीक उतरता है। “वे कलावंतों के सपने, आदर्श और रूपक हैं; वे किसी ऐसी वस्तु के प्रतीक हैं, जो हमसे बाहर की है, वे देवता हैं ऐसी परंपरा के, जो आधी तर्क की जा चुकी है; अनजान में जिनकी कल्पना कर ली गई है; जिन तक हमारी आकांक्षाएं पहुंचती हैं। वे ऐसे देवता हैं, जिनकी उचित सावधानी के साथ अधकचरे फ़िलसूफ़ अनेक उज्ज्वल और दिल को मथनेवाले अनुमानों के प्रसंग में प्रार्थना कर सकते हैं। वे ऐसे देवता नहीं हैं, जिनमें कोई वाक़ये के तौर पर यक़ीन करता हो।”” इसके बाद जो प्रोफेसर मरे कहते हैं, वह हिंदुस्तान पर उतना ही लागू है- “जिस तरह आदमी की गढ़ी हुई सुंदर-से-सुंदर मूर्ति देवता नहीं होती, बल्कि एक प्रतीक होती है, जिसके जरिये देवता की कल्पना हो सके; उसी तरह से खुद देवता, जब उनकी कल्पना की जाती है, तो यथार्थ नहीं बन जाते, बल्कि यथार्थ की कल्पना में मदद करनेवाले केवल प्रतीक होते हैं इस बीच उन्होंने कोई ऐसा मत नहीं चलाया, जो ज्ञान के खिलाफ़ पड़ता हो, कोई ऐसे हुक्म नहीं जारी किये, जिनके कारण कि इन्सान अपनी अंदरूनी रोशनी के खिलाफ़ पाप करता।”
रफ़्ता-रफ़्ता वैदिक और दूसरे देवी-देवताओं के दिन हटकर पीछे पहुंच गए और उसकी जगह कठिन फ़िलसफ़े ने ले ली। लेकिन लोगों के दिमाग़ों में सुख के संगियों और दुःख के साथियों की तरह उनकी अपनी आकांक्षाओं और अस्पष्ट रूप से अनुभव किये गए आदर्शों के रूप में वे मूरतें फिर भी तिरती रहीं और उनके गिर्द कवियों ने अपनी कल्पनाएं लपेटों, और अपने सपनों के घर बनाये और उन्हें अच्छी तरह सजाया। इनमें से बहुत-सी कथाओं और कवियों की कल्पनाओं को एफ० डब्ल्यू ०
‘(यह और इसके बाद का उद्धरण, दोनों गिल्बर्ट मरे की पुस्तक ‘फ़ाइव स्टेजेंज ऑय ग्रीक रिलिजन’ (थिकर्स लाइब्रेरी) पृ० ७६ और बाद के पृष्ठ से लिये गए हैं।)
बेन ने सुंदर ढंग से हिंदुस्तानी कथाओं-संबंधी अपनी किताबों में उतारा है। इनमें से एक ‘डिजिट ऑव दि मून’ में हमें यह बताया गया है कि औरत की सृष्टि कैसे हुई—”शुरू में जब त्वष्टा (विश्वकर्मा) स्त्री की रचना पर आया, तो उसने पाया कि वह अपनी सारी सामग्री आदमी की बनावट में खर्च कर चुका है और ठोस वस्तु तत्त्व बच नहीं रहा है। इस पशोपेश में उसने गहरा सोच-विचार किया और जो किया, वह यह था उसने चांद की गोलाई, लताओं का खम, लता-तंतुओं का चिपटना, दूब का कंपना, नरकुल की नजाकत, फूलों का खिलाव, पत्तियों का हलकापन, हाथी की सूंड का सुडील-पन, हिरनों की नजर, मक्खियों का एकत्र होना, सूरज की किरनों की खुशी, बादलों का रोना, हवा की चंचलता, खरगोश का डर और मोरों का घमंड लिया, फिर सुग्गे की छाती से कोमलता और बज्ञ से कठोरता, शहद की मिठास, चोते की निर्दयता, आग की धधक और बर्फ़ की ठंड, चिटचिटे की चहचहान और कोयल की कूक, सारस का छल और चक्रवाक-चकवे-की वफ़ादारी ली और इन सबको मिलाकर स्त्री को रचा और फिर उसे मनुष्य को दे दिया।”
जारी….