सुभाष चंद्र बोस ने 17 अक्टूबर 1937 को नेहरू को पत्र लिखकर इस विषय पर गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर से मिलने और कांग्रेस का रुख तय करने का सुझाव दिया था। 20 अक्टूबर 1937 को जवाहरलाल नेहरू ने पत्र का जवाब दिया था। पढ़ें नेहरू का जवाब – सं
“वंदे मातरम्” पर नेहरू जी का सुभाष बाबू को पत्र
इलाहाबाद
20 अक्टूबर 1937
मेरे प्रिय सुभाष,
तुम्हारा 17 तारीख का पत्र मिला। जैसा कि तुमने सुझाव दिया है, मैं निश्चित रूप से डॉ. टैगोर से वंदे मातरम् गीत के बारे में चर्चा करूँगा। मुझे नहीं लगता कि कार्यसमिति की ओर से कोई औपचारिक वक्तव्य आवश्यक है, लेकिन हमें अपने विचारों में स्पष्ट होना चाहिए। मुझे आनंदमठ का अंग्रेजी अनुवाद मिल गया है और मैं इस समय उसे पढ़ रहा हूँ, ताकि इस गीत की पृष्ठभूमि को समझ सकूँ।
ऐसा लगता है कि यह पृष्ठभूमि मुसलमानों को उत्तेजित या नाराज़ करने वाली हो सकती है। इसके अलावा भाषा की भी कठिनाई है, जिसे अधिकांश लोग समझते नहीं हैं। मैं स्वयं भी शब्दकोश की सहायता के बिना इसे नहीं समझ सकता।
इसमें कोई संदेह नहीं कि वंदे मातरम् के विरुद्ध वर्तमान शोर-शराबा काफी हद तक साम्प्रदायिक लोगों द्वारा निर्मित है। फिर भी, इसमें कुछ वास्तविक आधार भी दिखाई देता है और साम्प्रदायिक विचारों से प्रभावित लोगों पर इसका असर पड़ा है। हमें जो भी करना है, वह साम्प्रदायिक लोगों की भावनाओं को खुश करने के लिए नहीं हो सकता; बल्कि जहाँ वास्तविक शिकायतें मौजूद हैं, वहाँ उनका समाधान करना हमारा उद्देश्य होना चाहिए।
अब मैंने तय किया है कि मैं 25 तारीख की सुबह कलकत्ता पहुँचूँगा। इससे मुझे डॉ. टैगोर तथा अन्य मित्रों से मिलने का समय भी मिल जाएगा।
जहाँ तक अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रश्न है, मेरे लिए बिना किसी विशेष मामले को जाने कठोरता या नरमी के बारे में सामान्य रूप से कुछ कहना कठिन है। अंततः प्रत्येक मामले को उसकी परिस्थितियों और तथ्यों के संदर्भ में देखना होगा। सामान्यतः चुनावों के दौरान और उसके तुरंत बाद हमारी नीति कड़ी रही थी। लेकिन बाद में कुछ नरमी आई और संबंधित पक्ष द्वारा माफी माँगने पर पहले दिए गए कई आदेशों में संशोधन किया गया।
विशेष रूप से हमने यह माना कि किसी व्यक्ति को चार-आना सदस्यता से वंचित करना केवल अत्यंत विशेष परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए। सामान्यतः दंड पद धारण करने या किसी निर्वाचित समिति की सदस्यता से संबंधित रहा है। यदि किसी व्यक्ति का पिछला रिकॉर्ड अच्छा रहा हो और उसने केवल स्थानीय गुटबाजी तथा चुनावी भावनाओं के कारण चुनाव के समय गलती की हो, तो हमने नरम दृष्टिकोण अपनाने की कोशिश की। उसके माफी माँग लेने पर आगे कोई कार्रवाई नहीं की गई।
लेकिन, जैसा कि मैंने ऊपर कहा, प्रत्येक व्यक्ति के मामले को उसके अपने गुण-दोष के आधार पर देखना होगा। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसी कार्रवाई का भविष्य में कांग्रेस के काम पर क्या प्रभाव पड़ेगा। यदि ऐसी कार्रवाई कांग्रेस के काम को आगे बढ़ाने में सहायक होगी, तो वह की जानी चाहिए। यदि उससे काम में बाधा पड़ने की संभावना है, तो उसे टालना चाहिए। हमारे बहुत से लोग राजनीतिक दृष्टि से इतने विकसित नहीं हैं कि व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विताओं से प्रभावित न हों। इसलिए वे कभी-कभी कांग्रेस के विरुद्ध जाने की वास्तविक इच्छा के बिना भी गलती कर बैठते हैं।
यदि उन्हें अपने साथ बनाए रखना संभव हो और साथ ही कांग्रेस की प्रतिष्ठा तथा अनुशासन भी कायम रखा जा सके, तो ऐसा करना उचित है। यदि किसी अनुशासनात्मक कार्रवाई से कांग्रेस के किसी समूह में व्यापक असंतोष पैदा होता है, तो वह अपने उद्देश्य में विफल हो गई है।
इन सभी बातों को ध्यान में रखना चाहिए। लेकिन अंततः मामले का निर्णय प्रांतीय समिति या उसकी उपसमिति को ही करना चाहिए। मुझे कार्यसमिति या A.I.C.C. द्वारा प्रांतीय निर्णयों में हस्तक्षेप करना बिल्कुल पसंद नहीं है, सिवाय इसके कि निजी सलाह या परामर्श के रूप में मित्रतापूर्ण ढंग से ऐसा किया जाए। बहुत दुर्लभ मामलों में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप आवश्यक हो सकता है। आखिरकार, प्रांत में काम का भार प्रांतीय कांग्रेस समिति को ही उठाना पड़ता है और उसके अधिकार तथा प्रतिष्ठा को कम करने वाला कोई भी कदम उसके साथ न्याय नहीं होगा। इसी कारण हमारे कार्यालय ने ऐसे मामलों में सीधे कोई कार्रवाई नहीं की है और हमने लगातार प्रांतीय कांग्रेस समिति की स्थिति को बनाए रखने का प्रयास किया है। साथ ही हमने संबंधित पक्षों की भावनाओं को शांत करने की कोशिश की है। सामान्यतः हमने अपने पत्रों की प्रतियाँ प्रांतीय कांग्रेस समिति को भेजी हैं। मुझे शरत से यह जानकर आश्चर्य हुआ कि प्रांतीय कांग्रेस समिति के सचिव तुम्हारे कार्यालय के साथ हमारे पत्राचार से उन्हें अवगत नहीं कराते। यह अपने-आप में तुम्हारे कार्यालय में सहयोग की कुछ कमी को दर्शाता है।
पार्टी के गुटों आदि से निपटने की सामान्य कठिनाई के अलावा, बंगाल में एक अतिरिक्त कठिनाई है और वह साम्प्रदायिक समस्या है, जो पार्टी की गुटबाजी से जुड़ सकती है। राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो अतीत में बंगाल लगभग पूरी तरह एक हिंदू प्रांत रहा है; अर्थात् राजनीतिक गतिविधियों में हिंदू बंगाल ने ही सक्रिय भूमिका निभाई है। लेकिन जैसे-जैसे अधिक से अधिक मुसलमान राजनीतिक रूप से जागरूक हो रहे हैं, यह स्थिति लंबे समय तक ऐसी नहीं रहने वाली।
इसलिए प्रश्न यह है कि कांग्रेस इन मुसलमानों को कितना प्रभावित कर सकती है और उन्हें अपने साथ ला सकती है। यदि हम ऐसा करने में असफल रहे, तो वे साम्प्रदायिक तत्वों को मजबूत करेंगे। और तब बंगाल की राजनीति में एक प्रभावशाली साम्प्रदायिक तत्व पैदा हो जाएगा। इसलिए परिस्थिति अलग प्रकार की है और हमारे सामान्य कांग्रेस कार्य, विधानसभा के काम तथा हमारे द्वारा की जाने वाली अनुशासनात्मक कार्रवाइयों—हर चीज में इन व्यापक परिस्थितियों को ध्यान में रखना होगा।
मुझे कोई संदेह नहीं कि तुम और शरत इन बातों को ध्यान में रखते हो। हाल में मुस्लिम लीग की बैठक और वहाँ फज़लुल हक़ के भाषणों ने एक तीव्र और निम्न स्तर के साम्प्रदायिकतावाद के फिर से उभरने को दिखाया है। संभव है कि बंगाल में तुम्हें इसका सामना दूसरे प्रांतों के लोगों की तुलना में अधिक करना पड़े। लेकिन मैं आशा करता हूँ कि तुम मुस्लिम जनता के बीच व्यापक अपील के माध्यम से इसका मुकाबला कर सकोगे। इससे निपटने का कोई दूसरा रास्ता नहीं है।
मुझे नहीं लगता कि मुस्लिम लीग या उसके नए समर्थकों के पीछे वास्तव में बहुत अधिक शक्ति है। लेकिन हमारी कमजोरी ही स्थिति में अंतर पैदा करेगी। इस कठिन परिस्थिति का सामना करते समय यह समझदारी होगी कि जहाँ तक संभव हो कांग्रेस के भीतर के गुटों से बचा जाए और उन्हें समाप्त करने का प्रयास किया जाए।
टिप्पेरा जिले के बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता, क्योंकि स्पष्ट रूप से मुझे सभी तथ्य मालूम नहीं हैं। लेकिन मुझे एक अस्पष्ट-सा आभास है कि यदि वहाँ की स्थिति को सावधानी से नहीं संभाला गया, तो इससे साम्प्रदायिक तत्व मजबूत हो सकते हैं और मुस्लिम जनता पर कांग्रेस का प्रभाव कमजोर पड़ सकता है। इसी कारण मैंने पहले भी इस विषय पर लिखा था। लेकिन अब लिखने के बाद मैं और कुछ करने का प्रस्ताव नहीं रखता। तुम्हें और तुम्हारे साथियों को जो कार्रवाई उचित और सही लगे, वह करनी चाहिए।
जहाँ तक करीमगंज का प्रश्न है, मेरे सामने जो तथ्य रखे गए हैं और दोनों पक्षों से जो पर्याप्त सामग्री मुझे मिली है, उससे मेरे मन में काफी संदेह पैदा होता है। ऐसे मामलों में मैं उस पक्ष को संदेह का लाभ देना पसंद करता हूँ जिसके विरुद्ध कार्रवाई की गई है। मामले के गुण-दोष के अलावा, प्रभावी कार्यकर्ताओं को एक साथ बनाए रखने की व्यापक चिंता भी मेरे निर्णय को प्रभावित करती है। एक विचित्र स्थिति पैदा हो गई है। हमें B.P.C.C. की ओर से बिल्कुल कोई सूचना नहीं मिली है कि कोई कार्रवाई की गई है।
इसलिए सामान्य प्रक्रिया के अनुसार हमने A.I.C.C. की बैठक के नोटिस अपने सभी सदस्यों को भेजे। अब करीमगंज के एक व्यक्ति, जिसे ऐसा नोटिस मिला है, हमसे पूछ रहा है कि क्या वह बैठक में भाग ले सकता है, क्योंकि B.P.C.C. ने उसके विरुद्ध कार्रवाई की है। चूँकि हमें इसकी कोई आधिकारिक सूचना नहीं मिली है, इसलिए हम इस कार्रवाई को स्वीकार नहीं कर सकते और न ही हमें ठीक-ठीक पता है कि कार्रवाई क्या है। हमने उसे B.P.C.C. से संपर्क करने को कहा है।
तुमने मुझसे पूछा है कि क्या हम चाहते हैं कि पहले से लगाया गया दंड संशोधित किया जाए। मुझे तो यह भी नहीं मालूम कि यह दंड क्या है और किस पर लगाया गया है—सिर्फ अस्पष्ट रूप से कुछ जानकारी मिली है। लेकिन यदि तुम और शरत सभी परिस्थितियों को देखते हुए यह महसूस करते हो कि दंड को संशोधित करना बेहतर होगा, तो निश्चित रूप से ऐसा कर सकते हो। यह निर्णय तुम्हें ही करना है और इसमें सभी व्यापक परिस्थितियों को ध्यान में रखना चाहिए।
मुझे आशा है कि तुम यह पत्र शरत के साथ साझा करोगे।
A.I.C.C. की बैठक के बाद मैं कलकत्ता से असम और सिलहट के दौरे पर लगभग एक सप्ताह के लिए जाने की सोच रहा हूँ। मैं पहले कभी उस रास्ते से नहीं गया हूँ। बेशक, मैं वहाँ की स्थानीय राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करूँगा। फिर भी, जब मैं वहाँ जाऊँ तो ऐसे मामलों में मुझे किस प्रकार आगे बढ़ना चाहिए, इस बारे में तुम्हारी सलाह लेना चाहूँगा। मैंने अपने इस दौरे के बारे में B.P.C.C. को पहले ही सूचित कर दिया है। अंतिम निर्णय मैं कलकत्ता में करूँगा।
तुम्हारा स्नेहपूर्वक,
जवाहरलाल नेहरू
(मूल अंग्रेजी से हिंदी में अनुवादित)
स्रोत: Selected Works of Jawaharlal Nehru, First Series, Vol. 8, पृष्ठ 184–187; A.I.C.C. File No. P-5/1937, p. 215, N.M.M.L.
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