आम आदमी के गीतकार कॉमरेड शैलेन्द्र : राघवेंद्र दुबे

शैलेंद्र के गीतों में आम आदमी की आवाज थी । उनके गीत जिंदगी की जद्दोजहद और मोहब्बत की अभिव्यक्ति थे ।उनके गीत झकझोरते हैं उन्हें भी जिनके पास नींद है और नींद के महल हैं । उनके गीत हमारे लिये बेमतलब और सरोकार हीनता की द्विपीता ( आइलैंडनेस ) में ले जाने वाले सपने हमारी आंख से अलग कर , खुरदरी जमीन पर रख देते हैं –

1 – शीर्ष आलोचक और जनबुद्धिधर्मी स्व. डॉ. नामवर सिंह ने कभी कहा था — ‘ शैलेन्द्र, संत रविदास के बाद सबसे महत्वपूर्ण दलित कवि थे ।

2 – बहुत खुशी हुई और जन नायक राहुल गांधी जी पर बहुत प्यार आया था — ‘ किसी की मुस्कराहटों पे …’ गीत को भारत जोड़ो यात्रा की थीम बनते देख कर । टाइम एनेलाइजर, प्रो. देवेश दुबे के मोबाइल में इसे कॉलर ट्यून बनते देख कर । मधुलिमा शेखर जेएनयूआइट के लिए यह गीत उनका व्यक्तित्व बयान है ।

किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार
किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार
किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार
जीना इसी का नाम है


शीर्ष पब्लिक इंटेलेक्चुअल और पोलिटिकल एक्टिविस्ट मेरी दीदी वंदना मिश्रा कहती हैं — ‘ शैलेंद्र के गीतों में आम आदमी की आवाज थी । उनके गीत जिंदगी की जद्दोजहद और मोहब्बत की अभिव्यक्ति थे । ‘ मैं खुद जब कभी उदास होता हूं या लगता है थक गया हूं , शैलेन्द्र का यह गीत भीतर कुछ ऐसा फूंक देता है जैसे भक्क उजाला ।

‘ तू ज़िन्दा है तो ज़िन्दगी की जीत में यकीन कर,
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर

सुबह औ शाम के रंगे हुए गगन को चूमकर,
तू सुन ज़मीन गा रही है कब से झूम-झूमकर,
तू आ मेरा सिंगार कर, तू आ मुझे हसीन कर!
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!…. तू ज़िन्दा है ।…’

यानी जिंदगी की जीत में यकीन का खत्म हो जाना ही मौत है । जब तक ‘ जिंदगी की जीत में यकीन ‘ है हम जिंदा हैं, जिंदा कौम है । हमें मारने के लिये सबसे पहले हमारे इस यकीन पर ही तो हमला करती हैं आतताई ताकतें ।

शैलेन्द्र के गीत झकझोरते हैं उन्हें भी जिनके पास नींद है और नींद के महल हैं । उनके गीत हमारे लिये बेमतलब और सरोकार हीनता की द्विपीता ( आइलैंडनेस ) में ले जाने वाले सपने हमारी आंख से अलग कर , खुरदरी जमीन पर रख देते हैं – ‘ हर जोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है ‘ । बात दो टूक है । जीना है तो लड़ना होगा । शैलेन्द्र के गीत जीना सिखाते हैं । जीने के लिये मोहब्बत भी बहुत जरूरी है । इसलिए वह कहते हैं —

‘ प्यार कर ले, नहीं तो फाँसी चढ़ जाएगा
यार कर ले, नहीं तो यूँ-ही मर जाएगा
प्यार कर ले
जीते-हारे सैंकडों, तीर से तलवार से
मेरे साथ मुस्कुरा, दिल को जीत प्यार से
विचार कर ले, नहीं तो पीछे पछताएगा
प्यार कर ले …

ऐसा गीत शैलेन्द्र ही लिख सकते थे और पंडित नेहरू जैसे ही इसके लिये प्रोत्साहित भी कर सकते थे । आज अगर शैलेन्द्र यह हिमाकत करते तो शहरी नक्सली करार दे दिए जाते और अंतहीन समय तक उन्हें जमानत भी न मिलती —

‘ भगतसिंह, इस बार न लेना काया भारतवासी की,
देशभक्ति के लिए आज भी, सज़ा मिलेगी फांसी की!

यदि जनता की बात करोगे, तुम गद्दार कहाओगे
बम्ब-सम्ब की छोड़ो, भाषण दिया तो पकडे जाओगे
निकला है क़ानून नया, चुटकी बजाते बांध जाओगे
न्याय अदालत की मत पूछो, सीधे मुक्ति पाओगे

फिल्मों के लिये शैलेन्द्र ने अपना पहला गीत 1949 में प्रदर्शित राजकपूर की फिल्म ‘ बरसात ‘ का ‘ बरसात में तुमसे मिले हम सजन ‘ लिखा था । इसके बाद शैलेन्द्र, राजकपूर के चहेते हो गये । शैलेन्द्र और राजकपूर की जोड़ी ने कई फिल्में एक साथ कीं । इन फिल्मों में ‘ आवारा ‘, ‘ आग ‘, ‘ श्री 420 ‘, ‘ चोरी चोरी ‘, ‘ अनाड़ी ‘, ‘ जिस देश में गंगा बहती है ‘, ‘ संगम ‘, ‘ तीसरी कसम ‘ ‘, ‘ दीवाना ‘ , ‘ सपनों का सौदागर ‘ और ‘ मेरा नाम जोकर ‘ शामिल हैँ ।

ग्रेट शो मैन राजकपूर से शैलेन्द्र की मुलाकात एक कवि सम्मेलन में हुई थी । राजकपूर को शैलेन्द्र के गाने का अंदाज बहुत पसंद आया और उन्हें उनमें भारतीय सिनेमा का एक सितारा दिखाई दिया ।

राजकूपर ने शैलेन्द्र से अपनी फिल्मों के लिए गीत लिखने की इच्छा जाहिर की, लेकिन उन्होंने उनकी पेशकश ठुकरा दी । बाद में घर की कुछ जिम्मेदारियों के कारण उन्होंने राजकपूर से दोबारा संपर्क किया और अपनी शर्तों पर ही राजकपूर के साथ काम करना स्वीकार कर लिया ।

राजकपूर के अलावा शैलेन्द्र की जोड़ी निर्माता – निर्देशक बिमल रॉय के साथ भी खूब जमी । शैलेन्द्र अपने ‍करियर के दौरान प्रोग्रेसिव रायटर्स एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य बने रहे । वे इंडियन पीपुल्स थियेटर ‘ इप्टा ‘ के भी संस्थापक सदस्यों में से एक थे ।

शैलेन्द्र ने 1966 में ‘ तीसरी कसम ‘ का निर्माण किया लेकिन बॉक्स आफिस पर इसकी असफलता के बाद उन्हें गहरा सदमा पहुंचा उसके बाद उनके मित्रों ने उन्हें किसी प्रकार का सहयोग करने से इंकार कर दिया । मित्रों की बेरुखी और फिल्म ‘तीसरी कसम’ की असफलता के बाद उन्हें दिल का दौरा पड़ा ।

‘ तीसरी कसम ‘ शैलेन्द्र के कवि ह्रदय की मुक्ति थी । फ़िल्म निष्कलुष मोहब्बत और समर्पण का काव्यात्मक उन्मेष था । यह फ़िल्म सत्य के कालजयी सौंदर्य का संधान है । मैंने यह अप्रतिम प्रेम कथा 12 बार , सतत शोधार्थी और स्कॉलर कुमार नरेंद्र सिंह ने 10 बार , सुविज्ञ दुबे जनेवि ने 9 बार क्यों देखी होगी ? कोई बता सकता है ?

13 दिसंबर 1966 को अस्पताल जाते उन्होंने राजकपूर को आरके कॉटेज में मिलने के लिए बुलाया जहां उन्होंने राजकपूर से उनकी फिल्म ‘ मेरा नाम जोकर ‘ के गीत ‘ जीना यहां मरना यहां ‘ को पूरा करने का वादा किया लेकिन वह वादा अधूरा ही रहा और अगले ही दिन 14 दिसंबर 1966 को उनकी मृत्यु हो गई । 14 दिसम्बर राजकपूर का जन्मदिन है ।

राजकपूर के ‘ शोमैनशिप ‘ वाला आभा मंडल पूरा ही होता है और दीप्त होता है, गीतकार शैलेन्द्र, लेखक ख्वाजा अहमद अब्बास, संगीतकार शंकर – जयकिशन और उनकी आवाज रहे पार्श्व गायक मुकेश से । शैलेन्द्र अप्रतिम गीतकार थे ।

शैलेन्द्र के बेटे दिनेश शंकर शैलेन्द्र की किताब ‘ अंदर की आग ‘ (कविता संग्रह, राजकमल प्रकाशन से ) का लोकार्पण करते हुए शीर्ष आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने शैलेन्द्र को संत रविदास के बाद सबसे महत्वपूर्ण दलित कवि कहा था ।

बिहार के आरा जिले के धुसपुर गांव के दलित परिवार से ताल्लुक रखने वाले शैलेन्द्र का असली नाम शंकरदास केसरीलाल था । उनका जन्म 30 अगस्त, 1921 को रावलपिंडी ( जो अब पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में है ) में हुआ था, जहां उनके पिता केसरीलाल राव ब्रिटिश मिलिटरी हॉस्पिटल ( जो मूरी केंटोनमेंट एरिया में था ) में ठेकेदार थे । शैलेन्द्र का अपने गांव से कोई ख़ास जुडाव नहीं रहा क्योंकि वे बचपन से अपने पिता के साथ पहले रावलपिंडी और फिर मथुरा में रहे । उनके गांव में ज्यादातर लोग खेतिहर मजदूर थे ।

दो दशक से अधिक के कालखंड में तकरीबन 200 फिल्मों में जिंदगी के हर फलसफे और जीवन के हर रंग पर गीत लिखने वाले शैलेन्द्र के गीतों में जिंदगी की जीत में यकीन, मोहब्बत का पैगाम और मानवीय दुनिया का सपना झिलमिलाता रहा ।

बता दूं कि ‘ आवारा ‘ दुनिया में अब तक सबसे ज्यादा देखी गयी भाषाई फिल्म है और इसका लीड गीत ‘ आवारा हूं,.., गर्दिश में हूं आसमान का तारा हूं ‘, सबसे ज्यादा गाया गीत । जिसने आवारगी को एक रूहानी, रुमानी अवधारणा दी, मनुष्य होने के हौसले में परिभाषित किया ।

जब से मोबाइल रखने की औकात हुई, यही गीत मेरा कालर ट्यून और लाइफ स्टेटमेंट है । पूरे यूनियन ऑफ सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक में यह गीत गजब लोकप्रिय हुआ । एक बार तो रूस में पंडित नेहरू का स्वागत इसी गीत से हुआ ।

नोबेल पुरस्कार से सम्मानित रूसी साहित्यकार अलेक्जेंडर सोल्ज़ेनित्सिन की किताब ‘ द कैंसर वार्ड ‘ में एक दृश्य है जिसमें नर्स एक कैंसर मरीज़ की तकलीफ़ इस गाने को गाकर कम करने की कोशिश करती है । और मेरा एक डंटा भांजक दोस्त कहता है — का ई आवारा लगवले बाड़ा ।

हालांकि इस गीत के लिए पहले तो राजकपूर ने मना कर दिया था । धर्मयुग के 16 मई, 1965 के अंक में शैलेन्द्र ने लिखा है -‘ आवारा की कहानी सुने बिना, केवल नाम से प्रेरित होकर मैंने ये गीत लिखा था । मैंने जब सुनाया तो राजकपूर साहब ने गीत को ख़ारिज कर दिया । फ़िल्म पूरी बन गई तो उन्होंने मुझे फिर से गीत सुनाने को कहा और इसके बाद अब्बास साहब को गीत सुनाया । अब्बास साहब की राय हुई कि यह तो फ़िल्म का लीड गीत होना चाहिए.. ‘। बाद में यह गीत पूरे यूनियन ऑफ सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक में एंथम और कल्चरल आइकॉन बन गया ।

कितनी खुशी हुई और राहुल गांधी पर कितना प्यार आया था , ‘ किसी की मुस्कराहटों पे …’ गीत को भारत जोड़ो यात्रा की थीम बनते देख कर । टाइम एनेलाइजर, प्रो. देवेश दुबे के मोबाइल में इसे कॉलर ट्यून बनते देख कर ।

किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार
किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार
किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार
जीना इसी का नाम है

जनता के गीतकार ‘ लाल सलाम ‘ …’ लाल सलाम ‘ । शैलेन्द्र जिंदाबाद … जिंदाबाद ।

(Nehru review से साभार)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *