नेहरू ने सत्यजीत रे की ‘ पथेर पांचाली ‘ को सराहा था

सत्ता प्रतिष्ठान का सिनेमा होने के बजाय ये फिल्में नेहरूवादी राज्य में सामाजिक असमानताओं की आलोचना भी थीं जिसे पंडित नेहरू ‘ प्रमोट ‘ कर रहे थे । पंडित नेहरू यानी वह विश्व राजनेता जिसे अपनी आलोचना पसंद थी ।

पंडित नेहरू ने फिल्म ‘ पथेर पांचाली ‘ के जरिए न केवल नव-यथार्थवाद ( Neorealism ) आंदोलन को समझा, माना कि कला का मकसद देश – काल की असलियत का चित्रण ही होना चाहिए । पंडित नेहरू ने ‘ पथेर पांचाली ‘ को भारत की सच्ची, कलात्मक प्रस्तुति कही और उसे सरकारी आपत्तियों के बावजूद बढ़ावा दिया, सत्यजीत रे की मदद की । तमाम लोगों की आपत्ति थी, संसद तक में कहा गया कि रे की फिल्में विदेश में भारत की गरीबी दिखाकर देश की छवि खराब कर रही हैं । पंडित नेहरू ने स्पष्ट किया कि यदि कोई फिल्मकार इतनी सहानुभूति ( Empathy ) के साथ गरीबी दिखाता है, तो वह उसके साथ हैं ।

अपने पूरे जीवनकाल में 37 फिल्में बनाने वाले सत्यजीत रे की गिनती महान फिल्मकारों में होती है । उनकी शुरूआती पहचान लेखक और साहित्यकार की थी । सत्यजीत रे ने अपने करियर की शुरुआत विज्ञापन एजेंसी में बतौर जूनियर विजुवलायजर की । इसके बाद उन्होंने डिजाइनिंग का काम भी किया । कंपनी के काम से लंदन गए सत्यजीत वहां के सिनेमा से इतने प्रभावित हुए कि निर्देशक बनने की ठान ली । उनकी पहली फिल्म थी ‘ पाथेर पांचाली ‘ । उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ऑस्कर कमेटी उन्हें पुरस्कार देने खुद भारत आई थी ।

यह पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल की फिल्म थी जिसपर आरोपों के बौछार थे । कहा गया कि रे की शुरूआती फिल्में नेहरूवादी सत्ता प्रतिष्ठान का सिनेमा हैं जिनकी गीतात्मकता भारतीय ग्रामीण और शहरी वास्तविकता की निर्मम सच्चाई से दूर हैं ।

यह सच है कि ये फिल्में पंडित नेहरू के नजरिए से स्पष्ट रूप से प्रभावित थीं लेकिन औद्योगिक अर्थव्यवस्था द्वारा संचालित राष्ट्र निर्माण की नेहरूवादी विचारधारा के प्रति बढ़ती बेचैनी भी दर्शाती हैं । सत्ता प्रतिष्ठान का सिनेमा होने के बजाय ये फिल्में नेहरूवादी राज्य में सामाजिक असमानताओं की आलोचना भी थीं जिसे पंडित नेहरू ‘ प्रमोट ‘ कर रहे थे । पंडित नेहरू यानी वह विश्व राजनेता जिसे अपनी आलोचना पसंद थी ।

सत्यजीत रे ने अपने करियर में कई प्रमुख पुरस्कार प्राप्त किए , जिनमें रिकॉर्ड 37 भारतीय राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार शामिल हैं , जिनमें दादासाहेब फाल्के पुरस्कार , एक गोल्डन लायन , एक गोल्डन बियर , दो सिल्वर बियर और अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में कई अन्य पुरस्कार शामिल हैं। वे आज तक तीन सबसे बड़े फिल्म समारोहों में से दो शीर्ष पुरस्कार प्राप्त करने वाले एकमात्र भारतीय हैं। उन्हें 1992 में अकादमी मानद पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1978 में, उन्हें ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा मानद उपाधि प्रदान की गई । भारत सरकार ने उन्हें 1992 में अपने सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित किया । रे की जन्म शताब्दी के अवसर पर, अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह ने उनकी विरासत को मान्यता देते हुए , 2021 में अपने वार्षिक लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार का नाम बदलकर ” सत्यजीत रे लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार ” कर दिया। 2024 में, फोर्ब्स ने “सर्वकालिक 30 महानतम फिल्म निर्देशकों” की अपनी सूची में रे को सर्वकालिक 8वें महानतम फिल्म निर्देशक (विश्व स्तर पर) के रूप में स्थान दिया।


(Nehru Review से साभार)

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