बुडापेस्ट की एक यहूदी लड़की के रूप में जन्मी फोरी ने बचपन में ही हिंसा और भय का चेहरा देखा।लंदन में पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाकात जवाहरलाल नेहरू के भतीजे बृज कुमार नेहरू से हुई। प्रेम हुआ, और फिर विवाह का निर्णय। यह निर्णय आसान नहीं था।शोभा नेहरू ने लंबा जीवन जिया। उन्होंने दो विश्व युद्ध, भारत की स्वतंत्रता, विभाजन और आपातकाल जैसे बड़े ऐतिहासिक घटनाक्रम देखे।
इतिहास में कुछ जीवन ऐसे होते हैं जो अपने भीतर की संवेदनशीलता और साहस के कारण याद किए जाते हैं। शोभा नेहरू, जिन्हें परिवार और मित्र “आंटी फोरी” कहकर पुकारते थे, ऐसी ही एक असाधारण स्त्री थीं। उनका जीवन किसी उपन्यास की तरह कई महाद्वीपों, संस्कृतियों और संकटों से होकर गुजरा, और हर मोड़ पर उन्होंने एक नया रूप धारण किया।
बुडापेस्ट की एक यहूदी लड़की के रूप में जन्मी फोरी ने बचपन में ही हिंसा और भय का चेहरा देखा। उन्होंने बाद में याद किया था कि एक बार ट्रेन से यात्रा करते हुए उन्होंने रास्ते में पेड़ों से लटके लोगों को देखा था। वह दृश्य उनके मन में हमेशा के लिए बस गया। उस समय शायद उन्हें यह आभास नहीं था कि जीवन उन्हें एक ऐसे देश में ले जाएगा, जहाँ वे केवल एक परिवार की सदस्य नहीं, बल्कि संकट के समय लोगों की संरक्षक बनेंगी।
लंदन में पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाकात जवाहरलाल नेहरू के भतीजे बृज कुमार नेहरू से हुई। प्रेम हुआ, और फिर विवाह का निर्णय। यह निर्णय आसान नहीं था। उस समय धर्म, जाति और नस्ल के प्रश्न विवाह के रास्ते में बड़ी दीवार की तरह खड़े होते थे। फिर भी उन्होंने जोखिम उठाया और 1935 में लाहौर में हिंदू रीति से विवाह किया। भारत आने पर उन्होंने जीवन का ढंग भी बदल लिया। साड़ी पहनना, हिंदी सीखना और भारतीय परिवार की परंपराओं में घुलना उनके लिए एक आत्मिक परिवर्तन की तरह था।
दरअसल जब वे 20 साल की हुई, तब हंगरी के विश्वविद्यालयों में यहूदी छात्रों के लिए सख्त कोटा लागू हो चुका था। इस कारण बुडापेस्ट विश्वविद्यालय में उन्हें जगह देने से मना कर दिया गया था, जिसमें प्रवेश लेने वाले यहूदियों की संख्या सीमित थी। इसलिए उनके माता-पिता ने उन्हें पहले फ्रांस और फिर यूनाइटेड किंगडम में लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में भेज दिया। वहाँ उनकी मुलाकात बृज कुमार नेहरू से लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के इतिहास पुस्तकालय में हुई। बृज उस समय भारतीय सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे थे।
1932 में बी के नेहरू और फोरी दोनों के माता-पिता बुडापेस्ट में मिले। भेंट के दो वर्ष बाद, जनवरी 1934 में, उन्होंने फोरी को नेहरू परिवार के साथ एक परीक्षण अवधि के लिए भारत की यात्रा की। सहमति हुई कि अगर वे भारत में सामंजस्य नहीं बिठा पाती हैं, तो उन्हें हंगरी लौटने की इजाज़त दी जाएगी। बी के नेहरू और फिर इंडोलॉजिस्ट एर्विन बाकटे से हिंदी की शिक्षा लेने के बाद, वह लाहौर के लिए ट्रेन लेने से पूर्व फरवरी 1934 में लॉयड ट्राइस्टिनो से बॉम्बे पहुंचीं । नेहरू परिवार के साथ उनके इस अवधि का परीक्षण सफल रहा। स्मृतियों के अनुसार “नेहरू परिवार को उनसे प्यार हो गया”।
25 जनवरी 1935 को फोरी ने लाहौर में बी के नेहरू से हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह किया। उनके ससुराल वालों ने उनका नाम शोभा रखा, जिसका अर्थ है चमक या सौंदर्य। इस विवाह को व्यापक रूप से प्रचारित किया गया, और इसकी तस्वीरें कई समाचार पत्रों में छपीं।
नेहरू परिवार ने फोरी को पूरी तरह स्वीकार किया। जवाहरलाल नेहरू उस समय जेल में थे जिनसे मिलने फोरी भी गई थी। बी के नेहरू अपनी आत्मकथा ‘नाइस गाइज़ फ़िनिश सेकेंड’ में लिखते हैं,
“जवाहरलाल की नज़र से ये छिपा नहीं रह सका कि फोरी की आँखों में आँसू थे। अगले दिन उन्होंने फ़ोरी को पत्र लिख कर कहा, अब जब तुम नेहरू परिवार का सदस्य बनने जा रही हो, तुम्हें परिवार के क़ायदे क़ानून भी सीख लेने चाहिए. सबसे पहली चीज़ जिस पर तुम्हें ध्यान देना चाहिए वो ये है कि चाहे जितना बड़ा दुख हो, नेहरू कभी किसी के सामने नहीं रोते।”
लेकिन उनकी असली परीक्षा 1947 में आई। देश विभाजन की आग में जल रहा था। दिल्ली की सड़कों पर भय, अफवाह और हिंसा का माहौल था। ऐसे समय में शोभा नेहरू ने घर की सुरक्षित दीवारों के भीतर रहने का विकल्प नहीं चुना। वे उस आपातकालीन समिति की सदस्य बनीं, जो शरणार्थियों को सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाने का काम कर रही थी। उन्होंने महिलाओं के लिए कढ़ाई और सिलाई के काम शुरू कराए, ताकि वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकें।
उनके जीवन में एक और दिलचस्प विरोधाभास था। वे पूरी तरह भारतीय बन गई थीं, फिर भी अपने यहूदी अतीत को कभी नहीं भूलीं। उनके बेटे याद करते थे कि उनकी नानी मोमबत्तियाँ जलाकर उन्हें यहूदी परंपराओं की कहानियाँ सुनाती थीं, और उनकी माँ साड़ी पहनकर भारतीय त्योहार मनाती थीं। यह दृश्य अपने आप में एक छोटी सी दुनिया था, जहाँ दो संस्कृतियाँ बिना टकराव के साथ रह रही थीं।
शोभा नेहरू ने लंबा जीवन जिया। उन्होंने दो विश्व युद्ध, भारत की स्वतंत्रता, विभाजन और आपातकाल जैसे बड़े ऐतिहासिक घटनाक्रम देखे। पर उनकी पहचान किसी राजनीतिक पद या शक्ति से नहीं बनी। उनकी पहचान बनी एक ऐसे व्यक्ति के रूप में, जिसने हर संकट में लोगों का हाथ थामा और चुपचाप अपना कर्तव्य निभाया।
शायद यही कारण है कि उन्हें याद करते हुए एक करीबी ने कहा था कि वे समय की एक शांत साक्षी थीं, एक ऐसी साक्षी जिसने इतिहास को जिया मानवीय संवेदना से छुआ।
शोभा नेहरू का 25 अप्रैल 2017 को 108 वर्ष की आयु में कसौली में निधन हुआ।
(यह संक्षिप्त विवरण नेहरू परिवार की स्त्रियों पर लिखी गई मेरी नवीनतम प्रकाशनाधीन पुस्तक के आधार पर लिखा गया है।) राजगोपाल सिंह वर्मा की पोस्ट से साभार
