एआईसीसी ने 1964 तक अनीता को 6000 रुपये वार्षिक की मदद की। 1965 में उनकी शादी के बाद यह आर्थिक सहयोग बंद कर दिया गया। यह मत समझिए कि तब 500 रुपये महीने कोई छोटी रकम थी। बड़े-बड़े अफ़सरों को भी इतना वेतन नहीं मिलता था।
23 मई 1954 को नेहरू जी ने एक दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए। इसमें लिखा है “डॉ. बी. सी. राय और मैंने आज वियना में सुभाष चंद्र बोस की बच्ची के लिए एक ट्रस्ट डीड पर हस्ताक्षर किए हैं। दस्तावेजों को सुरक्षित रखने के लिए मैंने उनकी मूल प्रति एआईसीसी को दे दी है।”
एआईसीसी ने 1964 तक अनीता को 6000 रुपये वार्षिक की मदद की। 1965 में उनकी शादी के बाद यह आर्थिक सहयोग बंद कर दिया गया। यह मत समझिए कि तब 500 रुपये महीने कोई छोटी रकम थी। बड़े-बड़े अफ़सरों को भी इतना वेतन नहीं मिलता था।नेताजी सुभाषचंद्र बोस इलाज के लिए 1934 में आस्ट्रिया की राजधानी विएना में थे जहाँ वे खाली वक्त का इस्तेमाल अपनी किताब ‘द इंडियन स्ट्रगल’ लिखने में कर रहे थे। मदद के लिए उन्हें एक टाइपिस्ट की जरूरत थी। 23 साल की एमिली शेंकल का चुनाव इसी काम के लिए हुआ था। लेकिन स्वतंत्रता संग्राम के इस 37 वर्षीय नायक के सीने में एक दिल भी था, जो अपने से 14 साल छोटी एमिली के प्यार भरे स्पर्श से धड़क उठा। ‘स्वदेश’ और ‘स्वदेशी’ में पगे नेताजी की नजर में ‘विदेशी’ से प्यार या शादी कोई गुनाह नहीं था। 26 दिसंबर 1937 को एमिली के 27वें जन्मदिन पर ऑस्ट्रिया के बादगास्तीन में दोनों ने शादी कर ली। लेकिन उन्हें साथ रहने का अवसर कम ही मिला। वे जल्दी ही भारत लौट आए जहाँ कांग्रेस के अध्यक्ष की कुर्सी उनका इंतजार कर रही थी।
स्वतंत्रता आंदोलन की व्यस्तताओं के बीच नेताजी का विदेश जाना कम ही हो पाता था, फिर भी एमिली को लिखी चिट्ठियाँ उनके गहन प्यार की गवाही देती हैं। 29 नवंबर 1942 को उनकी बेटी अनीता का जन्म हुआ। वे अपनी संतान को देखने गए और वहीं से अपने बड़े भाई शरतचंद्र बोस को ख़त लिखकर इसकी जानकारी दी। एमिली ने सिंगल मदर के रूप में काफी कठिनाइयों के बीच अकेली बेटी को पाला।
सुभाषचंद्र बोष की मृत्यु के उपरांत जब हिंदूवादी धड़े ने बोस की पत्नी को विदेशी कहकर अपमानित किया और सुभाष की पत्नी मानने से इंकार किया तब पण्डित नेहरू जी सामने आए और कहा कि हम सुभाषचंद्र बोस की पत्नी को अपमानित नही होने देंगे और उनके तथा उनकी बेटी के खर्चे के लिए हर महीने 500₹ की राशि ऑस्ट्रिया तब तक भिजवाते रहे जब तक सुभाष बाबू की बेटी का विवाह नही हो गया।
जवाहर लाल नेहरू, जिन्हें सुभाष का विरोधी बताने का पूरा अभियान चलाया गया है,जबकि दोनों ही काँग्रेस के समाजवादी खेमे के नेता थे। कोई निजी मतभेद नहीं था। सुभाषचंद्र बोस की ‘सैन्यवाद प्रवृत्ति’ को गाँधी और उनके अनुयायी उचित नहीं मानते थे। लेकिन सुभाष हमेशा वैचारिक रूप से नेहरू को अपने करीब पाते थे। नेहरू ने सुभाष के दुबारा कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने के बाद कार्यसमिति से इस्तीफ़ा भी नहीं दिया था, जैसा कि पटेल समेत 12 गाँधी अनुयायियों ने किया था पर वे गाँधी की दृष्टि को ज़्यादा महत्वपूर्ण मानते थे। यह नेहरू के प्रति सम्मान ही था कि जब सुभाष बोस ने आज़ाद हिंद फ़ौज बनाई तो एक ब्रिगेड का नाम नेहरू के नाम पर रखा। गाँधी जी को ‘राष्ट्रपिता’ का संबोधन भी नेता जी ने ही दिया था जो बताता है कि वैचारिक विरोध के बावजूद वे गाँधी जी की महानता के किस कदर कायल थे।
(Pramod Singh की पोस्ट से साभार)
