पंडित नेहरू के प्रमुख मित्रों में से एक अल्बर्ट आइंस्टीन विज्ञान जगत की सर्वाधिक प्रतिभाशाली शख्सियत थे।नेहरू की तरह ही आइंस्टीन निर्माण और सृजन में यकीन करते थे, अमनपसंद और विश्वशांति के हिमायती थे ।
पंडित नेहरू के समकालीनों और उनके मित्रों में से एक अल्बर्ट आइंस्टीन विज्ञान जगत की सर्वाधिक प्रतिभाशाली शख्सियत थे जिनके ‘ E=mc2 ‘ फॉर्मूले ने दुनिया बदल दी । उनकी ‘ थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी ‘ विश्व की अब तक की सबसे महानतम खोजों में से एक है ।
आइंस्टीन निर्माण और सृजन में यकीन करते थे, अमनपसंद और विश्वशांति के हिमायती थे । जब अमेरिका ने नागासाकी और हिरोशिमा पर न्यूक्लियर बम गिराया, तो आइंस्टीन बहुत दुखी हुए थे । एक लेख में उनका अपराध बोध साफ झलकता है । उन्हें यह हमेशा सालता रहा , जीवन के अंतिम क्षण तक कि परमाणु बम से होने वाली उस तबाही में उनकी भी भूमिका थी ।
6 अगस्त, 1945 को हिरोशिमा पर जो ऐटम बम गिराया गया , उसका कोड नाम ‘ लिटिल बॉय ‘ था । 9 अगस्त, 1945 को नागासाकी पर ‘ फैट मैन ‘ गिराया गया । ‘ हिरोशिमा पर गिराए गए ऐटम बम के ऐसे कई दिल दहला देने वाले असर दिखे कि परछाइयां पत्थरों पर चिपक गईं । ये किसी ऐसे बुजुर्ग आदमी का साया है, जो हमले के वक्त अपनी लाठी लेकर यहां से गुजर रहा होगा ।
अमेरिका ने जापान पर जब बम गिराया, तब तक जर्मनी हथियार डाल चुका था । हिटलर के नेतृत्व में जिस नाजी ऐटमिक बम की आशंका के मद्देनजर आइंस्टीन ने रूजवेल्ट को चिट्ठी लिखी थी, वो टल चुका था । हिरोशिमा और नागासाकी पर हमले के एक साल तक आइंस्टीन चुप रहे । उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कोई टिप्पणी नहीं की ।
आइंस्टीन ने बाद में लिखा — जापान के खिलाफ परमाणु बम के इस्तेमाल की मैंने हमेशा ही निंदा की । ये गलत था । बहुत गलत । आइंस्टीन को उम्र भर मलाल रहा, ऐटम बम के निर्माण में अपनी भूमिका पर । उन्होंने लिखा — मैंने अपनी जिंदगी में ये एक बड़ी गलती की जब मैंने राष्ट्रपति रूजवेल्ट को ऐटम बम बनाए जाने की अनुशंसा वाले पत्र पर दस्तखत किया । ऐसा इसलिए हो गया कि हमें जर्मनी के हाथों परमाणु हथियार विकसित किए जाने का खतरा सामने दिख रहा था ।
बहरहाल , दुनिया के इतिहास के बारे में मुझे जो कुछ थोड़ी – बहुत जानकारियां हैं , दो ही ऐसे दिखे , पंडित नेहरू और अलबर्ट आइंस्टीन , जिनमें उन हादसों के लिये भी खुद को जिम्मेदार मान लेने की उच्चतम नैतिकता थी , जिसमें प्रत्यक्षत: उनकी कोई भूमिका नहीं थी । दोनों ही लोकतांत्रिक और नैतिक थे और सहज ही अपनी गलती मान कर अपनी सर्वोच्च उपलब्धियों से भी बहुत बड़े होते गए ।
आज अहंकार के अट्टहास वाले दौर में हम ऐसी उम्मीद कर सकते हैं , जब एक शख्स ईश्वर से भी बड़ा मान लिया गया है और 140 करोड़ की आबादी वाला दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र उसमें ही ‘ रिड्यूस ‘ कर दिया गया है । उन्हें पंडित नेहरू नहीं होना है , इसलिए वे अपनी गलती कभी नहीं मानेंगे । वे तो पंडित नेहरू के छवि हनन में लगे हैं ।
Nehru Review से साभार ,आइंस्टीन की पुण्यतिथि ( 18 अप्रैल 1955 ) पर:
