जन्मदिन : 7 मई ( 1861) पर: टैगोर लिखते हैं, “देशभक्ति हमारा आखिरी आध्यात्मिक सहारा नहीं बन सकता, मेरा आश्रय मानवता है । मैं हीरे के दाम में ग्लास नहीं खरीदूंगा और जब तक मैं जिंदा हूं मानवता के ऊपर देशभक्ति की जीत नहीं होने दूंगा । ..’
पंडित जवाहरलाल नेहरू पर रबींद्रनाथ टैगोर का असर भी खूब दिखता है । अपनी किताब ‘ डिस्कवरी ऑफ इंडिया ‘ में पंडित नेहरू ने कई जगह टैगोर का जिक्र किया है ।
पंडित नेहरू लिखते हैं — ‘.. उन्होंने ( गुरुदेव टैगोर ने ) मुझे पूरब और पश्चिम के जीवन मूल्य और आदर्शों में संतुलन बनाना सिखाया । भारतीय राष्ट्रवाद की मेरी सोच को मजबूत किया । वे आला दर्जे के पहले भारतीय अंतर्राष्ट्रीयतावादी थे । उनका विश्वास ऐसे अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए काम करने का था जिसमें वे भारत के संदेश को दुनिया भर में ले जाएं और दूसरे देशों का संदेश अपने लोगों को सुनाएं ।.. ’
पंडित नेहरू , टैगोर के नाटकों के किरदार का जिक्र करते हैं, वेदों पर उनका नजरिया बताते हैं, सभ्यता के उन सूत्रों की चर्चा करते हैं जो भारत और चीन को जोड़ता है और जिन्हें टैगोर खासा महत्वपूर्ण मानते थे । वह टैगोर को एक उदाहरण की तरह प्रस्तुत करते हैं — ‘ एक ऐसा शख्स जो आधुनिक युग के लिए उत्साह और आग्रह से भरा हुआ था लेकिन , उसकी जड़ें भारत के अतीत में थीं । जो अपने भीतर प्राचीन और नवीन को संयोजित किए हुए थे ।’
नेहरू की पहली किताब ‘ विश्व इतिहास की झलकियां ‘ में भी टैगोर का बार – बार जिक्र आता है । इस किताब में वे चिट्ठियां हैं जो उन्होंने जेल से अपनी बेटी इंदिरा ( परम पूज्या , आयरन लेडी ऑफ द वर्ल्ड इंदिरा गांधी ) को लिखी थीं ।
इस किताब में वह शुरूआत गीतांजलि की इन पंक्तियों से करते हैं – ‘ जहां मन में कोई डर नहीं होता और जहां सिर गर्व से ऊंचा होता है..’ , ‘ मेरे पिता, आजादी के उस स्वर्ग में मेरे देश को जागने दो ‘ ।
टैगोर का दृष्टिकोण परंपरावादी कम , तर्कसंगत ज्यादा था, जिसका संबंध विश्व मानवता से था । टैगोर मानते थे कि देशभक्ति की ‘ चारदीवारी ’ हमें बाहर के विचारों से जुड़ने की आज़ादी से रोकती है और दूसरे देशों की जनता के दुख – दर्द को समझने की स्वतंत्रता को भी सीमित कर देती है ।
आजादी की लड़ाई के दौरान होने वाले आंदोलनों में अतिरेक राष्ट्रवादी रुख की टैगोर हमेशा निंदा करते रहे । वह आज़ाद भारत खूब चाहते थे, लेकिन वह यह भी मानते थे कि घोर राष्ट्रवादी रवैये और स्वदेशी भारतीय परंपरा की चाह में पश्चिम को पूरी तरह नकार देने से कहीं न कहीं हम खुद को सीमित कर लेंगे । यही नहीं स्वदेशी की इस अतिरिक्त चाह में हम अलग-अलग शताब्दी में भारत पर अपनी छाप छोड़ चुके ईसाई, यहूदी, पारसी और इस्लाम धर्म के प्रति भी असहिष्णु रवैया पैदा कर लेंगे ।
टैगोर लगातार अपने लेखन में देशभक्ति की आलोचना करते हैं । 1908 में ही वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस की पत्नी अबला बोस को एक पत्र में उन्होंने लिखा — ‘ देशभक्ति हमारा आखिरी आध्यात्मिक सहारा नहीं बन सकता, मेरा आश्रय मानवता है । मैं हीरे के दाम में ग्लास नहीं खरीदूंगा और जब तक मैं जिंदा हूं मानवता के ऊपर देशभक्ति की जीत नहीं होने दूंगा । ..’
प्रख्यात जनबुद्धिधर्मी आशीष नंदी लिखते हैं – ‘ शांति निकेतन ‘ को रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ‘ भौगोलिक राक्षस ’ यानि राष्ट्रवाद के प्रभाव से मुक्ति के लिए समर्पित मंदिर का नाम दिया था ।
अब कविकुल गुरु की यह कविता भी पढ़ें । जो प्रख्यात कलाविद् प्रयाग शुक्ल द्वारा अनुदित है और इसे मुझे उपलब्ध कराया था मेरे गुरु, राजनीतिक चिंतक डीपी त्रिपाठी ( डीपीटी ) ने ।
हो चित्त जहाँ भय-शून्य, माथ हो उन्नत
हो ज्ञान जहाँ पर मुक्त, खुला यह जग हो
घर की दीवारें बने न कोई कारा
हो जहाँ सत्य ही स्रोत सभी शब्दों का
हो लगन ठीक से ही सब कुछ करने की
हों नहीं रूढ़ियाँ रचती कोई मरुथल
पाये न सूखने इस विवेक की धारा
हो सदा विचारों,कर्मों की गति फलती
बातें हों सारी सोची और विचारी
हे पिता मुक्त वह स्वर्ग रचाओ हममें
बस उसी स्वर्ग में जागे देश हमारा….
टाइम ऐनेलाइजर, प्रो. देवेश दुबे कहते हैं — ‘ टैगोर ने 1916 -17 के कालखंड में, जापान और अमेरिका की यात्रा के दौरान राष्ट्रवाद पर कई वक्तव्य दिए थे, जो पुस्तक के रूप में सामने आये । ‘
1917 के अपने एक भाषण में टैगोर ने कहा था — ‘ राष्ट्रवाद का राजनीतिक और आर्थिक संगठनात्मक आधार उत्पादन में बढ़ोतरी और मानवीय श्रम की बचत कर अधिक संपन्नता हासिल करने का प्रयास है । राष्ट्रवाद की धारणा मूलतः राष्ट्र की समृद्धि और राजनीतिक शक्ति में बढ़ोतरी करने में इस्तेमाल की गई ।
शक्ति की बढ़ोतरी की इस संकल्पना ने देशों में पारस्परिक द्वेष, घृणा और भय का वातावरण बनाकर मानव जीवन को अस्थिर और असुरक्षित बना दिया है । यह सीधे-सीधे जीवन से खिलवाड़ है, क्योंकि राष्ट्रवाद की इस शक्ति का प्रयोग बाहरी संबंधों के साथ ही राष्ट्र की आंतरिक स्थिति को नियंत्रित करने में भी होता है ।
ऐसी स्थिति में समाज पर नियंत्रण बढ़ना स्वाभाविक है । ऐसे में समाज और व्यक्ति के निजी जीवन पर राष्ट्र छा जाता है और एक भयावह नियंत्रणकारी स्वरूप हासिल कर लेता है । दुर्बल और असंगठित पड़ोसी राज्यों पर अधिकार करने की कोशिश राष्ट्रवाद का ही स्वाभाविक प्रतिफल है । इससे पैदा हुआ साम्राज्यवाद अंततः मानवता का संहारक बनता है । ..’
टैगोर लिखते हैं — ‘ राष्ट्रवाद जनित संकीर्णता मानव की प्राकृतिक स्वच्छंदता एवं आध्यात्मिक विकास के मार्ग में बाधा है । ऐसा राष्ट्रवाद युद्धोन्मादवर्धक एवं समाजविरोधी ही होगा, क्योंकि राष्ट्रवाद के नाम पर राज्य द्वारा सत्ता की शक्ति का अनियंत्रित प्रयोग अनेक अपराधों को जन्म देता है ।…’
इन दिनों कम से कम बीते 12 साल से ऐसा ही हो रहा है कि राष्ट्रवाद के नाम पर देश सत्ता का बेकाबू उन्माद झेल रहा है । यह राष्ट्रवाद श्रेष्ठतावाद और भभकते मिथ्या गौरव के नाजी ( हिटलरी ) अवधारणा का अक्षर अनुवाद है ।
राहुल गांधी जी के पास इस अविवेकी और अंधे राष्ट्रवाद से लड़ने और वैकल्पिक राजनीति का प्रारूप है । मेरे पास भी है । इसीलिए राहुल गांधी जी मेरे नेता हैं ।
Nehru Review से साभार
