21 अप्रैल 1956 को नेहरू न सिर्फ IIT खड़गपुर से पास हुए देश के पहले 150 इंजीनियर्स के दीक्षांत समारोह में पहुंचे तो उनसे कोई बांध या पुल बनाने की बात नहीं कर रहे थे. नेहरू कह रहे थे कि बहुत नाजुक वक्त है, बड़े बदलाव का वक्त है. हमें इस वक्त में इस मुल्क को बनाना है.
21 अप्रैल 1956 को नेहरू न सिर्फ IIT खड़गपुर से पास हुए देश के पहले 150 इंजीनियर्स के दीक्षांत समारोह में पहुंचे, बल्कि यहां चार साल में बनकर तैयार हुई भव्य इमारत का भी नजारा लिया.
जब नेहरू देश के नए इंजीनियर्स को संबोधित कर रहे थे तो उनसे कोई बांध या पुल बनाने की बात नहीं कर रहे थे. नेहरू कह रहे थे कि बहुत नाजुक वक्त है, बड़े बदलाव का वक्त है. हमें इस वक्त में इस मुल्क को बनाना है. इस महान काम से ऐसे जुड़ना है कि उसकी महानता के कुछ छींटे बनाने वालों पर भी आ जाएं.
नेहरू बोल रहे थे और जैसे इतिहास कान खड़े कर उस महान सपने को सुन रहा था, जो सपना नहीं भविष्य के भारत की हकीकत था. नेहरू ने कहा: नए ग्रेडुएट्स को देखता हूं तो मेरे दिल में जो बात उठती है, वह एक किस्म की ईर्ष्या है. वैसे ईर्ष्या इसके लिए एकदम सही लफ्ज नहीं है, लेकिन कोई और लफ्ज मेरे जेहन में आ ही नहीं रहा है.क्योंकि मैं उन्हें अपने कैरियर में आगे निकलते देख रहा हूं. वैसे तो यह हर नौजवान लड़के या लड़की के लिए एक्साइटिंग मौका होता है, लेकिन ये लोग एक ऐसे समय निकल रहे हैं,जिसकी उनके लिए और इस मुल्क के लिए खास अहमियत है. एक बारगी लगता है कि ऐसा कहकर कहीं मैं भारत के साथ भेदभाव तो नहीं कर रहा. मैं ऐसा कहने से खुद को नहीं रोक सकता, क्योंकि भारत मेरे खून में,मेरी हड्डियों में और हर चीज में और मेरे ख्यालों में, हर जगह शामिल है.
मैं इस भारत को आज की दुनिया और इसके पुराने इतिहास के वृहत्तर संदर्भ में देखता हूं. जब मैं इस तरह से देखता हूं तो मुझे लगता है कि दुनिया में जीने के लिए इस समय भारत से ज्यादा एक्साइटिंग दूसरी कोई जगह नहीं है. गौर करिए मैं एक्साइटिंग शब्द का प्रयोग कर रहा हूं.
मैं आरामदायक और दूसरे किसी खुशनुमा लफ्ज का इस्तेमाल नहीं कर रहा हूं. भारत रहने के लिए एक कठिन जगह है और कठिन जगह रहेगा. इसके बारे में कोई मुगालता नहीं होना चाहिए. भारत में मजे से रहने के लिए कोई जगह नहीं है. यहां आराम के लिए भी बहुत गुंजाइश नहीं है, हालांकि कभी-कभी आराम भी अच्छा होता है. लेकिन भारत में सख्त, एक्साइटिंग, रचनात्मक और जोखिम भरा जीवन बिताने के लिए जगह ही जगह है. इसीलिए मैंने कहा कि मुझे इन नौजवान लड़के-लड़कियों से जिन्होंने एक खास किस्म की ट्रेनिंग हासिल कर ली है और जो भारत के इतिहास के एक खास मुकाम पर अपना सफर शुरू करने वाले हैं,उनसे मुझे ईर्ष्या हो रही है.
वैसे शिकायत करने की मेरे पास कोई वजह नहीं है, क्योंकि मेरी पीढ़ी के लोगों ने भी खूब एक्साइटिंग जिंदगी बिताई और हर तरह के जोखिम का लुत्फ उठाया. हमने भी बहुत सी चीजों को होते हुए देखा है. एक वक्त ऐसा था और वह वक्त अभी गुजरा नहीं है,जब हम हर तरह के ख्वाबों में मुब्तला थे.
और उन ख्वाबों के लिए काम करने में मजा आता था. और फिर हमने उन ख्वाबों को हकीकत में बदलते देखा. जिंदगी में बड़े काम से जुड़ना और फिर उसे पूरा होते देखने से बड़ा कोई सुख नहीं है. क्योंकि हमने खुद को एक बड़े काम से जोड़ लिया था,इसलिए उस काम की महानता हम पर भी नाज़िल हुई.
आप जितना ऊंचा सोचते हैं, आप उतना ही ऊंचा करते हैं. जब उद्देश्य महान होता है तो उस महानता का कुछ अंश आप में भी आ जाता है. अगर आप छोटी चीजों में पड़ जाओगे, तो छोटे रह जाओगे. लेकिन अगर आप हिम्मत करोगे और जिंदगी में बड़ी चीजों के पीछे जाओगे और उन्हें पूरा करने की जीतोड़ कोशिश करोगे तो उस पूरी कवायद में आप भी बड़े हो जाओगे.’’
पीयूष बबेले की पोस्ट से साभार
