यह घटना भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास की एक अनूठी मिसाल है—जहाँ एक अत्यंत लोकप्रिय प्रधानमंत्री ने सत्ता छोड़ने की आधिकारिक तौर पर इच्छा जताई।
मोदीजी द्वारा नेहरू जी का प्रधानमंत्री रहने का रिकॉर्ड तोड़ देने की चर्चा कल से जारी है । RSS/जनसंघ/बीजेपी के नेताओं में नेहरू फोबिया पुरानी बीमारी है ।
आइये archive से नेहरू जी के बारे में दर्ज एक और बेहद महत्वपूर्ण प्रसंग की चर्चा कर लेते हैं जो उनके व्यक्तित्व की ऐसी झलक पेश करता है जिससे पता चलता है कि वे ऐसी तुलनाओं के लिए बने ही नहीं हैं ।
उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के आधार पर यह घटना 1958 की है। नेहरू जी के नेतृत्व में काँग्रेस दूसरे आमचुनाव में भी विजयी हो चुकी थी कि नेहरू जी ने अपने पद से इस्तीफ़े की पेशकश सार्वजनिक कर दी ।
क्या हुआ था?
1957 के आम चुनाव में भारी जीत के बाद जवाहरलाल नेहरू ने अपना तीसरा प्रधानमंत्रित्व कार्यकाल शुरू किया। उस समय वे लगभग 10 वर्ष से लगातार प्रधानमंत्री थे। कांग्रेस को फिर से स्पष्ट जनादेश मिला था।
लेकिन अगले ही वर्ष, अप्रैल 1958 में नेहरू ने सार्वजनिक रूप से यह संकेत दिया कि वे प्रधानमंत्री पद से हटकर कुछ समय का अवकाश लेना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि वे स्वयं को “थका हुआ” और “कुछ हद तक जड़” महसूस कर रहे हैं तथा उन्हें शांत चिंतन और नई ऊर्जा की आवश्यकता है। उन्होंने छह महीने के लिए हिमालयन ट्रैकिंग का एक प्रोग्राम भी बना लिया था । उनके वक्तव्यों से यह स्पष्ट था कि वे सत्ता को स्थायी पद नहीं मानते थे और नेतृत्व परिवर्तन को लोकतांत्रिक दृष्टि से स्वाभाविक समझते थे।
उन्होंने कहा कि “दस साल देश की सेवा कर ली, अब कोई और ज़िम्मेदारी संभाले”?
उपलब्ध अभिलेखों से यह स्पष्ट है कि नेहरू ने वास्तव में लंबे कार्यकाल, थकान और परिवर्तन की आवश्यकता की बात की थी।
अब इस प्रस्ताव पर देश और दुनिया में जो प्रतिक्रिया हुई वह बेहद महत्वपूर्ण है ।
1 मई 1958 को कांग्रेस संसदीय दल ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर नेहरू के पद छोड़ने के विचार का विरोध किया। प्रस्ताव में कहा गया कि पार्टी उनके बिना नेतृत्व की कल्पना नहीं कर सकती और उस समय देश तथा विश्व की जटिल परिस्थितियों में उनका नेतृत्व आवश्यक है।
इसके बाद नेहरू को पार्टी नेताओं, सांसदों और देशभर से बड़ी संख्या में पत्र और अपीलें मिलीं। समाचार पत्रों में प्रकाशित पाठकों के पत्र और संपादकीय विश्लेषण इसी तरह की भावनाओं की अभिव्यक्ति कर रहे थे । देशवासी अचानक सकते में आ गए थे।
ऐतिहासिक संकलनों में उल्लेख मिलता है कि उस समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नेहरू के बने रहने की इच्छा व्यक्त की गई थी। विशेष रूप से अमेरिकी राष्ट्रपति Dwight D. Eisenhower ने नेहरू के पद पर बने रहने की इच्छा व्यक्त की थी, क्योंकि शीत युद्ध के दौर में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही थी।
जहाँ तक Nikita Khrushchev का प्रश्न है, लोकप्रिय विवरणों में उनका नाम आता है, लेकिन उपलब्ध प्राथमिक स्रोतों में आइजनहावर वाला संदर्भ अधिक स्पष्ट मिलता है।
अंततः 3 मई 1958 को नेहरू ने कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में कहा कि लोगों की प्रतिक्रियाओं और संभावित परिणामों पर विचार करने के बाद वे अपना प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ाएँगे। उन्होंने स्वीकार किया कि वे पार्टी की इच्छा का सम्मान करेंगे और पद पर बने रहेंगे।
यह घटना भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास की एक दिलचस्प मिसाल है—जहाँ एक अत्यंत लोकप्रिय प्रधानमंत्री ने सत्ता छोड़ने की आधिकारिक तौर पर इच्छा जताई, जबकि पार्टी और व्यापक राजनीतिक वर्ग ने उनसे बने रहने का आग्रह किया।
शीतल पी सिंह की पोस्ट से साभार
