जो लोग एक अच्छा संस्थान नहीं बना पाए, वे भोपाल की उस महान हस्ती के नाम से बनी यूनिवर्सिटी का नाम बदल रहे हैं जिसने आज़ाद हिंद फौज से बहुत पहले एक निर्वासित सरकार बनाई थी।
जो लोग एक अच्छा संस्थान नहीं बना पाए, वे भोपाल की उस महान हस्ती के नाम से बनी यूनिवर्सिटी का नाम बदल रहे हैं जिसने आज़ाद हिंद फौज से बहुत पहले एक निर्वासित सरकार बनाई।
बरकतउल्ला खां (मौलाना बरकतउल्ला) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के उन महान नायकों में से एक हैं, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए घरेलू ज़मीन पर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्रांति का बिगुल फूंका। भोपाल में जन्मे मौलाना बरकतउल्ला ने अपनी पूरी ज़िंदगी मातृभूमि को अंग्रेजी हुकूमत से आज़ाद कराने में झोंक दी।
भारत की आज़ादी में उनके अमूल्य योगदान पर एक विस्तृत लेख नीचे दिया गया है:
1. प्रारंभिक जीवन और भोपाल से जुड़ाव
मौलाना बरकतउल्ला का जन्म 7 जुलाई 1854 (कुछ स्रोतों के अनुसार 1859) को भोपाल के इतवारा क्षेत्र में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा भोपाल में ही हुई, जहाँ उन्होंने अरबी, फारसी और इस्लाम की गहरी शिक्षा ली। वे बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे और भाषाओं पर उनकी ज़बरदस्त पकड़ थी। भोपाल से शुरुआती पढ़ाई के बाद वे बॉम्बे (मुंबई) और फिर इंग्लैंड चले गए, जिसने उनके राजनीतिक और क्रांतिकारी जीवन की नींव रखी।
2. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्रांति की शुरुआत
बरकतउल्ला खां का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने भारत की आज़ादी की लड़ाई को वैश्विक मंच पर पहुँचाया। उन्होंने भांप लिया था कि अंग्रेजों को हराने के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन और दबाव ज़रूरी है।
- गदर पार्टी की स्थापना: अमरीका और कनाडा में रह रहे भारतीयों के साथ मिलकर उन्होंने ‘गदर पार्टी’ के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने लाला हरदयाल और सोहन सिंह भकना जैसे दिग्गजों के साथ मिलकर ‘गदर’ अखबार के माध्यम से विदेशों में रह रहे भारतीयों में देशभक्ति की अलख जगाई।
- जापान और यूरोप में प्रचार: वे जापान के टोक्यो विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे, जहाँ उन्होंने अपने व्याख्यानों और लेखों के जरिए ब्रिटिश साम्राज्य की दमनकारी नीतियों को बेनकाब किया। इसके बाद वे जर्मनी गए, जहाँ उन्होंने ‘बर्लिन कमेटी’ के साथ मिलकर भारत की आज़ादी की योजनाएं बनाईं।
3. भारत की पहली निर्वासित सरकार (Provisional Government)
मौलाना बरकतउल्ला के जीवन का सबसे ऐतिहासिक पल 1915 में आया, जब प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में भारत की पहली अस्थायी (निर्वासित) सरकार का गठन किया गया।
इस सरकार के राष्ट्रपति राजा महेंद्र प्रताप थे।मौलाना बरकतउल्ला को इस सरकार का प्रधानमंत्री बनाया गया।
इस सरकार का उद्देश्य दुनिया के अन्य देशों (जैसे रूस, जर्मनी और तुर्की) से संपर्क साधकर भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ सैन्य और राजनीतिक मदद जुटाना था।
4. ‘रेशमी रूमाल आंदोलन’ (Silk Letter Movement) में भूमिका
अंग्रेजों के खिलाफ देवबंद के उलेमाओं द्वारा शुरू किए गए ‘रेशमी रूमाल आंदोलन’ में भी बरकतउल्ला खां की अहम भूमिका थी। इस गुप्त आंदोलन के तहत पीले रेशमी कपड़ों पर कूटभाषा (Secret Codes) में पत्र लिखकर विदेशों से हथियारों और सैनिकों की मदद मांगी जा रही थी। हालांकि, यह योजना समय से पहले उजागर हो गई, लेकिन इसने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाकर रख दी थी।
5. हिंदू-मुस्लिम एकता के अग्रदूत
मौलाना बरकतउल्ला का मानना था कि भारत तब तक आज़ाद नहीं हो सकता, जब तक हिंदू और मुस्लिम एक होकर न लड़ें। उन्होंने धर्म को कभी अपनी राजनीति पर हावी नहीं होने दिया। विदेश में रहकर भी वे राजा महेंद्र प्रताप, ओबैदुल्लाह सिंधी और लाला हरदयाल जैसे विभिन्न विचारधाराओं और धर्मों के लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करते रहे।
अंग्रेजी हुकूमत के लिए मौलाना बरकतउल्ला इतने बड़े खतरे बन चुके थे कि ब्रिटिश सरकार ने उन पर लगातार नज़र रखी और उन्हें भारत लौटने नहीं दिया। देश की आज़ादी का यह महान सिपाही अपनी मातृभूमि की मिट्टी को दोबारा छुए बिना, 20 सितंबर 1927 को अमरीका के कैलिफोर्निया में दुनिया को अलविदा कह गया। उन्हें मैरीसविले (कैलिफोर्निया) में सुपुर्द-ए-खाक किया गया।
आज़ादी के बाद, भोपाल और पूरे देश ने उनके योगदान को याद रखा। उनके सम्मान में भोपाल के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय का नाम बरकतउल्ला विश्वविद्यालय’ (Barkatullah University)रखा गया, जो आने वाली पीढ़ियों को इस महान स्वतंत्रता सेनानी के त्याग और संघर्ष की याद दिलाता रहता है। लेकिन आज संघी इस महान क्रांतिकारी का नाम संस्थान से हटाना चाहते हैं।
साभार पंकज चतुर्वेदी
