आज से 70 साल पहले देश का प्रधानमंत्री अपनी विफलताओं का जिम्मा अपने सर लेता था और देश की आवाम और देश की खुशहाली के लिए अपने आवास में खेती करवा रहा था इसके उलट आज आलीशान महल बनाए जा रहे हैं प्रधानमंत्री के निवास हेतु जबकि भारत आज भी भुखमरी के दलदल में धंसा हुआ है।
19 फरवरी 1952 को नई दिल्ली में हुए राज्यों के खाद्य मंत्रियों के सम्मेलन में नेहरू ने कहा, ‘‘हम खाने के सवाल को लापरवाही से नहीं ले सकते, क्योंकि इसका मतलब होगा कि जनता को भूख से मर जाने दें।
आपको याद होगा कि कोई तीन साल पहले हमने कहा था कि 1952 की शुरुआत में हम खुद को खाने के मामले में आत्मनिर्भर बना लेंगे हम ऐसा नहीं कर सके, लेकिन योजना आयोग ने खाने के मामले में आत्मनिर्भर होने का मुद्दा नहीं छोड़ा है, आयोग का मानना है कि भोजन के मामले में इतनी जल्दी आत्मनिर्भर होना संभव नहीं है, लेकिन आत्मनिर्भर होने के मामले में तारीख तय करना जरूरी है, मैं अकेले इसे तय नहीं कर सकता, हम लोग साथ बैठकर इसे तय करेंगे, लेकिन अंततः यह योजना आयोग होगा जो ज्यादा व्यावहारिक तारीख तय करेगा।’’
इतना बड़ा लक्ष्य हाथ से फिसलने के बाद सरकारों की सामान्य प्रवृत्ति यह होती है कि वे नए कार्यक्रम की चर्चा करती है और पुराने का जिक्र तक नहीं करतीं,लेकिन नेहरू ने ऐसा नहीं किया।
उन्होंने कहा, ‘‘मैं स्वीकार करता हूं कि मुझे इस बात से गहरा धक्का लगा कि हम तय तारीख पर खाने के मामले में आत्मनिर्भर नहीं बन सके,न सिर्फ सरकार बल्कि मैं खुद भी बराबर तारीख पर जोर देता रहा और अब इस वादे पर खरा न उतरने के बाद, मुझे लगता है कि मैंने लोगों को दिया वचन भंग कर दिया।’’
‘‘इस जमाने में हमारे मुल्क में मुसीबतें गुजरीं, प्रकृति ने भी मुसीबतें भेजीं,इन बरसों में बारिश नहीं हुई, जलजले आए, भूकंप आए, क्या-क्या हुआ आप जानते हैं;खैर, कुछ पलटा हमने खाया,इन बातों पर हमने काबू किया और दूसरे सालों के मुकाबले में हमारा हाल जरा अच्छा हुआ, बारिश भी अच्छी हुई,कुछ इस वक्त मुल्क में खाने का सवाल भी अच्छा है, कपड़े का भी अच्छा है, अच्छा तो है, लेकिन फिर भी आप याद रखें कि यह बड़ा मुल्क है और इस बड़े मुल्क में कोई न कोई हिस्सा ऐसा रहता है, जहां कोई न कोई मुसीबत आती रहती है,आजकल ज्यादातर मुल्क में पानी बरसा, ज्यादातर खेती अच्छी हो रही है, खाने के सामान की पैदावार अच्छी है, लेकिन उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, आजमगढ़, देवरिया और बस्ती के कुछ उधर के जिले हैं बिहार के, कुछ बंगाल में हैं, सुंदरबन का इलाका,मद्रास की तरफ रायलसीमा है, मैसूर के कुछ जिले हैं, कुछ राजस्थान में,कुछ सौराष्ट में, जहां काफी मुश्किल है,काफी गरीबी है,काफी खाने की कमी है।”
सोचिये आज से 70 साल पहले देश का प्रधानमंत्री अपनी विफलताओं का जिम्मा अपने सर लेता था और देश की आवाम और देश की खुशहाली के लिए अपने आवास में खेती करवा रहा था इसके उलट आज आलीशान महल बनाए जा रहे हैं प्रधानमंत्री के निवास हेतु जबकि भारत आज भी भुखमरी के दलदल में धंसा हुआ है।
पण्डित नेहरू के बारे में कोई भी राय कहासुनी में बना लेना सरल है पर पण्डित नेहरू के जज्बे,उनके देशप्रेम,उनकी उदारता,उनकी कर्मठता को समझना साधारण नही है।
©…✍️ Pramod Singh की पोस्ट से साभार
गांधीयुग महासेना
संलग्न फोटो -अप्रैल 1952 में तीनमूर्ति भवन (तात्कालीन प्रधानमंत्री आवास) में गेहूं की कटाई करतीं पण्डित नेहरू की बिटिया इंदिरा गांधी
