जब नेहरूजी ने दी चंद्रशेखर आजाद को आर्थिक सहायता: पियूष बबेले

चंद्रशेखर आजाद के सहयोगी क्रांतिकारी और हिंदी के मूर्धन्‍य साहित्‍यकार यशपाल ने अपनी आत्‍मकथा सिंहावलोकन में इस घटना का वर्णन किया है। वे लिखते है कि मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल क्रांतिकारियों की अक्‍सर आर्थिक मदद करते रहते थे।

इलाहाबाद के अल्‍फ्रेड पार्क में पुलिस और क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद के बीच मुठभेड़ चल रही थी। दोनों तरफ से तड़ातड़ गोलियां दागी जा रही थीं। आजाद का एक साथी गोलियों की बौछार के बीच पीछे से बच निकला। आजाद घिर गए और अपनी कनपटी पर पिस्‍तौल रखकर गोली मार ली।

पुलिस काफी देर तक उनके शव तक पहुंचने की हिम्‍म्‍त नहीं जुटा सकी, डर था कि कहीं जान बाकी हुई तो आजाद एक-दो को और निपटाकर ही दम लेगा।

पुलिस ने जब शव की तलाशी ली तो उनकी जेब से 500 रुपये मिले। ये नोट कहां से आए थे, किसी को नहीं पता था। असल में यह नोट उस आर्थिक सहायता का हिस्‍सा थे जो दो-तीन दिन पहले पंडित जवाहरलाल नेहरू ने क्रांतिकारियों के लिये भिजवाई थी।

चंद्रशेखर आजाद के सहयोगी क्रांतिकारी और हिंदी के मूर्धन्‍य साहित्‍यकार यशपाल ने अपनी आत्‍मकथा सिंहावलोकन में इस घटना का वर्णन किया है।

यशपाल बताते हैं कि पंडित नेहरू के पिता पंडित मोतीलाल नेहरू क्रांतिकारियों की अक्‍सर आर्थिक मदद करते रहते थे। उनकी मृत्‍यु के बाद उनके पुत्र जवाहरलाल भी यही काम करते थे। इन्‍हीं रिश्‍तों के बीच चंद्रशेखर आजाद एक दिन आनंद भवन में पंडित जवाहरलाल से मिलने पहुंचे। आजाद यह जानना चाहते थे कि इरविन के साथ होने वाले समझौते से क्‍या क्रांतिकारियों पर चल रहे मुकदमे वापस हो सकेंगे, फरारी काट रहे क्रांतिकारी सार्वजनिक जीवन में आ सकें और जेल में बंद क्रांतिकारी रिहा हो सकेंगे। नेहरू जी जो खुद इरविन समझौते को लेकर बहुत उत्‍साहित नहीं थे, उन्‍होंने आजाद से कहा कि इसकी संभावना बहुत कम है। असल में सरकार की निगाह में तो ये देशभक्‍त क्रांतिकारी न होकर जघन्‍य अपराधी थे।

इस बातचीत के बाद आजाद वापस चले आए। इस मुलाकात का जिक्र नेहरू जी ने अपनी आत्‍मकथा में भी किया है। लेकिन इसके एक-दो दिन बाद आजाद ने यशपाल को नेहरू जी से मिलने भेजा। यशपाल ने आनंद भवन के बगीचे में टहलते हुए ही नेहरू जी से लंबी बातचीत की। यशपाल ने उनसे कहा कि वे और कुछ क्रांतिकारी सोवियत संघ जाना चाहते हैं ताकि वहां की व्‍यवस्‍था और क्रांति के बारे में और ज्‍यादा जान सकें। वे चाहते थे कि नेहरू जी इसके लिये आर्थिक सहायता कर दें।

यह वही समय था जब पंडित नेहरू खुद आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे। बाप-बेटे दोनों ने ही कब की वकालत छोड़ दी थी और पुरानी जमा पूंजी से ही काम चला रहे थे। इस पुरानी जायदाद के कुछ हिस्‍सों को समय-समय पर पुलिस जब्‍त कर लेती थी।

लेकिन नेहरू ने पूछा कि कितने पैसे चाहिए। यशपाल ने कहा कोई 5000 रुपये। नेहरू जी ने कहा, ठीक है, मैं इंतजाम करता हूं। उसके दो-तीन दिन बाद एक विश्‍वस्‍त व्‍यक्ति के हाथ से पंडित जी ने 1500 रुपये की पहली किश्‍त यशपाल को भिजवा दी।

यशपाल को पता था कि पुलिस उन लोगों के पीछे है। एक ही हाथ में सारा पैसा रखना मुश्किल को दावत देना है। उन्‍होंने 500 रुपये आजाद की जेब में डाल दिये, पांच सौ दूसरे मित्र की और पांच सौ अपने पास रखे।

मुठभेड़ के बाद यही पांच सौ रुपये चंद्र शेखर आजाद की जेब से बरामद हुए जो पंडित नेहरू ने दिये थे।

गजब की बात यह है कि पंडित नेहरू ने अपनी आत्‍मकथा में आजाद से उस मुलाकात का जिक्र तो किया जिसमें कोई मदद नहीं कर सके, लेकिन आर्थिक सहायता देने की बात अपने मुंह से नहीं कही। यही तो उस जमाने की रवादारी थी। यही तो नेहरू का बड़प्‍पन था।
(पियूष बबेले की पोस्ट से साभार)

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