जब इंदिरा गांधी ने अपने पूरे गहने राष्ट्र को समर्पित कर दिए

सन 1962 में भारत और चीन के बीच युद्ध चल रहा था।इंदिरा गांधी ने अपने निजी सोने के गहने राष्ट्र को समर्पित करने का निर्णय लिया और अपना गहनों का डिब्बा आधिकारिक तौर पर नेशनल डिफेंस फंड में जमा करा दिया।

सन 1962 में भारत और चीन के बीच युद्ध चल रहा था और देश पर अचानक बहुत बड़ा आर्थिक और सैन्य बोझ आ पड़ा था। उस समय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने नागरिकों से अपील की कि वे नेशनल डिफेंस फंड और डिफेंस ऑफ इंडिया फंड के लिए धन, सोना और गहने दान करें, ताकि सेना की ज़रूरतें और युद्ध का खर्च पूरा किया जा सके। इस अपील के बीच इंदिरा गांधी ने अपने निजी सोने के गहने राष्ट्र को समर्पित करने का निर्णय लिया और अपना गहनों का डिब्बा आधिकारिक तौर पर नेशनल डिफेंस फंड में जमा करा दिया। उपलब्ध जानकारियों में यह उल्लेख मिलता है कि उनके द्वारा दान किए गए आभूषणों का कुल वजन लगभग 336 ग्राम था और इन्हें औपचारिक रूप से रक्षा प्रयोजनों के लिए कोष में जोड़ा गया

इंदिरा गांधी के इस कदम के साथ ही देश भर में अनेक सामान्य नागरिकों, विशेषकर महिलाओं ने भी अपने गहने दान करने शुरू कर दिए; कई जगह महिलाओं ने चूड़ियाँ, अंगूठियाँ और यहाँ तक कि मंगलसूत्र तक दान पेटियों में डाल दिए, और बच्चों ने अपनी गुल्लकें तोड़कर रुपये-पैसे दिए। अनुमानित तौर पर नेशनल डिफेंस फंड और अन्य रक्षा कोषों के लिए नकद और गहनों के रूप में लगभग 22 करोड़ रुपये (उस समय की कीमत के अनुसार) से अधिक का योगदान इकट्ठा हुआ, जो आज की कीमतों में बहुत बड़ी राशि के बराबर माना जाता है। बाद में कुछ शोधों में यह भी बताया गया कि उस समय दान में आए सोने और गहनों का एक बड़ा हिस्सा आज भी भारतीय रिजर्व बैंक के वॉल्ट में सुरक्षित रखा हुआ माना जाता है और पूरी तरह से पिघलाकर या नीलाम कर उपयोग नहीं किया गया। इस पूरे प्रसंग को 1962 के समय के त्याग, राष्ट्रभक्ति और सार्वजनिक भागीदारी के उदाहरण के रूप में याद किया जाता है

इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ जब आज की राजनीति में पीएम‑केयर्स फंड पर चर्चा होती है, तो कुछ लोग एक आलोचनात्मक तुलना खींचते हैं। एक तरफ़ 1962 में इंदिरा गांधी अपना निजी सोना राष्ट्रीय रक्षा कोष में दान करती हैं और दूसरी तरफ़, आज केन्द्र सरकार का रुख यह रहा है कि PM CARES को “पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट” माना जाए, न कि कोई वैधानिक सरकारी फंड; सरकार ने अदालतों और आरटीआई से जुड़े मामलों में यह स्थिति रखी है कि यह फंड आरटीआई कानून के तहत “पब्लिक अथॉरिटी” नहीं है

आरटीआई के तहत कई बार जब नागरिकों ने PM CARES के दान‑दाताओं, उपयोग, या विस्तृत ऑडिट की जानकारी माँगी, तो प्रधानमंत्री कार्यालय ने यह कहते हुए जानकारी देने से इनकार किया कि यह फंड आरटीआई के दायरे में नहीं आता

और आज पारदर्शिता ना मानने वाले जब इंदिरा और नेहरू जी पर सवाल उठाते हैं तो एक कहावत चरितार्थ होती है सूप बोले से बोले चलनी बोले जिसमे छप्पन छेद ।
(नेहरू रिव्यू से साभार)

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