जब नेहरू ने चुनाव जल्दी कराने का दबाव डाला, तो सुकुमार सेन ने प्रधानमंत्री से साफ कहा कि उन्हें इंतज़ार करना होगा।इस टकराव से दोनों के बीच सम्मान का रिश्ता मजबूत हुआ नेहरू ने प्रशासनिक स्वायत्तता का सिद्धांत व्यवहार में लागू किया, और सेन ने साबित किया कि एक ईमानदार नौकरशाह लोकहित के लिए राजनीतिक दबाव का सामना कर सकता है।
आजाद भारत की सबसे बड़ी चुनौती थी लोकतंत्र को कागज़ से निकालकर ज़मीन पर उतारना। संविधान सभा सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का सिद्धांत स्वीकार कर चुकी थी, लेकिन यह केवल शब्द थे; सवाल था कि लगभग 17–18 करोड़ लोगों को, जिनमें से विशाल बहुमत निरक्षर और गरीब था, कैसे वोट दिलाया जाए। 1950 में चुनाव आयोग का गठन हुआ और मार्च 1950 में सुकुमार सेन को भारत का पहला मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया। संसद ने लगभग उसी समय जन प्रतिनिधित्व कानून पारित किया और पूरे देश के पहले आम चुनाव की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई।
यहीं से उनका और जवाहरलाल नेहरू का संबंध एक दिलचस्प, रूप लेता है। नेहरू के लिए चुनाव केवल संवैधानिक औपचारिकता नहीं थे, बल्कि एक प्रकार की वैधता की खोज थे; वे चाहते थे कि 1951 की बसंत तक चुनाव हो जाएँ ताकि दुनिया को दिखाया जा सके कि नया भारत सचमुच जनता के मत से चलने वाला लोकतंत्र है। दूसरी ओर, सुकुमार सेन गणितज्ञ और प्रशासक की दृष्टि से इस काम को देख रहे थे। उन्हें साफ दिख रहा था कि इतने कम समय में मतदाता सूची तैयार करना, चिह्न तय करना, मतपेटियाँ बनवाना, बूथ बनाना और कर्मचारियों को प्रशिक्षित करना लगभग असंभव और खतरनाक होगा
जब नेहरू ने चुनाव जल्दी कराने का दबाव डाला, तो सुकुमार सेन ने शायद अपने कैरियर की सबसे निर्णायक प्रशासनिक प्रतिक्रिया दी उन्होंने प्रधानमंत्री से साफ कहा कि उन्हें इंतज़ार करना होगा। उन्होंने बताया कि यह काम सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि देश की छवि, लोकतांत्रिक मूल्यों और भविष्य के भरोसे की परीक्षा है, और यदि जल्दबाज़ी में गलती हुई तो उसकी भरपाई संभव नहीं होगी। यह वह क्षण था जब एक निर्वाचित, लोकप्रिय प्रधानमंत्री और एक नियुक्त, अपेक्षाकृत गुमनाम सिविल सेवक आमने‑सामने खड़े थे, और इतिहास गवाही देता है कि नेहरू ने सेन के गणित, तर्क और ईमानदारी के आगे कदम पीछे खींच लिए। इस टकराव से दोनों के बीच सम्मान का रिश्ता मजबूत हुआ नेहरू ने प्रशासनिक स्वायत्तता का सिद्धांत व्यवहार में लागू किया, और सेन ने साबित किया कि एक ईमानदार नौकरशाह लोकहित के लिए राजनीतिक दबाव का सामना कर सकता है।
इसके बाद सुकुमार सेन ने पूरे धैर्य और सूक्ष्म योजना के साथ भारत के पहले आम चुनाव का खाका तैयार किया। सबसे पहले उन्होंने मतदाता सूची के काम को एक राष्ट्रव्यापी सामाजिक अभियान में बदल दिया। 176 मिलियन से अधिक योग्य मतदाताओं की पहचान, नाम, आयु और पता दर्ज करने के लिए घर‑घर सर्वे कराया गया। कई परंपरागत परिवारों में महिलाएँ अपने नाम बताने से झिझकती थीं और “फलाँ की पत्नी, फलाँ की बेटी” के रूप में ही दर्ज होना चाहती थीं। सेन ने सिद्धांततः यह तय किया कि इस तरह की प्रविष्टियाँ स्वीकार नहीं होंगी; जिनके नाम स्वतंत्र रूप से दर्ज नहीं हुए, उन्हें मतदाता सूची से हटा दिया गया, जिसके कारण लगभग 28 लाख महिलाएँ पहले चुनाव में वोट नहीं दे सकीं। यह निर्णय मानवीय दृष्टि से कठोर था, पर दीर्घकाल में इसने राजनीतिक नागरिकता को ‘स्वतंत्र व्यक्ति’ की अवधारणा से जोड़कर महिला पहचान के लिए एक नया मानक तय किया
निरक्षर मतदाताओं के लिए उन्होंने चुनाव चिन्हों की अभिनव व्यवस्था की। हर दल‑उम्मीदवार को पेड़, बैल की जोड़ी, दीपक, कमल आदि जैसे चिन्ह दिए गए, जो बैलेट पेपर और मतपेटियों पर छपते थे, ताकि पढ़‑लिख न सकने वाला मतदाता भी अपने पसंदीदा उम्मीदवार को आँखों से पहचान सके। उन्होंने मतदान की प्रक्रिया को चरणबद्ध बनाया; अक्टूबर 1951 से फरवरी 1952 तक अलग‑अलग राज्यों और इलाकों में चुनाव करवाए गए, ताकि बारिश, बर्फ, दुर्गम पहाड़ और नदियों से कटे इलाकों की व्यावहारिक कठिनाइयों से निपटा जा सके। लाखों मतपेटियाँ बनवाने के लिए स्टील की भारी मात्रा जुटाई गई, दो लाख से अधिक मतदान केंद्र स्थापित किए गए और लाखों कर्मचारियों‑पुलिसकर्मियों का एक विशाल नेटवर्क खड़ा किया गया जो गाँव‑गाँव, कस्बे‑कस्बे पहुँचा
चुनाव की निष्पक्षता के लिए सेन ने कठोर अनुशासन अपनाया। एक व्यक्ति एक वोट के सिद्धांत को सुनिश्चित करने के लिए नामावली की सख्त जाँच, बूथ स्तर पर पहचान और जहाँ‑जहाँ संभव हो अमिट स्याही जैसे उपाय अपनाए गए, जिससे दोहरी वोटिंग के खतरे को कम किया जा सके। इस पूरी प्रक्रिया को उन्होंने विशेषज्ञ की तरह डिज़ाइन किया और सिपाही की तरह लागू कराया। नतीजा यह हुआ कि दुनिया भर के पर्यवेक्षकों ने इस चुनाव को लोकतांत्रिक इतिहास की ‘अभूतपूर्व’ उपलब्धि माना और भारतीय चुनाव आयोग की संस्थागत साख स्थापित हो गई
1957 के दूसरे आम चुनाव की कमान भी सुकुमार सेन ने ही संभाली। इस बार चुनौती सिर्फ पैमाने की नहीं, संसाधनों की भी थी। पहली बार के चुनाव के लिए बनाई गई लाखों मतपेटियों को फेंककर नई बनवाने का विचार था, लेकिन सेन ने सरकारी धन की बचत के लिए इन्हीं मतपेटियों को दुबारा इस्तेमाल करने का निर्णय कराया, जिससे करोड़ों रुपये की बचत हुई।
पहले चुनाव की सफलता के बाद दुनिया ने भी इस चुपचाप काम करने वाले भारतीय अधिकारी की ओर ध्यान दिया। सूडान ने अपने पहले संसदीय चुनाव के लिए भारत से सहायता माँगी, और 1953 में सुकुमार सेन वहाँ के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में गए और सफलतापूर्वक चुनाव आयोजित करवाए। भारत सरकार ने उन्हें 1954 में पद्म भूषण से सम्मानित किया, जिसे आप केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की संस्थागत परिपक्वता की स्वीकृति भी कह सकते हैं।
(नेहरू रिव्यू से साभार)
