नेहरू का सम्बन्ध देश के बड़े क्रांतिकारियों से रहा

राजा महेन्द्रप्रताप, मौलाना बरकतउल्ला के अलावा नेता जी सुभाष चन्द्र बोस, एमएन राय, कर्मवीर पं. सुन्दर लाल, दुर्गा भाभी, दामोदर स्वरूप सेठ, कुमिल्ला में डीएम स्टीवेंस को उसके बंगले पर मारने वाली बंगाल की क्रांतिकारिणी शांति घोष, काकोरी केस के राजकुमार सिन्हा, झांसी बम कांड के लक्ष्मीकान्त शुक्ल, कानपुर के क्रांतिकारी नारायण प्रसाद अरोड़ा आदि से उनके रिश्ते को जानना सचमुच बहुत दिलचस्प और प्रेरक है ।

नेहरू का सम्बन्ध देश के बड़े क्रांतिकारियों से रहा । राजा महेन्द्रप्रताप, मौलाना बरकतउल्ला के अलावा नेता जी सुभाष चन्द्र बोस, एमएन राय, कर्मवीर पं. सुन्दर लाल, दुर्गा भाभी, दामोदर स्वरूप सेठ, कुमिल्ला में डीएम स्टीवेंस को उसके बंगले पर मारने वाली बंगाल की क्रांतिकारिणी शांति घोष, काकोरी केस के राजकुमार सिन्हा, झांसी बम कांड के लक्ष्मीकान्त शुक्ल, कानपुर के क्रांतिकारी नारायण प्रसाद अरोड़ा आदि से उनके रिश्ते को जानना सचमुच बहुत दिलचस्प और प्रेरक है ।

शांति घोष ने अपनी आत्मकथा ‘अरुण वह्नि’ में लिखा है कि उनके पिता ने, जब वे छात्रा थीं, उन्हें एक नाटिका में हिस्सेदारी करने जाने से रोकते हुए कहा था, ‘जवाहरलाल कारागार में हैं और युवराज का मनोरंजन करने के लिए लड़के-लड़कियां स्कूल जाएंगे, यह कभी नहीं हो सकता ।’ यह थी सुदूर बंगाल की धरती तक नेहरू की लोकप्रियता ।
नेहरू क्रांतिकारियों का बहुत सम्मान करते थे । यह सर्वविदित है कि ‘आज़ाद हिन्द फौज’ के सैनिकों पर चले मुकदमे में नेहरू ने वकील की हैसियत से पैरवी की थी ।

वे ‘आज़ाद हिन्द फौज डिफेन्स कमेटी’ में भी थे । नेहरू 1951 में चीन जाने वाले एक गुडविल मिशन का नेता बनाकर पं. सुन्दरलाल को वहां भेजा, जिसमें सदस्य के रूप में उनके साथ मुल्कराज आनन्द और आरके करंजिया जैसे लोगों को सम्मिलित किया गया था । चीन में सुन्दरलाल की माओ से भेंट हुई । एक समय के बड़े क्रांतिकारी और बाद को गांधी-मार्ग के अनुयायी बने सुन्दरलाल ने स्वयं नेहरू के बारे में लिखा है, ‘जवाहरलाल के साथ मेरा राजनीतिक संपर्क सन 1916 में हुआ था । वे भी अपने पिता की तरह जाति, संप्रदाय, वर्ण, धर्म और प्रान्तीयता के विचारों से ऊपर थे । वे भारतीय पहले थे और भारतीय अन्त में ।

अपने उदार दृष्टकोण में वे साधारण मानवजाति के विश्वासी थे और अगर अवसर मिलता तो वे अपने को विश्व का नागरिक कहना अधिक पसन्द करते । वे सभी जातियों की, बड़ी हों या छोटी, राजनैतिक आज़ादी के दृढ़ विश्वासी थे । विदेशी अधिकार से अपने देश को तथा अन्य पराधीन देशों को मुक्त करने के लिये काम करने को, उसके लिये जीने और, ज़रूरत हो तो, सभी प्रकार के त्याग करने को उनका दिल ललचाता था । फिर भी पहले पहल जवाहरलाल अत्यन्त स्पष्ट नहीं थे कि किस उपाय से हिन्दुस्तान को अंगरेजी राज से मुक्त कराया जाय ।

उन्होंने देखा कि भारत के लाखों-लाख लोगों के ऊपर महात्मा गांधी का अत्यंत व्यापक और बढ़ता हुआ प्रभाव है एवं महात्मा गांधी के उपायों ने राष्ट्र की कल्पना को प्रभावित कर रखा है । इसलिए वे बहुधा महात्मा गांधी को एक जादूगर कहते थे । सन् 1947 में, जब भारत को स्वतंत्रता मिली और देश में संसदीय सरकार की प्रतिष्ठा हुई तो गांधी जी दर्द भरे स्वर में बोले, ‘यह तो बला आ गई, इससे तो मुझे लड़ना पड़ेगा ।’

राजेन्द्र प्रसाद, बल्लभभाई पटेल और जवाहरलाल नेहरू जैसे प्रमुख कांग्रेस नेता इस पर गांधी जी से सहमत नहीं हुये । इस विषय पर जवाहरलाल और गांधी जी के बीच एक आलोचना में मैं उपस्थित था । गांधी जी द्वारा अपना दृष्टिकोण समझाने के बाद, मुझे याद है कि, जवाहरलाल ने उत्तर में ये शब्द कहे थे, ‘आप कहते हैं कि गवर्नमेण्ट छोड़ दें, मेरी समझ में नहीं आता, बड़ी जिम्मेदारी हम पर आई है, यह किस पर छोड़ दें ? अगर कल को कोई तंग-नज़र फ़िरके़वाराना पार्टी पावर में आ गई तो मुल्क का क्या होगा ?’ गांधी ने कहा था, ‘तुम बिल्कुल परवाह न करो, काले चोर के हाथ में गवर्नमेंट आने दो । अगर हम जनता को शिक्षित और मजबूत करेंगे, तो जो कुछ हम जनता की तरफ से कहेंगे तो जो भी गवर्नमेण्ट में होगा उसे वह करना पड़ेगा ।’

गांधी के तर्क या उनके दृष्टिकोण का जवाहरलाल और उनके साथियों पर कोई असर नहीं पड़ा । लेकिन इन मतभेदों के बावजूद गांधी और जवाहरलाल में एक दूसरे के लिये एक विशेष भावनात्मक आकर्षण था । अंशतः इसका कारण था जवाहरलाल की स्पष्टवादिता । वे समस्त साम्प्रदायिक संकीर्णता से पूर्णतः मुक्त थे । यही गांधी के दिल पर असर डालता है ।’

सुन्दरलाल कहते हैं, ‘जवाहरलाल ने मुझे संसद में केन्द्र मंत्रिमंडल में भी रखना चाहा, किन्तु मैंने इस तर्क से अपनी माफी चाही कि संसदीय कार्य मेरे उपयुक्त नहीं । फिर भी हम एक दूसरे को प्यार करते रहे । हम दोनों के बीच एक विषेश बन्धन था । हमारा दृढ़ असाम्प्रदायिक, धर्म-निरपेक्ष दृष्टिकोण । जवाहरलाल ने अपने प्रधानमंत्रित्व के प्रारम्भिक वर्षों में साम्प्रदायिक दानव के साथ जिस प्रकार संग्राम किया वह सराहनीय है । उन्हें असुविधाओं का सामना करना पड़ा, क्योंकि उनके मंत्रिमंडल के कई सहकर्मी साम्प्रदायिक विष के शिकार हो चुके थे ।
नेहरू रिव्यू से

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