1857 के मुक्ति संग्राम को व्यापक बनाने , उसे जुल्म -ओ – सितम , नाइंसाफी और विदेशी गुलामी के खिलाफ जन आक्रोश की विराट अभिव्यक्ति बनाने की , बेगम हजरत महल की बहुआयामी भूमिका और महत्वपूर्ण योगदान की चर्चा , सूरज और चांद के होने न होने जैसे घिसे मुहावरे की मोहताज नहीं है ।
1857 के भारतीय मुक्ति संग्राम के नेतृत्व कतार में बेहद खास शख्सियत बेगम हजरत महल , नवाब वाजिद अली शाह की कई पत्नियों में से एक थीं । 1857 के मुक्ति संग्राम की कमान अवध में बहुत फैसलाकुन ढंग से संंभालने वाली इस महिला का नाम दुनिया की कुछ चुनिंदा शीर्षस्थ बहादुर महिलाओं में शुमार है । आलमबाग की लड़ाई में उन्होंने अपनी सेना का नेतृत्व खुद किया था । पूरे अवध क्षेत्र का तूफानी दौरा किया और जनता की हर कतार को संगठित किया । उनमें क्रांति चेतना सुलगा दी ।
द टाइम्स के रिपोर्टर डब्ल्यू. एच. रसेल ने लिखा है — बेगम में गजब रणनीतिक क्षमता और तेजस्विता दिखती है । बेगम ने हमारे खिलाफ अनथक ,अखंड जंग की घोषणा की है 1857 के मुक्ति संग्राम को व्यापक बनाने , उसे जुल्म -ओ – सितम , नाइंसाफी और विदेशी गुलामी के खिलाफ जन आक्रोश की विराट अभिव्यक्ति बनाने की , बेगम हजरत महल की बहुआयामी भूमिका और महत्वपूर्ण योगदान की चर्चा , सूरज और चांद के होने न होने जैसे घिसे मुहावरे की मोहताज नहीं है । इतिहास बदलने और उससे अपनी कलंक गाथा साफ करने में लगे लोग कुछ भी कर लें ।
यह सही है कि इस मुस्लिम महिला के युद्ध मनोविज्ञान और रणकौशल को इतिहास से ज्यादा स्पेस लोक स्मृतियों में मिला । उनके स्वप्न , संघर्ष , आकांक्षा, संकल्प , अपने पुत्र के हवाले अवध की सत्ता और वहाँ जनता के लिए किये गये त्याग , उठायी गयी मुसीबतों को लिखित इतिहास में वह स्थान नही मिला जो दूसरे नायकों को मिला ।
कवयित्री, लेखिका, पत्रकार, श्रेष्ठ अनुवादक और सोशल – पॉलिटिकल एक्टिविस्ट मेरी दीदी वंदना मिश्रा ने 1857 के मुक्ति संग्राम में महिलाओं की भागीदारी अंकित करने के व्यापक संदर्भ में जरूर बेगम हजरत महल पर उल्लेखनीय शोध किया है ।
इतिहासकार रोज़ी लिउलिन जोंस लिखती हैं – ‘ हज़रत महल बहुत ही साधारण परिवार से थीं । उनके पिता अंबर अफ़्रीकी ग़ुलाम थे । उनकी माँ महेर अफ़ज़ा थीं जो अंबर के साथ थीं । वह लखनऊ के परीख़ाना संगीत स्कूल में संगीत सीखती थीं, इसलिए उन्हें ‘ महक परी ‘ कहा जाने लगा था ।
अपनी अच्छी शक्ल और अक्ल की वजह से उन्होंने वाजिद अली शाह का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था और वाजिद अली शाह ने मुता के द्वारा हज़रत महल को अपनी पत्नी बना लिया था । 1845 में उन्होंने एक बेटे को जन्म दिया जिसकी वजह से उनका रुतबा बढ़ गया और उन्हें महल का दर्जा दिया गया । 1850 वाजिद अली शाह ने न सिर्फ़ उन्हें तलाक दे दिया, बल्कि उन्हें अपने हरम से भी हटा दिया ।
रुद्रांग्शु मुखर्जी अपनी किताब ‘ अ बेगम एंड द रानी हज़रत महल एंड लक्ष्मीबाई इन 1857 ‘ में लिखते हैं — इसका मतलब ये हुआ कि जब वाजिद अली शाह को लखनऊ से अंग्रेज़ों ने निकाल कर कलकत्ता भेजा तो उनके दल में हज़रत महल नहीं थीं । अब वो बेगम नहीं रह गई थीं लेकिन जब उनका बेटा नवाब और मुग़ल बादशाह का वली यानी गवर्नर बन गया तो उन्हें अपने आप बेगम का ख़िताब दोबारा मिल गया । वो न सिर्फ़ विद्रोहियों बल्कि आम लोगों की नेता भी बन गईं ।
जुलाई, 1857 तक आद्य विद्रोही मंगल पांडे को ब्रिटिश अफ़सरों पर हमला करने के लिए बैरकपुर में फांसी दी जा चुकी थी । मेरठ, कानपुर और दिल्ली विद्रोह की आग में जल रही थी और अंग्रेज़ रानी लक्ष्मीबाई झाँसी पर काबू पाने की कोशिश कर रहे थे ।
जैसे ही चिनहट में अंग्रेज़ सैनिकों के हारने की ख़बर फैली विद्रोही सैनिक लखनऊ पहुंचना शुरू हो गए । अगले आठ महीनों यानी मार्च 1858 तक हज़रत महल ने लखनऊ में विद्रोहियों का नेतृत्व किया ।
इस बीच तीन महीनों तक 37 एकड़ में फैले रेज़ीडेंसी की घेराबंदी की गई जिसके अंदर तीन हज़ार ब्रिटिश सैनिक, असैनिक, भारतीय सैनिक, उनके समर्थक और नौकर मौजूद थे ।
एक अंग्रेज़ अफ़सर जेम्स नील ने लॉर्ड कैनिंग को लिखे पत्र में बताया था, ‘ रेज़ीडेंसी के अंदर हालात इतने बदतर हो गए थे कि लॉरेंस सोचने लगे थे कि वो ज़्यादा से ज़्यादा 15 – 20 दिनों तक ही विद्रोहियों के सामने टिक पाएंगे ।
ख़ास तौर से भारत के विद्रोह को कवर करने भेजे गए ‘ द टाइम्स ‘ अख़बार के संवाददाता विवियम हॉवर्ड रसेल ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, ‘तीन महीने की घेराबंदी के दौरान तीन हज़ार में से आधे अंग्रेज़ लोग या तो भागने में सफल हो गए या मारे गए । बेगम ने ग़ज़ब की ऊर्जा और क्षमता दिखाते हुए पूरे अवध को अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए राज़ी कर लिया और इस लडाई का नेतृत्व किया ।
लाख सलाम तुम्हें बेगम । हम तुम्हारे कर्जदार हैँ ।
(Raghvendra Dubey – nehru review से साभार)
