‘मुझे बादशाह मत कहो,बादशाहों के तो सिर काट दिए जाते हैं।’ उमर ने जवाब दिया, ‘वो बादशाह सिंहासनों पर बैठते हैं, लेकिन आप तो लोगों के दिलों पर राज करते हैं।’
‘आजादी के बाद इंटेलिजेंस ब्यूरो ने सलाह दी कि नेहरू के सारे मुसलमान नौकरों को बदल दिया जाए,खास तौर से रसोई में काम करने वाले लोगों को।
इस बात का अंदेशा जताया गया था कि नेहरू के खाने में जहर मिलाया जा सकता था क्योंकि उन मुस्लिम कर्मचारियों के बहुत से रिश्तेदारों ने पाकिस्तान जाने का फैसला कर लिया था।
एमजे अकबर नेहरू की जीवनी में लिखते हैं, “जब नेहरू के पास ये प्रस्ताव गया, तो उन्होंने इसे सिरे से ख़ारिज कर दिया, नेहरू के लिए काम करने वाले लोग एक तरह से उनकी पूजा करते थे इसलिए नहीं कि वो प्रधानमंत्री थे, बल्कि इसलिए कि वो एक अच्छे इंसान थे।”
नेहरू के एक दर्ज़ी का नाम मोहम्मद उमर था,उसकी दिल्ली में दो दुकाने थीं, एक दिल्ली के मुस्लिम बहुल इलाक़े में और दूसरी नई दिल्ली में,दंगो के दौरान उसकी नई दिल्ली की दुकान जला दी गई, नेहरू ने उस दुकान को दोबारा खड़ा करने में उमर की बहुत मदद की।
उसने अपनी दुकान पर लिखवा रखा था, ‘प्रधानमंत्री का दर्जी’ लेकिन जब उनका बेटा पाकिस्तान चला गया तो कराची में उसने भी अपनी दुकान पर लिखवाया, ‘प्रधानमंत्री का दर्जी’
नेहरू के निजी सहायक रहे एमओ मथाई अपनी किताब ‘माई डेज विद नेहरू’ में लिखते हैं, “मैंने एक बार उमर से पूछा क्या कराची में उनके बेटे को नेहरू नाम का फ़ायदा हुआ? उसने अपनी टूटी-फूटी अंग्रेजी में जवाब दिया, ‘पंडितजी हर जगह बेस्टसेलर हैं।’
नेहरू का दर्ज़ी होने की वजह से उमर को कई विदेशी मेहमानों के कपड़े सिलने का भी मौका मिला, इनमें सऊदी अरब के शाह भी थे।
उमर का ही एक क़िस्सा सुनाते हुए मोहम्मद यूनुस अपनी किताब ‘परसंस, पैशंस एंड पॉलिटिक्स’ में लिखते हैं, “एक बार उमर ने नेहरू से उन्हें एक सर्टिफिकेट देने का अनुरोध किया।”
नेहरू ने हँसते हुए कहा, ‘तुम मेरे सर्टिफिकेट का क्या करोगे? तुम्हें तो बादशाहों ने सर्टिफ़िकेट दे रखे हैं।’
उमर का जवाब था, ‘लेकिन आप भी तो बादशाह हैं’ नेहरू बोले ‘मुझे बादशाह मत कहो,बादशाहों के तो सिर काट दिए जाते हैं।’
उमर ने जवाब दिया, ‘वो बादशाह सिंहासनों पर बैठते हैं, लेकिन आप तो लोगों के दिलों पर राज करते हैं।’
पण्डित नेहरू जी का खाना बनाने वाले स्टाप तक में मुसलमान थे।
जिन्होंने इंदिरा जी के सीने में गोली मारी थी उन्हें सीख लेने की जरूरत है कि ईमान क्या होता है,फर्ज क्या होता है,मानवता क्या होती है इंदिरा जी की हत्या केवल इसलिए कर दी गई थी कि उन्होंने स्वर्ण मंदिर खाली करवाने के लिए भिंडरावाले को मारने के लिए सेना को खुली छूट दी थी जबकि बंटवारे की पीड़ा में तड़प रहे लोग भी पण्डित नेहरू जी की सेवा पूरी निश्छलता से करते रहे,क्योंकि वे अति कट्टर नही थे उनमें मानवता जीवित थी।
हमें इतिहास पढ़ने की जरूरत है आज जो कहते हैं कि मुसलमानों को पाकिस्तान चले जाना चाहिए उन्हें भारत में क्यों रहने दिया गया वे जान लें कि मुसलमान बहुत मेहनती वर्ग है वो आज भी हर छोटा-बड़ा काम करता है एक तरह देश की सेवा करता है वो राष्ट्रसेवक है उसके प्रति घृणा करके हम दुनिया में विश्वगुरु कभी नही बन सकते।
©…✍️ Pramod Singh की पोस्ट से साभार
