अंग्रेजों के खिलाफ जो संगठित पहला विद्रोह भड़का वह 10 मई 1857 था ,जो बाद में जनव्यापी क्रांति बन गया ।19वीं सदी के पहले 5 दशकों में कई जनजाति विद्रोह भी हुए लेकिन इन सभी आंदोलनों का प्रभाव क्षेत्र बहुत सीमित था।
0 मई 1857 : इत्तेफ़ाक से यही तारीख थी जब मेरठ में विद्रोही सैनिकों और पुलिस बल ने ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ साझा मोर्चा गठित कर क्रांति का बिगुल फूंक दिया । उन्होंने क्रान्तिकारी समूह का नेतृत्व किया और रात दो बजे मेरठ जेल पर धावा बोल दिया । जेल तोड़कर 836 कैदियों को छुड़ा लिया गया और जेल में आग लगा दी गई ।
इतिहास के तमाम संदर्भ या परिप्रेक्ष्य हर दौर में आज भी , नये तथ्यों और विश्लेषण में अपनी प्रासंगिकता साबित करते ही रहते हैं । 1857 के चरित्र की व्याख्या , राष्ट्रीयता , देशभक्ति और प्रगतिशीलता के वे सारे आयाम खोलती है जिसका असर बाद के भारत पर बखूबी पड़ा ।
1857 वह अचानक भभक उठी आग तो थी जिसने ब्रिटिश साम्राज्य के लूट और दमन की लगातार कोशिशों को जलाकर खाक कर दिया और देश प्रेम की वह अलख जगाई जिसकी परिणति 1947 थी ।
मजदूर , किसान , आदिवासी , हिन्दू – मुस्लिम अभूतपूर्व एका से अंग्रेज इतना घबराये कि उन्हें बहुत कुत्सित चाल ‘ बांटो और राज करो ‘ पर उतरना पड़ा । फिर उनका ही एजेंडा पूरा करने के लिये कई संगठन भी अस्तित्व में आये । इन संगठनों खासकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने ‘ भारत छोड़ो आंदोलन ‘ की मुख़ालिफ़त भी की ।
आज असद जैदी जी की लंबी कविता बहुत याद आ रही है —-
1857 की लड़ाइयां जो बहुत दूर की लड़ाइयां थीं
आज बहुत पास की लड़ाइयां हैं
ग्लानि और अपराध के इस दौर में जब
हर गलती अपनी ही की हुई लगती है
सुनाई दे जातें हैं गदर के नगाड़े और
एक ठेठ हिंदुस्तानी शोरगुल
भयभीत दलालों और मुखबिरों की फुसफुसाहटें
पाला बदलने को तैयार ठिकानेदारों की बेचैन चहलकदमी
( कविता लंबी है । खत्म नहीं हुई । ऐसी कविताएं कभी खत्म या ठंडी पड़ भी नहीं जातीं । वे अपने समय से बहुत पीछे जाकर और आने वाले 50 – 100 साल तक के स्पेस में फैल जाती हैं , हममें इतिहास बोध तो जगाती ही हैं संघर्ष प्रेरित सपने भी उकसा देती हैं )
19वीं की पहली आधी सदी तक ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत के बड़े हिस्से पर कब्जा हो चुका था । जैसे-जैसे ब्रिटिश शासन का भारत पर प्रभाव बढ़ता गया, वैसे-वैसे भारतीय जनता के बीच ब्रिटिश शासन के खिलाफ असंतोष भी फैलता गया । प्लासी की लड़ाई के एक सौ साल बाद ब्रिटिश राज के दमनकारी और अन्यायपूर्ण शासन के खिलाफ असंतोष विद्रोह के रूप में भड़कने लगा ।
1857 के स्वतंत्रता संग्राम के पहले भी देश के अलग-अलग हिस्सों में कई घटनाएं घट चुकी थीं । 18वीं सदी के अंत में उत्तरी बंगाल में संन्यासी विद्रोह और बिहार एवं बंगाल में चुनार आंदोलन हो चुका था । 19वीं सदी के मध्य कई किसान आंदोलन हुए जिनमें मालाबार के मोपलाह किसानों और बंगाल के मुस्लिम किसानों द्वारा फराइजी आंदोलन अहम हैं ।
19वीं सदी के पहले 5 दशकों में कई जनजाति विद्रोह भी हुए जिसमें मध्य प्रदेश में भीलों का, बिहार में संथालों और ओडिशा में गोंड्स एवं खोंड्स जनजातियों का विद्रोह अहम था । लेकिन इन सभी आंदोलनों का प्रभाव क्षेत्र बहुत सीमित था यानी ये स्थानीय प्रकृति के थे । अंग्रेजों के खिलाफ जो संगठित पहला विद्रोह भड़का वह 1857 था ,जो बाद में जनव्यापी क्रांति बन गया ।
जब रजनी पाम दत्त , एआर देसाई, पीसी जोशी ,पी शास्तिको , ब्रिटिश प्रशासक और लेखक 1857 को ‘ म्यूटिनी ‘ लिख रहे थे , कार्ल मार्क्स और डिजरेली इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके थे कि 1857 महज ‘ सिपाही विद्रोह ‘ नहीं , ‘ राष्ट्रीय क्रांति ‘ थी ।
31 जुलाई 1857 को ही 17 जून तक की दिल्ली की खबर को लेकर जाने वाली भारतीय डाक के आधार पर युगांतकारी चिंतक कार्ल मार्क्स ने ‘ न्यूयॉर्क डेली ट्रिब्यून ‘ को लिखे अपने पत्र में यह निष्कर्ष निकाला था — ‘ एक – एक कर दूसरे तथ्य भी निस्सृत होंगे जो जानबुल ( अंग्रेज ) को यह समझा देंगे कि जिसे वह सैनिक गदर समझता है वह वास्तव में राष्ट्रीय विद्रोह है । ‘
इतिहासकार इरफान हबीब लिखते हैं – सिपाही विद्रोह 1857 के महाविद्रोह का मुख्य आधार था तो उतने ही निश्चय पूर्वक यह भी कहा जा सकता है कि इसका रूप इतना बड़ा नही हो पाता अगर इसको हरियाणा से लेकर बिहार तक के आम नागरिकों , मजदूर , किसान, आदिवासियों की हार्दिक सहानुभूति न मिली होती । इन्ही क्षेत्र के गांवों से इन सिपाहियों की भर्ती की गयी थी । इस विशाल क्षेत्र में इस विद्रोह ने किसान विद्रोह की रंगत अख्तियार कर ली ।
बहादुर शाह जफर , नाना साहब पेशवा, महारानी लक्ष्मीबाई , वीर कुंवर सिंह , राजा देवी बख्श सिंह , बेगम हजरत महल, अजीमुल्ला खां से पीर अली और गंगू मेहतर तक, तमाम गुमनाम रह गये क्रांति पुत्रों तक सबको , अपने नायक पुरखों को विनम्र श्रद्धांजलि, कोटि – कोटि नमन ।
(Nehru Review से साभार)
