एक ही परिवार के कई सदस्य देश की आज़ादी के लिए जेल गए, आंदोलन किए और अपना जीवन दांव पर लगाया, तो क्या उसे भी “परिवारवाद” कहा जाएगा या फिर राष्ट्र के प्रति समर्पण?
भारतीय राजनीति में जब भी “परिवारवाद” का मुद्दा उठता है, तब सबसे पहले नेहरू-गांधी परिवार को निशाने पर लिया जाता है। लेकिन क्या इतिहास के उन पन्नों को भी उतनी ही ईमानदारी से पढ़ा जाता है, जिनमें इस परिवार के त्याग, जेल यात्राओं और बलिदानों का उल्लेख दर्ज है? आज सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक लेख ने इसी बहस को फिर से जीवित कर दिया है। इसमें सवाल उठाया गया है कि यदि एक ही परिवार के कई सदस्य देश की आज़ादी के लिए जेल गए, आंदोलन किए और अपना जीवन दांव पर लगाया, तो क्या उसे भी “परिवारवाद” कहा जाएगा या फिर राष्ट्र के प्रति समर्पण?
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लेख में बताया गया है कि पंडित मोतीलाल नेहरू को नमक सत्याग्रह में भाग लेने के कारण दो वर्ष का कारावास भुगतना पड़ा। वहीं जवाहरलाल नेहरू ने अपने जीवन के नौ वर्ष से अधिक समय जेलों में बिताए। एक दौर ऐसा भी आया जब पिता और पुत्र दोनों एक साथ जेल में बंद थे। उस समय घर और कांग्रेस संगठन की जिम्मेदारी स्वरूपरानी नेहरू ने संभाली। पुलिस लाठीचार्ज में घायल होकर सड़क पर बेसुध पड़ी स्वरूपरानी के बारे में उनके निधन की अफवाह तक फैल गई थी, लेकिन जवाहरलाल नेहरू जेल में बंद होने के कारण अपनी घायल मां से मिलने तक नहीं जा सके। यह घटनाएं उस दौर के संघर्ष की गहराई को दर्शाती हैं।
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स्वतंत्रता आंदोलन में केवल पुरुष ही नहीं, बल्कि इस परिवार की महिलाओं ने भी बड़ी भूमिका निभाई। कमला नेहरू खराब स्वास्थ्य के बावजूद जेल में रहीं और बीमारी बढ़ने पर ही उन्हें रिहा किया गया। इंदिरा गांधी को भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के कारण दो वर्ष की सजा हुई। उल्लेखनीय बात यह रही कि विवाह के महज छह महीने बाद ही इंदिरा गांधी और फिरोज गांधी दोनों जेल में थे। फिरोज गांधी ने भी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई और कारावास सहा। यह तथ्य उस धारणा को चुनौती देते हैं कि राजनीतिक विरासत केवल सत्ता का माध्यम थी।
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नेहरू परिवार के अन्य सदस्यों ने भी आजादी की लड़ाई में अपने हिस्से का संघर्ष किया। जवाहरलाल नेहरू की बहन कृष्णा हाठीसिंह और विजयालक्ष्मी पंडित दोनों को जेल जाना पड़ा। विजयालक्ष्मी पंडित के पति रणजीत सीताराम पंडित को भी ब्रिटिश सरकार ने कारावास की सजा दी थी, जहां उन्होंने ढाई वर्ष जेल में बिताए और अंततः 1944 में जेल में ही उनकी मृत्यु हो गई। इसके अलावा ब्रजकुमार नेहरू और रामेश्वरी नेहरू भी भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल रहे। यह पूरा विवरण इस बात की ओर संकेत करता है कि स्वतंत्रता आंदोलन में यह परिवार केवल राजनीतिक रूप से नहीं, बल्कि व्यक्तिगत और पारिवारिक स्तर पर भी गहराई से शामिल था।
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सोशल मीडिया पर वायरल इस लेख का केंद्रीय सवाल यही है कि यदि किसी परिवार के अनेक सदस्य सत्ता के लिए नहीं बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन में बलिदान और संघर्ष के लिए जाने जाएं, तो क्या उसे भी “परिवारवाद” कहकर खारिज किया जा सकता है? आलोचकों का कहना है कि इतिहास की चर्चा चयनात्मक नहीं होनी चाहिए। वहीं समर्थकों का मानना है कि नेहरू परिवार के योगदान को जानबूझकर कम करके दिखाया जाता है। स्पष्ट है कि “परिवारवाद” पर जारी राजनीतिक बहस अब केवल वर्तमान सत्ता तक सीमित नहीं रही, बल्कि इतिहास की व्याख्या और स्वतंत्रता संग्राम की विरासत तक पहुंच चुकी है।
नेहरू परिवार के सदस्यों द्वारा स्वतंत्रता संग्राम में दिए गए योगदान और कारावास का विवरण निम्न हैं:
मोतीलाल नेहरू: नमक सत्याग्रह में हिस्सा लेने के कारण इन्हें 2 वर्ष की जेल हुई।
जवाहरलाल नेहरू: देश की आजादी के लिए उन्होंने अपने जीवन के 9 वर्ष से अधिक का समय जेल में बिताया।
स्वरूपरानी नेहरू (माता): पति और बेटे के जेल में रहने के दौरान उन्होंने कांग्रेस का काम संभाला। पुलिस लाठीचार्ज में वे इतनी गंभीर रूप से घायल हुईं कि उनके निधन की अफवाह तक फैल गई थी।
कमला नेहरू (पत्नी): खराब स्वास्थ्य के बावजूद वे 1 वर्ष तक कारागृह में बंद रहीं।
इंदिरा गांधी(बेटी): भारत छोड़ो आंदोलन के कारण उन्हें 2 वर्ष की सजा हुई। शादी के महज 6 महीने बाद ही वे जेल चली गई थीं।
फिरोज गांधी (दामाद): भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के कारण इन्हें भी 2 वर्ष जेल में रहना पड़ा।
कृष्णा हठीसिंह (छोटी बहन): देश की आजादी के आंदोलन में 2 वर्ष का कारावास काटा।
विजयलक्ष्मी पंडित (बहन) और रणजीत सीताराम पंडित (बहनोई): दोनों को 3-3 वर्ष की सजा हुई। रणजीत पंडित की 1944 में जेल के अंदर ही मृत्यु हो गई थी।
चित्र : प्रसिद्ध चित्रकार भाऊ समर्थ
Er ajay Kumar jha की पोस्ट से
जेल का विवरण गूगल से साभार
