नेहरू के मायने है आधुनिक भारत के निर्माण के सपने को तराशने का उत्कृष्ट शिल्प: सतीश कुमार

नेहरू के नेतृत्व में राजशाही और सामंतशाही को नेस्तनाबूद कर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का पौधा भारत भूमि पर रोपा गया और हर आशंका को ध्वस्त कर विकसित हुआ। नेहरू ने जो बीज बोया, वो आज वटवृक्ष है।

कल 27 मई की ही तारीख थी, जब सन् 1964 में हमने आधुनिक भारत शिल्पी पं.नेहरू को खोया था। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के संस्थापक प्रधानमंत्री ही नहीं, दुनिया के अग्रणी लोकतंत्रवादी भी जवाहरलाल नेहरू होने के कुछ और भी खास मायने हैं। नेहरू के मायने हैं आधुनिक भारत के निर्माण का सपना, उस सपने को तराशने का उत्कृष्ट शिल्प और उस शिल्प के प्रयोग के कौशल का महारथ। नेहरू विज्ञान एवं कानून के विद्यार्थी रहे, लेकिन वह इतिहासकार के रूप में जाने गये। यदि नेहरू एक इतिहासकार थे, तो वह एक इतिहास निर्माता भी थे। इतिहास यह मौका बहुत कम लोगों को ही देता है कि वह राष्ट्रनिर्माण के किसी सपने का ताना बाना बुने और उसे तराशने एवं उसे साकार करने का भी मौका भी मिले। बेशक नेहरू ऐसे खुशकिस्मत महानायक और बेमिसाल रहनुमा थे, जिन्हें इतिहास ने दोनों ही मौके दिये।

 गांधी के बाद आधुनिक भारतीय राजनीति के सबसे बड़े राजनीतिक यायावर पं. नेहरू ने अपने जेहन में एक भारत की खोज की। उन्होंने ‘भारत एक खोज‘ लिखा भी, जो दुनिया की सबसे ज्यादा छपी, बिकी एवं पढ़ी गई किताबों में शुमार है। वह गौरव के योग्य एक भारत हमें सौंप कर भी गये। उन्होंने अगर एक भारत-स्वप्न बुना था, तो उसे साकार करने में संघर्ष और सर्जना की दोनों भूमिकायें भी निभाई थीं। आजादी की लड़ाई में उन्होंने एक समृद्ध परिवार में मिली अपनी जवानी के पूरे दस साल ब्रिटिश साम्राज्य की लौह सलाख जेलों में काट दिये थे। सफल एवं विद्वान वकील रहे रईस पिता का प्रभाव बेटे पर नहीं पड़ा था, पर बेटे के प्रभाव से पिता मोतीलाल नेहरू भी जेल यात्रायें करने लगे थे। मात्र पिता ही नहीं, परिवार का हर स्त्री पुरुष हर सदस्य जंगे आजादी में जेल जाने लगा। नेहरू के आनंद भवन एवं स्वराज भवन के चर्चित रईसी के परिसर में देखते देखते खादी का साम्राज्य पसर गया और वह सत्याग्रहियों की सराय में तब्दील हो गया था। पहली बार वहां से आल इंडिया कांग्रेस कमेटी के सुव्यवस्थित दफ्तर संचालन ही नहीं शुरू हुआ, बल्कि स्वतंत्रता के राष्ट्रीय आन्दोलन का वहां से सूत्र संचालन होने लगा था। यह सब जवाहर लाल पर गांधी के प्रभाव का ही परिणाम था। ऐसा कम ही होता है कि कोई महापुरुष, दूसरा महापुरुष गढ़े।‌ कबीर दूसरा कबीर नहीं गढ़ सके, पर गांधी ने तो नेहरू गढ़ा था। गांधी से 1916 की लखनऊ कांग्रेस में गांधी से जहां भारत में सत्याग्रह जनान्दोलन की पहली प्रयोगशाला चंपारण की ओर गांधी को ले जाने वाले किसान नेता राजकुमार सुकुल मिले थे, वहीं उनसे दूसरी महत्वपूर्ण मुलाकात उनके बाद की पीढ़ी में सबसे बड़े राष्ट्रीय नायक और इलाहाबाद से आये युवा जवाहर लाल से भी पहली बार हुई थी। दोनों के रिश्तों की केमेस्ट्री ने भारतीय इतिहास पर गहरा और दूरगामी असर डाला था। गांधी जी से तमाम मतभेदों के बावजूद किसी दोराहे या तिराहे पर नेहरू कभी गांधी को छोड़ नहीं सके थे। दूसरी ओर गांधी ने भी तो आजादी से बहुत पहले जुलाई, 1942 के वर्धा सम्मेलन में सभी बड़े नेताओं के बीच दो टूक कहा था कि किसी को भ्रम नहीं होना चाहिये, कि मेरा वारिस कोई और है। वह तो बस जवाहर ही है। वह जब से मेरे चंगुल में आया है, फड़फड़ाता तो बहुत है, पर मेरे चंगुल से छूट नहीं पाता और मुझे विश्वास है कि मेरे बाद वह मेरी ही भाषा बोलेगा।

लंबे संघर्ष से मिली आजादी एवं उसके संहिताकरण संग भारतीय स्वतंत्रता को संवैधानिक लोकतंत्र में ढालने के युगदायित्व के दौर में भारत में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की कमान उसके संस्थापक प्रधानमंत्री के रूप में पं. नेहरू को मिली। आजादी संग नेहरू को जो भारत मिला था, वह हजारों वर्षों की सामंतशाही एवं कई सौ सालों की साम्राज्यशाही के क्रूर शोषण से निकला हुआ एक बेहद बदहाल भारत था। सदियों के शोषण से निकला वह भारत वैसा ही था, जैसे चूसकर किसी ने आम गुठली फेंक दी हो। फिर भी इन सबसे अलहदा और कल्पना से भी अलहदा एक भारत नेहरू हमें देकर गये। चर्चिल ने आजाद भारत के लिये भविष्यवाणी की थी कि वह एक दशक से ज्यादा नहीं चल सकेगा, पर भारत सबसे बड़े संवेधानिक लोकतंत्र के साथ एकजुटता और दृढ़ता से आगे बढ़ा। नेहरू के नेतृत्व में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का पौधा भारत भूमि पर रोपा गया और हर आशंका को ध्वस्त कर विकसित हुआ। नेहरू ने जो बीज बोया, वो आज वटवृक्ष है। राजशाही और सामंतशाही की अन्य संरचनाओं को ध्वस्त कर खड़ा हुआ महान गणतंत्र आधुनिक भारत की गौरवशाली उपलब्धि बन गया। उस भारत के पास लोकतंत्र की पथिका से होकर समतामूलक समाज एवं सशक्त राष्ट्रनिर्माण की ओर यात्रा का एक संकल्प था, तो उसे सुनियोजित विकास के रस्ते पर दूर तक ले जाने का एक सुविचारित रोड मैप भी था। विरासत में मिली उसकी बहुआयामी विविधता की कमजोरियों को नेहरू ने भारत की सबसे बड़ी ताकत बना दिया।

एक भ्रम प्रचारित है कि‌ भारत की आजादी संग अंग्रेजों ने पाकिस्तान बनाने भय की साज़िश रची थी। सच यह है कि वह तो 365 देशी प्रिन्सले स्टेट्स को भी स्वतंत्र संप्रभु राज्य घोषित कर गये थे। उनके एकीकरण का कल्पनातीत काम प्रधानमंत्री एवं उप प्रधानमंत्री नेहरू और पटेल की नेतृत्व जोड़ी ने बखूबी अंजाम दिया। एकीकरण की वह प्रक्रिया नेहरू के कार्यकाल में आगे भी जारी रही, जब 1961, 62 एवं 63 में क्रमशः दादरा नगर हवेली, गोवा दमन दीव और पांडिचेरी की पुर्तगाली एवं फ्रांसीसी कालोनियों को भारत में विलीन कराया गया। देश में लोकतंत्र, शिक्षा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, योजनाबद्ध विकास, सत्ता के राजनीतिक विकेन्द्रीयकरण, बुनियादी उद्योगों, चिकित्सा विज्ञान, स्पेस विज्ञान, भूगर्भ, परमाणु विज्ञान, पेट्रोलियम, उर्वरक, कृषि, सिंचाई, अनेक तरह के महत्वपूर्ण सार्वजनिक उद्यमों, कला, साहित्य, संस्कृति आदि के विविध क्षेत्रों में विश्वस्तरीय महत्व के संस्थानों, प्रतिष्ठानों, परियोजनाओं आदि का संजाल नेहरू काल में खड़ा हुआ। वैज्ञानिक चेतना के साथ विकास एवं राष्ट्रीय नवनिर्माण के नये युग का आगाज हुआ। लोकतंत्र की संरचना के साथ साथ लोकतंत्र की संस्कृति एवं संस्थाओं का विकास हुआ। जमींदारी, ताल्लुकेदारी, रैयतवारी के पुराने गैर लोकतांत्रिक ढांचे ढहा दिये गये और इतिहास के पन्नों में समा गये। राष्ट्रीय राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक आधुनिकीकरण की अभिनव, महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय यात्रा शुरू हुई। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में गुटनिरपेक्ष आंदोलन के साथ भारत और नेहरू वैश्विक नेतृत्व की भूमिका में उभरे, जबकि हम एक गरीब नवस्वतंत्र देश थे। यह सब इसलिये संभव हुआ, क्योंकि नेहरू जैसा कुशल कप्तान हमें मिला था। आज भारत की बहुतेरी खुश्बू दुनिया में दूर‌ तलक जाती है और बेशक उसके पीछे सबसे ज्यादा नेहरू हैं, जिन्हें जमाने ने हिंद की अवाम की आंखों का नूर कहा।

 27 मई 1964 को नेहरू के तिरोधान पर भिलाई, बोकारो, राउरकेला, स्टील अथारिटी, भाखड़ा, रिहन्द, हीराकुंड, सरदार सरोवर, सिन्दरी, भेल, चितरंजन लोकोमोटिव, डीजल लोकोमोटिव, एचएएल, ट्रांबे, इसरो, ओएनजीसी, सेल, बीएआरसी, बरौनी, कोसी, गंडक, दामोदर वैली, आईआईटी, एम्स, आईआईएम, यूजीसी, साहित्य-कला अकादमियों, नेशनल लेबोरेटरीज, एचईएल , डीआरडीओ, पीआरएल, अमूल आदि और तमाम विकास के मंदिरों और लोकतंत्र एवं योजनाबद्ध विकास के स्थापित तमाम बुनियादी संस्थानों सहित पूरा देश रोया था। जिस भारत को उन्होंने अपने जेहन खोजा था और जिस भारत को दक्ष राष्ट्र शिल्पी की तरह तराशा था, उसके हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओं से गंगा के प्रवाह तक में उनकी अस्थियां बिखेरी और बहाई गई थीं। उसमें उनकी अर्धांगिनी कमला नेहरू की डिबिया में बंद वह अस्थियां भी मिला दी गई थीं, जिन्हें वह एक डिबिया में सहेज कर स्विटजरलैंड में उनका अंतिम संस्कार करने के बाद ले आये थे और 1936 से ही  हर रोज उस डिबिया को अपनी तकिया के नीचे रखकर सोया करते थे। उस राष्ट्र शिल्पी पं.नेहरू की 62 वीं पुण्य तिथि के अवसर पर उनकी स्मृतियों को कृतज्ञ नमन और आधुनिक राष्ट्रनिर्माण की नेहरू की गौरवशाली विरासत को सेल्यूट।

सतीश कुमार की पोस्ट से साभार

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