हिंदुस्तान की कहानी – हिंदुस्तान की कहानी’ पंडित जवाहरलाल नेहरू की सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय कृतियों में से है। यह पुस्तक विश्वविख्यात ‘दि डिस्कवरी ऑव इंडिया’ का अनुवाद है। हम उनकी पुस्तक हिन्दुस्तान की कहानी को धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। उम्मीद है धारावाहिक में छोटे आलेख पाठकों को पसंद आयेंगे और वे इस तरह नेहरू के हिन्दुस्तान को पूरा पढ़ पायेंगे। हमें आपकी प्रतिक्रिया और सुझावों का इंतजार रहेगा ताकि हम और बेहतर कर सकें। आज पुस्तक का चैप्टर :४ हिंदुस्तान की खोज भाग१८ : राज्य का संगठन
यह नया राज्य, जो ३२१ ई० पू० में क़ायम हुआ और हिंदुस्तान के ज्यादातर हिस्से पर और उत्तर में ठीक क़ाबुल तक फैला, आखिर था कैसा राज्य ? यह था एकछत्र शासन और ऊपर के सिरे पर हम इसमें एकावि-पत्य पाते हैं, जैसाकि अधिकतर साम्राज्यों में रहा है और अब भी है। गहरों और गांवों की इकाइयों में बहुत कुछ मुक़ामी स्वराज्य था और चुने गए बुजुर्ग इन मुकामी मामलो की देखभाल किया करते थे। इस मुकामी स्वराज्य की वड़ी कद्र थी और शायद ही किसी राजा या सबसे बड़े शासक ने इसमें दखल दिया हो। फिर भी केंद्रीय शासन का असर था और उसके तरह-तरह के काम सभी जगह देखने में आते थे और कुछ मानी में यह मौर्य-शासन ऐसा न था कि आजकल के एकाधिपत्य शासन को याद दिलाता है। उस महज किसानी के युग में राज्य व्यक्ति पर उस तरह की बंदिशें, जैसी आजकल दिखती हैं, लगा नहीं सकता था; लेकिन सब सीमाओं के बावजूद, जिंदगी पर बंदिशें लगाने को और उसे नियंत्रित करने की कोशिशें हुई। यह शासन एक मात्र पुलिस शासन न था, जिसका मक़सद बाहरी और भीतरी अमन कायम रखना और लगान वसूल करना ही रहा हो।
एक काफ़ी फैली हुई और कड़ो नोकरशाही थी और खुफिया विभाग के भी हवाले अकसर मिलते है। खेती पर बहुत तरीक़ों से नियंत्रण लगे हुए थे। और यही हालत सूद के दर की थी। खाने की चीजों, मंडियों, कारखानों, क़साईखानों, पशुओं की नस्लक़शी, पानी के हकों, शिकार, वेश्याओं और शराबखानों पर बंदिशें लगी हुई थी और इनकी समय-समय पर जांच हुआ करती थी। मापें और तोले सब जगहों के लिए एक-सी कर दी गई थीं। खाने की चीजों के भरने और उनमें मिलावट करने पर कड़ी सजाएं मिलती थी। व्यापार पर कर लगा हुआ था और इसी तरह धर्म के कामों पर भी। नियमों का पालन न हुआ या और कोई अपराध हुआ, तो मंदिरों का धन जब्त कर लिया जाता था। अगर अमीर लोग गबन करते या कौमी संकटों से फ़ायदा उठाते, तो उनकी जायदाद जब्त कर ली जाती। सफाई का इत-जाम किया जाता था और अस्पताल खुले हुए थे और खास-खास केंद्रों पर वैद्य मुरिर थे। हुकूमत की तरफ़ से विधवाओं, यतीमों, बीमारों और कमजारों को मदद दी जाती थी। अकाल से बचाने की खास जिम्मेदारी हुकूमत की होती थी और हुकूमत के भंडारों में जो कुछ भी गल्ला होता, उसका आधा इसीके लिए बचा रखा जाता था कि अकाल के जमाने में काम आए ।
ये सब क़ानून-क़ायदे शायद ज्यादातर शहरों पर लागू होते थे और गांवों पर कम; यह भी मुमकिन है, इनका व्यवहार में ढिलाई से इस्तेमाल किया जाता हो। लेकिन सिद्धांत के खयाल से भी ये बातें दिलचस्प हैं। गांव के रहनेवालों के लिए क़रीब-करीब स्वराज था।
चाणक्य के ‘अर्थशास्त्र’ में अनेकानेक विषयों का बयान हुआ है और यह पुस्तक हुकूमत के सिद्धांत और व्यवहार के सभी पहलुओं पर विचार करती है। इसमें राजा के, उसके मंत्रियों और सलाहकारों के कर्तव्य बताये गए हैं और राज-सभा की बैठकों, सरकारी महकमों, कूटनीति, लड़ाई ओर सुलह के बयान हैं। इसमें चंद्रगुप्त की बड़ी फ़ौज की तफ़तील दी गई है, जिसमें पैदल, घुड़सवार सेना, रवों और हाथियों का हाल है।’ साथ हो चाणक्य का कहना है, गिनती से कुछ होता-जाता नहीं- अगर संयम न हो और ठोक नेता न हों, तो यही सेना भार हो सकती है। रक्षा के और क़िलेबंदी के बारे में भी इस किताब में कहा गया है। और जिन बातों पर इस किताब में लिखा गया है, वे हैं, व्यापार और व्यवसाय, कानून और न्यायालय, शहरी व्यवस्था, सामाजिक रीति-रिवाज, विवाह और तलाक़, औरतों के अधिकार, राज्य-कर और लगान, खेती, खानों और कारखानों का चलाना, व्यवसाय, मंडियां, बागवानी, उद्योग-धंबे, आब-पाशी और जल के रास्ते, जहाज और जहाजरानो, निगमें, मर्दुमशुमारी, मछली पकड़ने का धंधा, कसाईखाने, राहदारी के पत्र, कैदखाने वगैरह। विधवा को फिर से व्याहा जाना माना गया है, और किन्हीं खास हालतों में तलाक भो।
चीन के वने रेशमी कपड़े, चीन पट्ट, का भो हवाला मिलता है और इस कपड़े में और हिंदुस्तान के बने रेशम के कपड़े में फर्क बताया गया है। शायद हिंदुस्तान का बना कपड़ा चीन के कपड़े के मुक़ाबले में ज्यादा मोटा होता था। चीनी कपड़ों का आयात यह बताता है कि कम-से-कम ईसा से पहले की चोथो सदी में चोन के साथ हिंदुस्तान का व्यावसायिक संबंच क़ायम था।
अपने राज्यारोहण के वक़्त राजा को इस बात की कसम खानी पड़ती थी कि वह अपनी प्रजा की सेवा करेगा। “मैं स्वयं, जिदगी और संतान से वंचित रहूं, अगर मैं तुम्हें सताऊं ।” “उसका सुख उसकी प्रजा के सुख में है और उसको खैरियत में है; जो बात उसे खुद अच्छी लगती है, उसे वह अच्छा न समझे, लेकिन जो बात उसको प्रजा को अच्छी लगे, उसे वह अच्छा समझे।” “अगर राजा में उत्साह है, तो उसकी प्रजा में भी उतना ही उत्साह होगा।” “आम लोगों के हित के काम उस वक्त तक नहीं रुके रह सकते, जबतक कि शतरंज का खेल, जिसका आरंभ हिंदुस्तान में ही हुआ, शायद सेना के इन्हीं चार अंगों के खयाल से निकला था। यह चतुरंग कहलाता था, यानी चार अंगोंवाला, जिससे शतरंज निकला। अलबरूनी इस खेल का हिंदुस्तान में चार आदमियों द्वारा खेले जाने का हाल लिखता है। राजा को फुरसत न हो, उसे उनके लिए सदा तैयार रहना चाहिए। और अपर राजा अनोति करें, तो उसको प्रजा को यह अधिकार है कि उसे हटाकर उसकी जगह दूसरे को बिठा दे।”
एक आवपाशी का महकमा था, जो नहरों को निगरानी किया करता बा और एक महकमा जल के यातायात का था, जो बंदरगाहों, घाटों, पुलों और उन बहुत-सी नावों और जहाजों की देख-भाल करता था, जो नदियों पर चला करते थे और समुंदर पर होकर बरमा या उससे भी आगे जाते थे। सुरकी को फोज के सहायक अंग को तरह, जान पड़ता है, एक जल-सेना मो यो।
साम्राज्य में व्यापार खूब होता था और दूर-दूर जगहों के बीच चौड़ी सड़कें बनी हुई थीं, जिनके किनारे अकसर यात्रियों के लिए आराम-घर बने हुए थे। खास सड़क को राज-पथ या राजा का रास्ता कहते थे और यह सारे देश को पार करता हुआ राजधानी से लेकर ठोक पच्छिमोत्तर सरहद तक जाता था। विदेशी व्यापारियों का खासतौर पर जिक्र आता है और उनके लिए अलग सुविधाएं थो और जान पड़ता है कि उन्हें उनके आपस के व्यवहार में अपने देशों के अलग कानूनों का कुछ हद तक लाभ दिया जाता था। कहा जाता है कि पुराने मित्रों लोग अपने सुरक्षित शवों को हिदुस्तान की मलमल में लपेटा करते थे और अपने कपड़ों को हिंदुस्तान के नोल में रंगा करते थे। पुराने खंडहों में एक तरह का कांच भी मिला है। यूनानी एलची मेग-स्थनीज कहता है कि हिंदुस्तानी सौंदर्य और नफासत की चीजों के प्रेमी थे, और यह भी लिखता है कि ऊंचाई को बढ़ाने के लिए जूतों का इस्तेमाल किया जाता था।
मौर्य-साम्राज्य में विलास की बढ़ती हुई जिंदगी में सादगी घटी, धंधों के बंटवारे बड़े और संगठन भी बड़ा। “सराय, आराम-धर, खाने के घर,जुआ-बर, जान पड़ता है बहुत है। संप्रदायों और पेशेवरों की सभाओं के लिए अलग-अलग जगहें हैं और पेशेवरों की आम दावतें भी होती हैं। मनोरंजन के घचे से बहुत तरह के लोगों की रोजी चलती है, जैसे नचनियों, गवैयों और स्वांग करनेवालों को। ये लोग गांवों तक में पहुंचते हैं और ‘अर्थशास्त्र’ का लेखक इन खेल-तमाशों के लिए भवन बनाये जाने के खिलाफ इसलिए है कि इससे लोगों का घर-बार और खेती के काम से जी हटता है। साथ हो सार्वजनिक मनोरंजन के कामों में हाथ बंटाने से इन्कार करने के लिए दंड की भो व्यवस्था है। राजा को तरफ से खासतौर पर तैयार किये गए मकानों या अखाड़ों में नाटक, कुश्ती और आदमियों और पशुओं की और प्रतियोगिताओं का, और दूसरे तमाशों और विचित्र चीजों की तस्वीरों के दिखाने का इंतजाम है।… बहुत करके उत्सवों के मौकों पर सड़कों पर रोशनी की जाती थी।” शाही जुलूस भी निकला करते थे और शिकारियों के जमाव हुआ करते थे।
इस विशाल साम्राज्य में बड़ी आबादीवाले बहुत-से शहर थे, लेकिन उन सबमें बड़ा शहर पाटलिपुत्र था, जो राजघानी या और यह आलीशान शहर गंगा और सोन के संगम पर (मौजूदा पटना) बसा हुआ था। मेगस्थ नीज ने इसका यों वर्णन किया है- “इस नदी (गंगा) आर एक दूसरी नदी के संगम पर पालिबोघ्र बसा हुआ है, जो अस्सी स्टेडिया (९.२ मोल) लंबा और पंद्रह स्टेडिया (१७ मोल) चौड़ा है। इसकी शक्ल समचतुष्कोण की है और यह लकड़ी को चार-दोवारी से घिरा हुआ है, जिसमें तीर चलाने के लिए संदें बनी हुई हैं। सामने इसके एक खाई है, जो हिफाजत के लिए है और जिसमें शहर का गंदा पानी पहुंचता है। यह लाई, जो चारों तरफ घूमी हुई है, चौड़ाई में ६०० फुट है और गहराई में ३० हाय; और दीवाल पर ५७० बुद्ध हैं और उसमें ६४ फाटक हैं।”
यह दीवाल ही लकड़ी की नहीं थी, बल्कि ज्यादातर घर भी लकड़ी के थे। जाहिरा यह मूकंप से बचाव के लिए था, क्योंकि उस प्रदेश में भूकंप अकसर आते रहे हैं। सन १९३४ के बिहार के मयानक भूकंप ने हमें इस बात की फिर याद दिला दी है। चूंकि मकान लकड़ी के होते थे, इसलिए आग लगने से बचने के लिए बहुत इंतजाम रहता था। हर एक गृहस्य को सीढ़ियां, कांटे और पानी से भरे डोल रखने पड़ते थे।
पाटलिपुत्र में लोगों की चुनी हुई म्युनिसिपैलिटी मी थो। इसके ३० सदस्य थे, और वे पांच-पांच की ६ समितियों में बंटे हुए थे और इनके हाथ में व्यापार, दस्तकारी, मौत और पैदाइश, उद्योग-धंधों, यात्रियों वगैरह के इंत-जाम थे। रुपये-पैसे, सफ़ाई, पानी पहुंचाना, सार्वजनिक इमारतों और बग्रीचों की देत-माल पूरी म्यूनिसिपैलिटी के जिम्मे थी।
सदर्भ’केंब्रिज हिस्ट्री ऑव इंडिया’ (जिल्व १, पृ० ४८०) में डॉक्टर एफ० डब्लू० टामस ।
जारी
