हिंदुस्तान की कहानी’ पंडित जवाहरलाल नेहरू की सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय कृतियों में से है। यह पुस्तक विश्वविख्यात ‘दि डिस्कवरी ऑव इंडिया’ का अनुवाद है। हम उनकी पुस्तक हिन्दुस्तान की कहानी को धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। उम्मीद है धारावाहिक में छोटे आलेख पाठकों को पसंद आयेंगे और वे इस तरह नेहरू के हिन्दुस्तान को पूरा पढ़ पायेंगे। हमें आपकी प्रतिक्रिया और सुझावों का इंतजार रहेगा ताकि हम और बेहतर कर सकें। आज पुस्तक का चैप्टर :४ हिंदुस्तान की खोज भाग १९ : बुद्ध की शिक्षा
इन राजनैतिक और आर्थिक इन्कलाबों के पीछे, जो हिंदुस्तान की शक्ल ही बदल रहे थे, बौद्ध धर्म का जोश था। पुराने मतों से इसका संघर्ष और धर्म के मामलों में निहित स्वार्थों से इसकी लड़ाई चल रही थी।
बहस और मुबाहसे (जिनका हिंदुस्तान में हमेशा शौक रहा है) से कहीं बढ़-कर लोगों पर असर था एक ज्वलंत और बड़े व्यक्तित्व का और उसकी याय दिलों में ताजा थी। उसका संदेश पुराना था, फिर भी बहुत नया था और जो लोग बड़ा-जान की बारीकियों में उलझे हुए थे, उनके लिए मौलिक था। इसने विचारशील लोगों की कल्पना पर कब्जा कर लिया। यह लोगों में दिलों के भीतर गहरा पैठ गया। बुद्ध ने अपने वेलों से कहा था- समी देशों में जाओ और इस धर्म का प्रचार करो। उनसे कहो कि गरीब और दोन, अमीर और कुलान, सब एक हैं और इस धर्म में समो जाते इस तरह आकर मिल जाती है, जिस तरह कि नदियां समुंदर में जाकर मिलती है।” उनका संदेश सभी के लिए दया और प्रेम का संदेश था। क्योंकि इस दुनिया में नफ़रत का अंत नफ़रत से नहीं हो सकता; नफरत प्रेम करने से हो जायगी।” और “आदमी को चाहिए कि गुस्से को दया के जरिये और बुराई को भलाई के जरिये जीते ।”
गिले काम करने का और अपने ऊपर संयम रखने का यह आदर्श था। “आदमी लड़ाई में हजार आदमियों पर विजय हासिल कर सकता है; लेकिन जो अपने ऊपर विजय पाता है, वही सबसे बड़ा विजयी है।” “जन्म से नहीं, बल्कि कर्म से ही आदमी शूद्र या ब्राह्मण होता है।” पापी की निदा उचित नहीं, क्योंकि “जो पापियों से जान-बूझकर कड़े शब्द कहता है, यह मानो उनके पाप-रूपी घाव पर नमक छिड़कता है।” दूसरे के ऊपर विजय पाना ही दुःख का कारण होता है- “विजय नफ़रत उपजाती है, क्योंकि विजित दुखी होता है।”
अपने इन सब उपदेशों में उन्होंने धर्म का प्रमाण नहीं दिया, न ईश्वर या किसी दूसरी दुनिया का हवाला दिया। वह बुद्धि और तर्क और अनुभव पर भरोसा करते हैं और लोगों से कहते है कि सत्य को अपने मन के मोतर बोजो। कहा जाता है कि उन्होंने कहा- “किसी को मेरे बताये नियमों को आदर की वजह से न मान लेना चाहिए; उसकी परख पहले इस तरह कर लेनी चाहिए, जैसे तपाकर सोने की परख की जाती है।” सचाई के व जानने से सभो दुःख उपजते हैं। ईश्वर या परब्रह्म है या नहीं, इसके बारे में उन्होंने कुछ नहीं बताया है। न वह उससे इकरार करते हैं, न इन्कार। जहां जानकारी मुमकिन नहीं, वहां हमें अपना फैसला नहीं देना चाहिए। एक सवाल के जवाब में, बताया जाता है कि बुद्ध ने यह कहा था- “अगर परवा से मतलब है किसी उस चीज से, जिसका सभी जानी हुई चीजों से कोई संबंच नहीं, तो किसी तर्क से उसका अस्तित्त्व या वजूद सिद्ध नहीं किया जा सकता। यह हम कैसे जान सकते हैं कि दूसरी चीजों से असंबद्ध चीज कोई है भी या नहीं ? यह सारा विश्व- उसे हम जिस रूप में जानते हैं- संबंधों का एक सिलसिला है; हम कोई ऐसी चोज नहीं जानते, जो बिना संबंध के है या हो सकती है।” इसलिए हमें अपने को उन चीजों तक महदूद रखना चाहिए, जिनका हम अनुभव कर सकते हैं और जिनके बारे में हमें पक्की जानकारी है।
इसी तरह बुद्ध ने आत्मा के अस्तित्त्व के वारे में भो कुछ नहीं कहा है। वह इससे भी न इक़रार करते हैं और न इन्कार। वह इस सवाल में पड़ना ही नहीं चाहते और यह एक बड़ी अचरज की बात है, क्योंकि उस जमाने में हिदुस्तानियों के दिमाग़ में आत्मा और परमात्मा, एकेश्वरवाद, अद्वैतवाद और दूसरे आधिभौतिक सिद्धांत समाये रहते थे। मगर बुद्ध ने सभो तरह के आधिभौतिकवाद से अपने विचारों को हटाया। लेकिन प्रकृति के नियम के स्थायित्व में और एक व्यापक हेतुवाद में उनका विश्वास है और इस तरह हर एक बाद की स्थिति अपने से पहले की स्थिति का नतीजा है, अच्छे काम का सुख से और बुरे काम का दुःख से स्वाभाविक संबंध है।
हम अनुभव की इस दुनिया में शब्दों या भाषा का इस्तेमाल करते हैं और कहते हैं कि “यह है” या “यह नहीं है”। लेकिन जब हम सतही पह-लुओं के भीतर पैठते हैं, तो इनमें से एक भी, संभव है, सही न हो और जो कुछ हो रहा है, उसको बयान करने में हमारी भाषा हो नाकाफ़ी हो । सत्य “है” और “नहीं है” के बीच में या इनसे परे कहीं भी हो सकता है। नदी वरा-बर बहती है और हर क्षण एक-सी मालूम पड़ती है, फिर भी पानी बराबर तबदील होता रहता है। इसी तरह आग है। ली जलती रहती है और अपना आकार भो क़ायम रखती ह, फिर भी वही ली हमेशा नहीं रहती, बल्कि क्षण-क्षण में बदलती रहती है। इसी तरह जिदगी भी बराबर बदलती रहती है और अपने सभी रूपों में वह एक घारा की तरह है, जिसे हम ‘होने की प्रक्रिया’ कह सकते हैं। असलियत कोई ऐसी चीज नहीं है, जो क़ायम रहनेवाली और न बदलनेवाली हो, बल्कि वह एक रोशन ताक़त है, जिसमें तेजी है और रफ़्तार है और जो नतीजों का एक सिलसिला है। समय की धारणा “महज एक खयाल है, जो जिस-किसी घटना के आधार पर व्यवहार के लिए बना लिया गया है।” हम यह नहीं कह सकते कि कोई एक चीज किसी दूसरी चीज का कारण है, क्योंकि ‘होने की प्रक्रिया’ में कोई अंश ऐसा नहीं है, जो स्थायी हो या न बदलनेवाला हो। किसी वस्तु का तत्त्व उसमें निहित नियम में है, जो उसे किसी दूसरी कहलाई जानेवाली वस्तु से जोड़ता है। हमारे शरीर और हमारी आत्माएं क्षण-क्षण में बदलती रहती हैं; उनका अंत हो जाता है और उनकी जगह पर कोई दूसरी चीज, जो उन्हीं-जैसी, लेकिन उनसे मुख्तलिफ होती है यह जगह ले लेती है, और फिर वह भी चली जाती है। एक मानी में में हम हरदम मर रहे हैं और हदम फिर से जन्म ले रहे हैं, और यह सिलसिला एक अटूट अस्तित्त्व का आभास देता है। यह “एक सतत परिवर्तनशील अस्तित्त्व का सिलसिला है।” हर चीज बस एक प्रवाह है, आंदोलन है और परिवर्तन है।
हम लोग भीतिक घटनाओं को एक नपे-तुले ढंग से सोचने और उनकी व्याख्या करने के इतने आदी हो गए है कि हमारे दिमागों के लिए यह सब समझ सकना मुश्किल है। लेकिन यह बड़ी मार्के की बात है कि बुद्ध का यह फ़िलसफ़ा हमें आजकल के भौतिक विज्ञान की धाराओं और दार्शनिक विचारों के इतना निकट ले आता है।
बुद्ध का ढंग मनोवैज्ञानिक विश्लेषण का ढंग था और यहां भी यह देखकर अचरज होता है कि आज के विज्ञान की नई-से-नई खोजों के कितने निकट उनकी सूझ-बूझ थी। आदमी की जिदगी पर विचार और जांच बिना किसी स्थायी आत्मा के लिहाज के होती है, क्योंकि अगर किसी ऐसी आत्मा की सत्ता है भी, तो वह हमारी समझ से परे है। मन को शरीर का अंग, मान-सिक शक्तियों की एक मिलावट, समझा जाता था। इस तरह से व्यक्ति’ मानसिक स्वितियों को एक गठरी बन जाता है; “आत्मा विचारों का महज एक प्रवाह है।” “जो कुछ भी हम है, वह जो कुछ भी हमने सोचा है, उसका नतीजा है।”
जिदगी में जो दुःख और व्यथा है, उस पर जोर दिया गया है और बुद्ध ने जिन “चार बड़े सत्यों” का बखान किया है, उनमें यह दुःख, उसके कारण, उसे खत्म करने की संभावना और उसके लिए उपाय बताये गए हैं। अपने चेलों को उपदेश देते हुए, कहा जाता है कि बुद्ध ने कहा था- “जब तुमने युगों के दौर में इस (दुःख) का अनुभव किया, तुम्हारी आंखों से इतना पानी बहा है; जब तुम इस (जिदगी को) यात्रा में भटके हो और तुमने शोक किया है या तुम रोये हो, क्योंकि जिस चीज से तुम नफ़रत करते रहे हो, वह तुम्हें मिली है और जिस चीज को तुम ख्वाहिश करते रहे हो, वह तुम्हें नहीं मिली है, वह सब तुम्हारे आंसुओं का पानी चारों बड़े समुंदरों के पानी से ज्यादा रहा है।”
दुःख की इस हालत का अंत कर देने से ‘निर्वाण’ प्राप्त हो सकता है। ‘निर्वाण’ है क्या ? इसके बारे में लोगों में मतभेद रहा है, क्योंकि एक ऐसो हालत का, जो अनुभव से परे है, किस तरह से हमारे सीमित दिमागों की भाषा में बयान हो सकता है? कुछ लोग कहते हैं कि यह केवल विनाश हो जाना है, बुझ जाना है। लेकिन बुद्ध ने, कहा जाता है कि इससे इन्कार किया है; और यह बताया है कि यह एक अत्यंत क्रियाशीलता की अवस्था है। यह झूठी इच्छाओं के मिट जाने की हालत है, न कि अपने मिट जाने की, लेकिन इसका बयान केवल नकारात्मक शब्दों में किया जा सकता है।
बुद्ध का बताया हुआ रास्ता मध्यम-मार्ग है और यह अपने को यातना देने और विलास में डबा देने के बीच का रास्ता है। शरीर को तकलीफ़ देने के अनुभव के बाद उन्होंने कहा है कि जो आदमी अपनी ताकत खो बैठता है, वह ठाक रास्ते पर नहीं चल सकता। यह मध्यम-मार्ग आर्यों का अष्टांग मार्ग कहलाया। इसके अंग हैं ठीक विश्वास, ठोक आकांक्षाएं, ठीक बचन, ठीक कर्म, ठोक आचार, ठोक प्रयत्न, ठोक वृत्ति और ठीक आनंद। इसमें अपने विकास का सवाल है, किसीकी कृपा का नहीं। और अगर आदमी इस दिशा में अपना विकास करने में कामयाब होता है, तो उसके लिए कभी हार नहीं- “जिसने अपने को वस में कर लिया है, उसकी जीत को देवता भी हार में नहीं बदल सकते।”
बुद्ध ने अपने चेलों को वे बातें बताई, जो उनके विचार में वे लोग समझ सकते थे और जिन पर वे आचरण कर सकते थे। उनके उपदेशों का यह मक़सद नहीं था कि जो कुछ भी है, उसकी व्याख्या की जाय, बल्कि जो कुछ भी है, उसका पूरा-पूरा दिग्दर्शन कराया जाय। कहा जाता है कि एक बार उन्होंने अपने हाथ में कुछ सूखी पत्तियां लेकर अपने प्रिय शिष्य आनंद से पूछा कि हाथ की इन पत्तियों के अलावा क्या और भी कहीं पत्तियां है। आनंद ने जवाब दिया-“पतझड़ की पत्तियां सभी तरफ़ गिर रही हैं, और वे इतनी है कि उनकी गिनती नही हो सकती।” तब बद्ध ने कहा- “इसी तरह मैंने तुम्हें मुट्ठी-मर सत्य दिये हैं, लेकिन इनके अलावा कई हजार और सत्य हैं, इतने कि उनकी गिनती नहीं हो सकती ।”
जारी…
