हिंदुस्तान की कहानी- चेप्टर ४: हिंदुस्तान की खोज भाग २० : बुद्ध की कहानी

हिंदुस्तान की कहानी’ पंडित जवाहरलाल नेहरू की सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय कृतियों में से है। यह पुस्तक विश्वविख्यात ‘दि डिस्कवरी ऑव इंडिया’ का अनुवाद है। हम उनकी पुस्तक हिन्दुस्तान की कहानी को धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। उम्मीद है धारावाहिक में छोटे आलेख पाठकों को पसंद आयेंगे और वे इस तरह नेहरू के हिन्दुस्तान को पूरा पढ़ पायेंगे। हमें आपकी प्रतिक्रिया और सुझावों का इंतजार रहेगा ताकि हम और बेहतर कर सकें। आज पुस्तक का चैप्टर :४ हिंदुस्तान की खोज भाग २० : बुद्ध की कहानी

बुद्ध की कहानी ने मुझे शुरू बचपन में ही आकषित किया था और मैं युवा सिद्धार्थ की तरफ खिचा था, जिसने बहुत-से अंतद्वंद्वों, दुःख और तप के बाद बुद्ध का पद हासिल किया था। एडविन आर्नल्ड की किताब ‘लाइट ऑव एशिया’ मेरी एक प्रिय पुस्तक वन गई। बाद में जब मैंने अपने सूबे में बहुत-से दौरे किये, तब मैं बुद्ध की कथा से संबंध रखनेवाली बहुत-सी जगहों पर, अपने यात्रा-मार्ग से हटकर भी, जाना पसंद करता था। इनमें से ज्यादातर मुक़ाम या तो मेरे ही सूबे में हैं या उसके नजदीक हैं। यहीं (नेपाल की सरहद पर) बुद्ध का जन्म हुआ, यहीं वह घूमते-फिरते रहे, यहीं गया (बिहार) में उन्होंने बोधि वृक्ष के नीचे बैठकर ज्ञान प्राप्त किया, यही उन्होंने अपना पहला उपदेश दिया और यहीं वह मरे।

जब मैं उन देशों में गया, जहां बोद्ध धर्म अब भो एक जोता-जागता और खास धर्म है, तब मैंने जाकर मंदिरों और मठों को देखा और भिक्खुओं और आम लोगों से मिला और यह जानने की कोशिश की कि बोद्ध धर्म ने जनता के लिए क्या किया। उसने उन पर क्या असर डाला, किस तरह को छाप उनके दिमाग़ों और चेहरों पर छोड़ी और मौजूदा जिदगो की उन पर क्या प्रतिक्रिया हुई ? बहुत कुछ ऐसा था, जिसे मैंने नहीं पसंद किया। बोद्ध-धर्म के बुद्धिवादी नैतिक सिद्धांतों पर इतना कूड़ा-करकट जमा हो गया है, इतने कर्म-कांड, इतने विधि-विधान, और बुद्ध की शिक्षा के बावजूद, इतने आधिभौतिक सिद्धांत और जादू-टोने तक इकट्ठा हो गए हैं कि क्या कहा जाय ! और बुद्ध के सतर्क कर देने पर भो उन्हें ईश्वर माना गया है और उनकी बड़ी-बड़ी मूत्तियां बन गई हैं, जिन्हें मैंने मंदिरों में और और जगहों में अपने सिर की ऊंचाई से भी ऊपर स्थापित देखा है। उस वक्त मैंने मन में सोचा कि अगर वह इन्हें देखते, तो क्या कहते ! बहुत-से भिक्खु अनपढ़ लोग हैं, बल्कि घमडी है, क्योंकि वे यह चाहते है कि उनके सामने माथा झुकाया जाय, अगर उनके सामने नहीं, तो उनके भेस के सामने। हर एक देश में धर्म के ऊपर क्रोमो खासियतों को छाप पड़ी हुई थी और इसने उनके जुदा-जुदा रोति-रिवाजों और रहन-सहन के अनुसार रूप बना रखा था। यह सब स्वाभा-विक ही था और शायद एक लाजिमी विकास था।
लेकिन मैंने बहुत-कुछ ऐसा भी देखा, जिसे मैंने पसंद किया। कुछ मठों में और उनसे लगे हुए विद्यालयों में ध्यान और शांति से अध्ययन करने का वातावरण था। बहुत-से भिक्खुओं के चेहरों पर शांति और सौम्यता मिली, और ओज और दया और तटस्थता का भाव मिला, और संसार की चिताओं से मुक्ति दिखाई दो। क्या ये सब बातें आज की दुनिया में अपनी ठीक जगह रखती है या महज उससे बच निकलने का एक तरीका है? क्या इनका जिदगी के निरंतर संघर्ष से इस तरह मेल नहीं हो सकता कि ये उसके मद्देपन को, उसको लोलुपता को, उसके हिंसा भाव को, कम कर सकें ?
बोद्ध-धर्म का निराशावाद मेरे अपनी जिंदगी के नजरिये से मेल नहीं खाता, न जिदगी और उसके मसलों से भागने की उसकी प्रवृत्ति मेरे अनुकूल पड़ती है। अपने दिमाग़ के किसी छिपे कोने में मैं क़ाफ़िर हूं, और जिस तरह से काफ़िर जिदगी और प्रकृति को उमंग के साथ देखता है, उसी तरह मैं भो देखता हूं, और जिंदगी में जिन संघों का सामना करना पड़ता है, उनसे घबड़ाता नहीं हूं। जो कुछ मैंने अनुभव किया है, या अपने चारों ओर देखा है, वह चाहे जितना तकलोफ और दुःख पहुंचानेवाला रहा हो, उससे मेरे इस नजरिये में फर्क नहीं पड़ा है।
क्या बौद्ध-धर्म निष्क्रियता और निराशावाद सिखाता है? इसकी
व्याख्या करनेवाले ऐसा कह सकते हैं और इस धर्म के बहुत से अनुयायियों ने यही अर्थ निकाला है। मुझमें उसकी बारीकियों पर गौर करने या उसकी बाद को जटिलताओं और आधिभौतिक विकास पर फ़ैसला देने की योग्यता नहीं है। लेकिन जब मैं बुद्ध का ध्यान करता हूं, तो इस तरह के विचार मेरे मन में नहीं उठते, न मैं यही समझता हूं कि निष्क्रियता और निराशा-वाद की बुनियाद पर ठहरे हुए किसी धर्म का आदमियों की इतनी बड़ी संख्या पर, जिसमें क़ाबिल-से-काबिल लोग हो गए हैं, इतना गहरा असर पड़ सकता है।
जान पड़ता है कि बुद्ध की वह कल्पना, जिसे अनगिनत प्रेमपूर्ण हाथों ने पत्थर और संगमरमर और कांसे में गढ़कर साकार किया है, हिंदुस्तानियों के विचारों और भावों की प्रतीक है, या कम-से-कम उसके एक जिदा पहलू की प्रतीक है। कमल के फूल पर शांत और धीर, वासनाओं और इच्छाओं से परे, इस दुनिया के तूफ़ान और कश-मकश से दूर, वह इतने ऊपर, इतने दूर मालूम पड़ते हैं कि जैसे पहुंच से बाहर हों। लेकिन जब फिर उन्हें देखते हैं, तो उस शांत, अडिग आकृति के पीछे एक आवेग और मनोभाव जान पड़ता है, जो अनोखा है और उन आवेगों और मनोभावों से, जिनसे हम परिचित है, ज्यादा जोरदार है। उनकी आंखें मूंदी हुई हैं, लेकिन चेतना की कोई शक्ति उनके भीतर से दिखाई देती है और शरार में एक जीवनी शक्ति भरी हुई जान पड़ती है। युग-पर-युग बीतते हैं, फिर भी बुद्ध इतने दूर के नहीं जान पड़ते हैं; उनकी वाणी हमारे कानों में कुछ धीमे स्वर से कहती जान पड़ती है और यह बताती है कि हमें संघर्ष से भागना नहीं चाहिए, बल्कि धीर नेत्रों से उसका सामना करना चाहिए और जिदगी में विकास और तरक्की और और भी बड़े अवसरों को देखना चाहिए।
सदा की तरह आज भी व्यक्तित्त्व का असर है, और जिस आदमी ने इन्सान के विचारों पर अपनी वह छाप डाली हो, जो बुद्ध ने डाली, जिसमें आज भी हम उनकी कल्पना में कोई जीती-जागती, थर्राहट पैदा करनेवाली चीज पाते हैं, वह आदमी बड़ा ही अद्भुत आदमी रहा होगा- ऐसा आदमी, जो वार्थ के शब्दों में “शांत और मधुर प्रभुता की सजो हुई मूत्ति था, जिसमें सभी प्राणियों के लिए अपार करुणा थी, जिसे पूरी नैतिक स्वतंत्रता मिली हुई थी और जो सभी तरह के पक्षपात से अलग था।” और उस कौम और जाति में, जो ऐसे विशाल नमूने पेश कर सकती है, अक्लमंदी और भीतरी ताक़त को कैसो गही संचित निधि होगी !

जारी…

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