नेहरू के लिए आजादी की परिभाषा: पीयूष बबेले

नेहरू के लिए राष्ट्रवाद गाल बजाने वाला जुमला नहीं, बल्कि उस जमाने के 35-40 करोड़ लोगों का खुशहाल वजूद ही उनका राष्ट्रवाद था. इन सारे लोगों का खुशहाली से जीना और एक साथ आगे बढ़ना ही उनके लिए असली आजादी थी.

नेहरू का देश चलाने का यह तरीका नहीं था. उनकी आजादी की परिभाषा इतनी संकरी नहीं थी. उन्हें इंसान और इंसानियत पर होने वाला हर हमला आजादी पर हमला लगता था. इन हालात से निबटने के लिए वे सार्वजनिक मंच से आंसू बहाने या रस्मी तौर पर खुद को सजा देने की मांग करने के बजाय, देश के मुखिया के नाते सख्ती से डांट-फटकार करते थे. उनके लिए राष्ट्रवाद गाल बजाने वाला जुमला नहीं, बल्कि उस जमाने के 35-40 करोड़ लोगों का खुशहाल वजूद ही उनका राष्ट्रवाद था. इन सारे लोगों का खुशहाली से जीना और एक साथ आगे बढ़ना ही उनके लिए असली आजादी थी.

ऋग वेद का की ऋचा “सहना ववतु, सहनौ भुनक्तु, सह वीर्यम करवा वहै” भले ही आरएसएस के स्कूलों में भोजन मंत्र के तौर पर पढ़ाई जाती हो, लेकिन नेहरू के लिए आजादी का यही मतलब था कि पूरा भारत साथ-साथ बोए, साथ-साथ खाए और साथ-साथ पराक्रम करे. इस साथ के छूटते ही नेहरू को आजादी खतरे में पड़ी नजर आती थी.

15 अगस्त 1950 को लालकिले की प्राचीर से जब नेहरू देश को खिताब कर रहे थे, तो उन्होंने आजादी को बनाए रखने की बुनियादी जरूरतें आम भाषा में बोल रहे दार्शनिक के अंदाज में गिनाईं-

‘‘एक आजाद मुल्क में यह जरूरी है कि खयालात की, विचारों की, आजादी हो. जो चाहें, अपने खयालों का इजहार कर सकें, जो जिस राजनीतिक रास्ते पर चलना चाहें, उस पर चलें, चाहे दल बनाएं, पार्टी बनाएं, सब कुछ करें, ठीक है. क्योंकि अगर यह आजादी न हो तो मुल्क आजाद नहीं रहते. मुल्क गुलाम हो जाता है, दबा हुआ हो जाता है. यह बात सही है. लेकिन जो लोग मुल्क की आजादी के खिलाफ काम करें, या जो लोग कोई ऐसा काम करें, जिससे वह आजादी हिले और कमजोर हो, वे लोग कौन हैं और कैसे हैं और वे किस नाम से पुकारे जाएं.

इसलिए मैं आपको याद दिलाता हूं कि दो बातों को अलग-अलग करना है. एक खयालात की आजादी, एक अमल की आजादी, लेकिन हमेशा इस बात को देखकर कि मुल्क की आजादी को, मुल्क की एकता को और मुल्क की मजबूती को यह बात कमजोर तो नहीं करती. क्योंकि अगर वह मुल्क को कमजोर करती है, तो वह मुल्क के साथ गद्दारी हो जाती है.

इन दोनों बातों में लोग अक्सर फर्क नहीं करते. आजादी के माने यह नहीं हैं कि हर एक आदमी आजादी के नाम पर हर बुरा काम करे. आप अपने खयालात का आजादी से इजहार कीजिए. लेकिन उसके माने यह नहीं कि सड़क या अखबारों में हर एक को गालियां दीजिए.

क्योंकि फिर तो ऐसी बातों से हमारी सारी जिंदगी गिर जाएगी. खास तौर से, आजादी के माने यह नहीं है कि लोग उस आजादी के नाम से उसी आजादी की जड़ें खोदें. अगर कोई ऐसा करे तो जाहिर है कि उसका मुकाबला करना होता है, उसे रोकना होता है, और ऐसे लोग मुल्क में हैं, जो आजादी के नाम से काफी झगड़ा फसाद करते हैं, और उन्होंने काफी उपद्रव भी किया है, मुल्क को काफी कमजोर करने की कोशिश भी की है. उनका मुकाबला हुआ और चूंकि बावजूद कमजोरियों के मुल्क का दिल मजबूत है, इसलिए हम कामयाब हुए और मुल्क आगे बढ़ता जाता है.

बाज लोग हैं, जिन्होंने ऐलान किया कि आज का दिन मनाने में कोई हिस्सा न ले, 15 अगस्त मनाने में कोई हिस्सा न ले. वे लोग एक कदम और आगे बढ़े, और कहा कि इसमें रुकावटें डालनी चाहिए. गौर करें आप कि किस दिमाग से यह खयाल निकलता है, किस दिल से यह जज्बा पैदा होता है और किस किस्म का है? यह क्या कोई खयालात की आजादी का सवाल है, या कोई ऐसा सवाल है कि कोई पार्टी कोई राय रखे? यह बस जड़ और बुनियाद से भारत की आजादी पर हमला है. और जो लोग ऐसा करते हैं, वे चाहे कोई हों, और किसी दल के हों, हमारा फर्ज होता है कि हम उनका मुकाबला करें और पूरे तौर से करें और उनको झाड़ू से हटा दें. इसके माने क्या हैं?

एक मुल्क में इस तरह के लोग हैं जो हर वक्त आपस में फूट की और लड़ाई की आवाज उठाते हैं और हर वक्त यह कहते हैं कि जो आजादी मिली वह काफी नहीं है. इसलिए उसको भी तोड़ना चाहते हैं. अजीब हालत है. या यों कहें उनके दिमाग में कमी है या उनके दिल में या कोई और फितूर है उनमें, इस बात को हमें समझना है.

अगर जी चाहे मुझसे आप लड़ें, मैं आपसे लड़ूं, लेकिन जब हिंदुस्तान का मामला उठता है, तो आप हिंदुस्तानी और मैं हिंदुस्तानी और हिंदुस्तान का हर शख्स हिंदुस्तानी है. और अगर इस बात को कोई नहीं मानता तो वह हिंदुस्तानी नहीं है, वह किसी और मुल्क में जाकर रहे.

बाज दलों की आपस में लड़ाई पैदा करने की, झगड़े पैदा करने की आवाजें फिर उठती हैं. मजहबी झगड़े मजहबी तो होते नहीं, धार्मिक तो होते नहीं, वे तो धर्म का नाम लेकर सियासी होते हैं, राजनीतिक होते हैं. फूट पैदा करना, झगड़ा करना और एक-एक प्रांत में प्रांतीयता बढ़ाना, इस सबसे आप सोचिए मुल्क, तगड़ा होता है, मजबूत होता है या कमजोर होता है?

इसलिए हममें और आप में और हिंदुस्तान के रहने वालों के कितने ही आपस में फर्क हों, मुबारक हो हम में और आप में राय का फर्क. अलग-अलग राय हों, अलग-अलग रायों का इजहार हो, मैं चाहता हूं. मैं यह नहीं चाहता कि हिंदुस्तान के लोग आंखें बंद करके एक आवाज उठाएं, एक ही बात करें- गोया कि उनके कोई दिमाग नहीं, दिल नहीं. हमें हक है अपनी-अपनी आवाज उठाने का, लेकिन किसी हिंदुस्तानी को यह हक नहीं है कि वह ऐसी बुनियादी बातों के खिलाफ आवाज उठाए जो हिंदुस्तान की एकता को, हिंदुस्तान के इतिहास को कमजोर करे.

क्योंकि अगर वह ऐसा करता है, तो वह चाहे या न चाहे, चाहे वह समझे या न समझे, वह हिंदुस्तान के और हिंदुस्तान की आजादी के खिलाफ गद्दारी है. इसलिए इन बुनियादी बातों को हमें समझना है, क्योंकि जमाना नाजुक है और अगर हम अपने मुल्क में मजबूती से कायम नहीं रहे, तो हम इस दुनिया में आगे तरक्की नहीं कर सकते.

और मैं आपसे कहता हूं, आपको हक है कि गवर्नमेंट के जो ऐब हों, कमजोरियां हों, उनकी तरफ आज तवज्जोह दिलाएं, उनकी आप निंदा कीजिए और वक्त आने पर गवर्नमेंट को निकाल दीजिए और बदलिए. आपको पूरा हक है. मुबारक हो आपको यह करना.

लेकिन यह बात आप याद रखिए कि आपको दो बातों को मिलाना नहीं चाहिए, धोखा नहीं खाना चाहिए- कि आप गवर्नमेंट की नीति की निंदा करने में या ऐतराज करने में कोई ऐसा काम करें जिससे हिंदुस्तान की जड़ कमजोर होती हो, बुनियाद कमजोर होती हो. इसका खयाल आपको रखना है. क्योंकि आम तौर से लोग इस बात का खयाल नहीं रखते हैं.

(पीयूष बबेले की फेसबुक पोस्ट से साभार )

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