पटेल की नज़र में नेहरू का व्यक्तित्व : संजीव शुक्ला

एक खास नज़रिए से पटेल की तरफ से अनकही बातों को आगे बढ़ाया जा रहा है। जरूरत है दोनों के बीच पत्राचार को प्रस्तुत किया जाय। इसी क्रम में आज एक लेख जिसे पटेल ने लिखा है, प्रस्तुत है।

मतभिन्नता को स्वीकार करना, उसे आदर देना स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान होती है। मतभिन्नता कांग्रेस की रवायत रही है। कांग्रेस एक दल से ज्यादा, एक भरा-पूरा समाज था, जिसमें तमाम वैचारिक धाराएं मौजूद थीं। एक ऐसा समाज जिसमें विभिन्न दृष्टिकोणों को सहज स्थान मिला हुआ था।
गांधी आगमन के बाद यहां यद्यपि अहिंसात्मक रणनीतियां ही प्रभावी रहीं, तथापि तमाम नेता अपने-अपने स्तर से क्रांतिकारियों की मदद करते रहते थे। गणेशशंकर विद्यार्थी से क्रांतिकारियों के रिश्ते तो सुविख्यात हैं।
कांग्रेस में नेहरू जैसे वामपंथी नेता भी थे, तो दूसरी तरफ मालवीय जैसे दक्षिणपंथी नेता भी थे। कहने का मतलब कांग्रेस वैचारिक मतभिन्नता के स्वीकरण का प्रशिक्षण केंद्र थी। कांग्रेस के शुरुआती चरण में लोकमान्य तिलक और गोखले जैसे लोकप्रिय नेता राजनीतिक कार्यक्रमों के आधार पर विपरीत ध्रुवों पर खड़े हुए थे। 1907 के कांग्रेस के सूरत अधिवेशन की कार्यवाही का ब्योरा पढ़कर आज की पीढ़ी शायद ही यह सोचे कि ये दोनों नेता एक दूसरे का सम्मान भी करते हों। गोखले की मृत्यु पर तिलक द्वारा दी गई भावुक श्रद्धांजलि को देखिए और संबंधों की गरिमा देखिए –
“आज जब उनका पार्थिव शरीर हमारे सामने है, तो मन अनायास ही कह उठता है—भारत का यह हीरा, महाराष्ट्र का यह गहना और परिश्रमियों का यह राजकुमार अब मौन है; पर उसका जीवन ही हमारा पथप्रदर्शक है। उसे देखो, और उसके आदर्शों का अनुसरण करो।”
यह श्रद्धांजलि बताती है कि हमारे पुरखे कितने शालीन थे। यहां मतभिन्नता को सम्मान दिया जाता था। आख़िर मतभिन्नता कहां नहीं होती? क्या एक परिवार में सब एक ही राय के होते हैं? नहीं न! संभव ही नहीं।
नेहरू की मृत्यु पर अटल जी की श्रद्धांजलि पढ़ लीजिए। लगता है कि भावों की अंतहीन यात्रा सी हो।
लेकिन आज उन्हीं अटल जी की पार्टी के लोग राजनीतिक लाभ लेने के लिए गांधी और नेहरू की चरित्र हत्या के रोज नए-नए आख्यान गढ़ते हैं। ये लोग अरसे से गांधी और नेहरू को कमतर साबित करने के लिए उनके समकालीन नेताओं की मतभिन्नता को दुश्मनी के रूप में रेखांकित करते हैं। कई बार झूठे आरोप गढ़ते हैं। कभी पटेल तो कभी सुभाष तो कभी भगतसिंह को नेहरू-गांधी के खिलाफ खड़ा करते हैं। इनके यहां यह अरसे से होता आ रहा है। अटल जी अपवाद ही लगे।

समय पर खंडन न करने से लोगों ने अफवाहों को सच मानना शुरू कर दिया। एक खास नज़रिए से पटेल की तरफ से अनकही बातों को आगे बढ़ाया जा रहा है। जरूरत है दोनों के बीच पत्राचार को प्रस्तुत किया जाय। इसी क्रम में आज एक लेख जिसे पटेल ने लिखा है, प्रस्तुत है।
पटेल ने नवंबर 1949 में अपने एक पत्र में नेहरू पर खुलकर लिखा है । पत्र नेहरू के आंदोलनात्मक चरित्र को भी रेखांकित करता है और उनके अंतर्राष्ट्रीय लोकप्रियता को भी। पत्र लंबा है इसलिए उसके कुछ अंश ही यहां उद्धृत हैं…….

“जवाहरलाल और मैं साथ साथ कॉंग्रेस के सदस्य,आज़ादी के सिपाही,काँग्रेस कार्यकारिणी और अन्य समितियों के सहकर्मी,महात्माजी के (जो हमारे दुर्भाग्य से हमे बड़ी जटिल समस्याओं के साथ जूझने को छोड़ गए हैं) अनुयायी और इस विशाल देश के शासन प्रबंध के गुरुतर भार के वाहक रहे हैं । इतने विभिन्न प्रकार के कर्मक्षेत्रों में साथ रहकर और एक दूसरे को जानकर हम में परस्पर स्नेह होना स्वाभाविक था ।

काल की गति के साथ वह स्नेह बढ़ता गया है और आज लोग कल्पना भी नहीं कर सकते कि जब हम अलग होते हैं और अपनी समस्याओं और कठिनाइयों का हल निकालने के लिए उन पर मिलकर विचार नहीं कर सकते यह दूरी हमें कितनी खलती है । परिचय कि इस घनिष्ठता आत्मीयता और भाईचारे के कारण मेरे लिए यह कठिन हो जाता है कि सर्वसाधारण के लिए उसकी समीक्षा उपस्थित कर सकूं । देश के आदर्श,जनता के नेता, राष्ट्र के प्रधानमंत्री और सब के लाडले जवाहरलाल को जिनके महान कृतित्व का भव्य इतिहास सबके सामने खुली पोती सा है उसे मेरे अनुमोदन की कोई आवश्यकता नहीं है ।

निष्कपट योद्धा की बात ही उन्होंने विदेशी शासन से अनवरत युद्ध किया संयुक्त प्रांत के किसान आंदोलन के संगठन कर्ता के रूप में पहली दीक्षा पाकर वह अहिंसात्मक युद्ध की कला और विज्ञान में निपुण हो गए । उनकी भावनाओं की तीव्रता और अन्याय के प्रति उनके विरोध ने शीघ्र उन्हें गरीबी पर जिहाद बोलने को बाध्य कर दिया । दीन के प्रति सहज सहानुभूति के साथ उन्होंने निर्धन किसान की अवस्था सुधारने के आंदोलन की आग में अपने को झोंक दिया । क्रमशः उनका कार्यक्षेत्र विस्तीर्ण होता गया और शीघ्र ही विशाल संगठन के मौन संगठनकर्ता हो गए,जिसमें अपने स्वाधीनता युद्ध का साधन बनाने के लिए हम सब समर्पित थे ।

जवाहरलाल के ज्वलंत आदर्शवाद, जीवन में कला और सौंदर्य के प्रति प्रेम दूसरों को प्रेरणा और स्फूर्ति देने की अद्भुत आकर्षण शक्ति और संसार के प्रमुख व्यक्तियों की सभा में भी विशेष रुप से चमकने वाले व्यक्तित्व ने एक राजनीतिक नेता के रूप में उन्हें उच्च से उच्च शिखर पर पहुंचा दिया है । पत्नी की बीमारी के कारण की गई विदेश यात्रा में भरतीय राष्ट्रवाद सम्बन्धी उनकी भावनाओं को एक आकाशीय अंतरराष्ट्रीय तल तक पहुंचा दिया । यह उनके जीवन चरित्र के अंतरराष्ट्रीय झुकाव का आरम्भ था,जो अंतरराष्ट्रीय या विश्वसमस्याओं के प्रति उनके रवैये में स्पष्ट लक्षित होता है ।
उस समय से पीछे मुड़कर जवाहरलाल ने नहीं देखा । भारत में भी, बाहर भी उनका महत्व होता गया ।उनकी वैचारिक निष्ठा,उदार प्रव्रत्ति,पैनी दृष्टि और भावनाओं की सच्चाई के प्रति देश और विदेश के लाख लाख लोग श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं ।

अतएव यह उचित ही था कि स्वतंत्रता की उषा से पहले के गहन अंधकार में वह हमारी मार्गदर्शक ज्योति बनें और जब भारत के आगे संकट पर संकट आ रहा हों, तो वह हमारे विश्वास की धुरी हों और हमारी जनता का नेतृत्व करें । हमारे नए जीवन के पिछले कठिन वर्षों में उन्होंने देश के लिए जो अथक परिश्रम किया है, उसे मुझसे अधिक अच्छी तरह कोई नहीं जानता । इस अवधि में उन्हेंने अपने उच्च पद की चिंताओं और गुरुतर भाव के उत्तरदायित्व के भार के कारण बड़ी तेजी से बूढ़ा होते देखा है । शरणार्थियों की सेवा में उन्होंने कोई कसर नहीं उठा रखी और उनमें से कोई कदाचित ही उनके पास निराश लौटा हो । कामनवेल्थ की मंत्रणाओं में उन्होंने उल्लेखनीय भाग लिया है और संसार के मंच पर भी उनका कृतित्व अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।
किंतु इन सबके बावजूद उनके चेहरे पर जवानी की पुरानी रौनक कायम है । संतुलन,मर्यादा-ज्ञान और धैर्य, मिलनसारी का जो आंतरिक संयम और बौद्धिक अनुशासन का परिचय देते हैं अब भी ज्यों का त्यों है । उनका रोष कभी-कभी फूट पड़ता है किंतु उनका अधैर्य क्योंकि कार्य तत्परता के लिए होता है और अन्याय को सहन नहीं करता, इसलिए यह विस्फोट प्रेरणा देने वाला ही होता है और मामलों को तेज़ी से सुलझाने में मदद हो सकती है ।यह मानो सुरक्षित शक्ति हैं,जिससे आलस्य,दीर्घसूत्रता और लगन,या ततपरता की कमी पर विजय प्राप्त हो जाती है

आयु में बड़े होने के नाते मुझे कई बार उन्हें इन समस्याओं पर परामर्श देने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। जो शासन प्रबंध या संगठन के क्षेत्र में हम दोनों के सामने आते रहे । मैंने स्वयं उन्हें सलाह लेने को तत्पर और मानने को राजी पाया है । कुछ स्वार्थ पीड़ित लोगों ने हमारे विषय में भ्रांतियां फैलाने का काम किया है और कुछ भोले व्यक्ति उन पर विश्वास भी कर लेते हैं । किंतु वास्तव में हम लोग अजीवन सहकर्मी, और बंधुओं की भाँति साथ साथ काम करते रहें ।

अवसर की मांग के अनुसार हमने परस्पर एक-दूसरे के दृष्टिकोण के अनुसार अपने को बदला है और एक दूसरे का सम्मान किया है । जैसा कि गहरे विश्वास के बिना नहीं किया जा सकता है । उनके मनोभाव युवकोत्तचित उत्साह लेकर आते रहते हैं और उनमें वह मानसिक लचीलापन है ,जो दूसरों को झेल भी लेता है और निरुत्तर भी कर देता है ।खेलते हुए बच्चों में और विचार संलग्न बूढ़ों मे जवाहरलाल समान भाव से भागी हो जाते हैं । यह लचीलापन और बहुमुखता ही उनके यौवन का,अद्भुत स्फूर्ति और ताज़गी का रहस्य है ।
उनके महान और उज्ज्वल व्यक्तित्व के साथ इन थोड़े से शब्दों के साथ न्याय नही किया जा सकता है ।

-वल्लभ भाई पटेल
नवम्बर 1949

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