कोलकाता मेट्रो की कहानी

कोलकाता मेट्रो की कहानी कुछ ऐसी है कि जैसे किसी शहर के सपने को पहली बार पटरियों पर रखा गया हो, और उस सपने की नींव 29 दिसंबर 1972 को पड़ी, जब इंदिरा गांधी की सरकार ने आधिकारिक रूप से इस परियोजना का शुभारंभ किया।

कोलकाता मेट्रो की कहानी कुछ ऐसी है कि जैसे किसी शहर के सपने को पहली बार पटरियों पर रखा गया हो, और उस सपने की नींव 29 दिसंबर 1972 को पड़ी, जब इंदिरा गांधी की सरकार ने आधिकारिक रूप से इस परियोजना का शुभारंभ किया। उस समय न नज़र में कोई चमचमाती ट्रेन थी, न फोटो खिंचवाने लायक स्टेशन, सिर्फ कागज़ों पर लाइनें, इंजीनियरों के दिमाग में नक्शे और एक भरोसा था कि कभी न कभी यह शहर जमीन के ऊपर की भीड़ से बचने के लिए जमीन के नीचे दौड़ती रेल पर उतरेगा

फिर एक लंबा दौर आया सुरंगों की खुदाई, तकनीकी अड़चनें, पैसों की तंगी, शहर की सड़कों के नीचे चलते ड्रील और ऊपर चलते असंख्य सवाल कि “ये सब होगा भी या नहीं?” लेकिन फाउंडेशन डे पर जो रेखा कागज़ पर खिंची गई थी, वह धीरे-धीरे असली सुरंगों और पटरियों में बदलती रही, और यही वह जगह थी जहां इंदिरा गांधी की दूरदर्शिता शहर के नक्शे से आगे जाकर आने वाली पीढ़ियों की रोज़मर्रा की जिंदगी तक पहुँच रही थी

आखिर वह दिन भी आया, 24 अक्टूबर 1984, जब कोलकाता मेट्रो की पहली यात्री सेवा का उद्घाटन हुआ और शहर ने पहली बार महसूस किया कि “मेट्रो” कोई विदेशी फिल्म का दृश्य नहीं, बल्कि हकीकत में अपनी ही मिट्टी के नीचे चलती हुई भारतीय ट्रेन है। उद्घाटन के उस पल में, कोलकाता अचानक दुनिया के उन चुनिंदा शहरों की कतार में खड़ा हो गया जिनके पास अपना अंडरग्राउंड मेट्रो नेटवर्क था, और बाकी भारत के लिए यह एक संकेत था कि भविष्य की दिशा अब बसों की धूल से निकलकर पटरियों की साफ़गी की तरफ मुड़ रही है

सालों बाद, जब नरेंद्र मोदी अपने चौतीस साल वाले बचपन की कहानी में कोलकाता आकर मेट्रो देखने की उत्सुकता की बात करते हैं, तो कहानी का स्वर थोड़ा बदल जाता है एक तरफ हकीकत की तारीखें, दूसरी जुमलेबाजी और झूठ की बयार , पर एक बात साफ दिखती है: किसी के लिए मेट्रो भाषणों की “याद” बन गई, तो किसी के लिए वह दशकों तक चली बैठकों, फाइलों, इंजीनियरिंग और राजनीतिक जोखिमों के बीच लिया गया ठोस फैसला थी; और कोलकाता की सुरंगों में आज भी उन फैसलों की गूंज ज़्यादा स्पष्ट सुनाई देती है, किसी भी मंच पर सुनाई देने वाली भावुक कहानियों से।
(नेहरू रिवाइव से साभार)

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