असल बात यह है कि भारत विभिन्न संस्कृतियों और जीवन पद्धतियों का देश है, जो उत्तर भारत के लिये पूज्य है, वह पूर्वोत्तर में भक्ष्य है। लेकिन भाजपा सच्चाई नहीं बोल सकती क्योंकि उसकी मंशा गोरक्षा की नहीं गो-राजनीति की है।
भाजपा और संघ वाले अक्सर ऊंची आवाज में गोकशी के खिलाफ नारा बुलंद करते हैं। लेकिन जब बात पूर्वोत्तर के राज्यों की आती है तो इन्हें सांप सूंघ जाता है। हाल ही में भाजपा के एक प्रवक्ता ने पूरी धूर्तता से पार्टी के प्रचारित स्टेंड से पलटी मारी और पूर्वोत्तर की गाय को गाय मानने से ही इनकार कर दिया। और कहा कि इसे खाने में कोई बुराई नहीं है। जबकि असल बात यह है कि भारत विभिन्न संस्कृतियों और जीवन पद्धतियों का देश है, जो उत्तर भारत के लिये पूज्य है, वह पूर्वोत्तर में भक्ष्य है। लेकिन भाजपा सच्चाई नहीं बोल सकती क्योंकि उसकी मंशा गोरक्षा की नहीं गो-राजनीति की है।
नेहरू जी ने बिलकुल शुरू से कहा था कि जनसंघ गाय की रक्षा नहीं, गाय पर राजनीति करता है।
26 अक्टूबर 1952 से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने पूरे देश में गोवध के खिलाफ अभियान चलाया. इस दौरान किए जाने वाले प्रदर्शनों में गायों को भी शामिल किया जाता था. इस मुद्दे को लेकर जनसभाएं की गईं और केंद्र सरकार से पूरे देश में गोवध पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून बनाने की मांग की गईं. इसके अलावा हस्ताक्षर अभियान चलाकर राष्ट्रपति को एक याचिका भेजी गई, जिसमें गोवध रोकने वाले कानून की मांग की गई.
इस सारे घटनाक्रम के मद्देनजर 31 अक्टूबर 1952 को नागपुर में एक जनसभा में नेहरू ने कहा, ‘‘ आरएसएस ने गोहत्या के खिलाफ जो अभियान शुरू किया है, वह एक राजनीतिक चाल है. इस अभियान का गाय से कोई लेना-देना नहीं है.
इस अभियान के पीछे जुड़े लोग पिछले लोकसभा चुनाव में कामयाब नहीं हो सके, उसके बाद से ही वह इस फिराक में थे कि उन्हें कोई ऐसा मुद्दा मिले जिससे वे खुद को लोकप्रिय बना सकें. यह उसी का एक हथकंडा है. मैं इसके उद्देश्यों से पूरी तरह सहमत हूं, लेकिन फिर भी मैं यह मामला राज्य सरकारों के हाथ में छोड़ने को तरजीह दूंगा. राज्य सरकारें अपनी स्थानीय जरूरतों के लिहाज से इस पर फैसला लें.’’
इसके बाद 29 नवंबर 1952 को मध्य प्रदेश के भेलसा (अब विदिशा) में एक जनसभा में नेहरू ने कहा, ‘‘मैं इस देश में गोवध रोकने के लिए केंद्रीय कानून नहीं बनने दूंगा. स्थानीय जनभावनाओं और स्थानीय लोगों की सहमति के बिना पूरे देश में इस तरह का प्रतिबंध लगा देना सिद्धांतों और पुरानी परंपराओं के खिलाफ होगा. राज्यों के पास इस बात की पूरी आजादी है कि वह अपने-अपने इलाके में गोवध पर प्रतिबंध लगाएं, लेकिन यह बिल्कुल बेतुकी बात होगी कि इस मुद्दे पर पूरे देश में एक से नीति बना दी जाए.
सांची से विदिशा तक के रास्ते में मुझे एक पर्चा दिया गया, जिसमें गोवध रोकने की मांग की गई थी. हिंदू महासभा अपने शरारतपूर्ण प्रोपेगंडा से फूट पैदा करना चाहती है और लोगों को बरगला रही है. लोगों को राजनैतिक उद्देश्य से चलाए जा रहे, इस शरारतपूर्ण प्रोपेगंडा से मुगालते में नहीं आना चाहिए. जो लोग गोरक्षा के नारे लगा रहे हैं, उन लोगों का एक ही मकसद है: अपना मकसद पूरा करने के लिए धार्मिक भावनाएं भड़काना.
अगर यह लोग नारेबाजी करने के बजाए देश में गाय की दशा सुधारने के लिए कोई रचनात्मक काम करें, तो मैं उनकी बहुत तारीफ करूंगा. गोवध रोकने के लिए केवल कानून बना देने से हम कहीं नहीं पहुंचेंगे. यूरोप में कई ऐसे देश हैं, जहां गोवध पर किसी तरह का प्रतिबंध नहीं है. लेकिन वहां की गाय हमारे देश की गाय से ज्यादा स्वस्थ हैं और वहां उनकी कहीं बेहतर देखभाल होती है, तो क्यों न इस बात के गंभीर प्रयास किए जाएं कि देश में गायों की उन्नत प्रजाति हो जो लोगों को ज्यादा दूध और मक्खन दे, जिसकी इस समय देश को ज्यादा जरूरत है.
हिंदू महासभा, आरएसएस और जनसंघ जैसे सांप्रदायिक संगठन देश की शांति भंग करने की कोशिश कर रहे हैं. वे सांप्रदायिक नफरत फैलाकर देश की बुनियादी आर्थिक समस्याओं से लोगों का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहे हैं.
अब तक हिंदू महासभा के साथ नरमी का व्यवहार किया गया है लेकिन वह लगातार इसी तरह की तोड़फोड़ करते रहे और लोगों को बरगलाते रहे तो उनके खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे. मैं कहीं भी हिंदू महासभा को खुली चुनौती दे सकता हूं. उन्होंने आम चुनाव लड़ा है. मैं चुनौती देता हूं कि यह संगठन आइंदा वक्त में भी कभी भी मुझसे जोर आजमाइश कर ले.
खुद को हिंदू धर्म का रक्षक बताने वाली सांप्रदायिक संस्थाएं उसी रास्ते पर चल रही हैं, जिस रास्ते पर मुस्लिम लीग चला करती करती थी. और जिसके कारण अंतत: देश का बंटवारा हुआ. पुरानी मुस्लिम लीग की तर्ज पर चल रहे इन संगठनों की कार्यवाहियों से देश को नुकसान पहुंचेगा.’’
पीयूष बबेले की
