डॉ. रेवरेंड मॉट ने पूछा— “मि. गांधी! आपके सार्वजनिक जीवन में आपको आशा और निराशा दोनों मिली होंगी। आपको किस बात ने सबसे अधिक निराश किया?”गांधी जी का अंग्रेजी में उत्तर छोटा लेकिन मर्मभेदी था: “The iron-like hearts of the educated Indians”. “शिक्षित भारतीयों के लोहे जैसे कठोर हृदय।”
महात्मा गांधी और डॉ जान रेवरेंड मॉट की ऐतिहासिक मुलाकात दिसंबर 1936 में हुई थी।
डॉ रेवरेंड मॉट प्रसिद्ध मिशनरी नेता थे और वे गांधीजी से धर्म ,सेवा आदि विषयों पर बातचीत करना चाहते थे।
इस मुलाकात का विवरण हरिजन पत्रिका 19 से 26 दिसंबर और संपूर्ण गांधी वाग्मय में दर्ज है।
डॉ. रेवरेंड मॉट ने पूछा— “मि. गांधी! आपके सार्वजनिक जीवन में आपको आशा और निराशा दोनों मिली होंगी। आपको किस बात से सबसे ज्यादा आशा मिली और किस बात ने सबसे अधिक निराश किया?”
गांधी जी का अंग्रेजी में उत्तर छोटा लेकिन मर्मभेदी था: “The iron-like hearts of the educated Indians”. “शिक्षित भारतीयों के लोहे जैसे कठोर हृदय।”
गांधीजी ने कहा “भारत की सामान्य जनता बहुत कष्ट में जीवन व्यतीत कर लेती है, किन्तु अहिंसा की वृत्ति को नहीं छोड़ती! इससे मुझे आशा और आश्वासन मिला है। लेकिन निराशा की बात यह है कि शिक्षित लोगों के हृदय में दया भाव का स्रोत सूखता जा रहा है, इससे मुझे गहरी चिंता होती है।”
जब रेवरेंड मॉट ने गांधीजी से मिशनरियों द्वारा सेवाभाव किए जाने के प्रचार के बारे में पूछा तो
गांधी जी ने डॉ. मोट से कहा कि “गुलाब को अपनी खुशबू फैलाने के लिए प्रचार करने की आवश्यकता नहीं होती।” उन्होंने सुझाव दिया कि मिशनरियों को उपदेश देने के बजाय अपने जीवन के आचरण से मूक सेवा करनी चाहिए।
गांधीजी ने देख लिया था कि जैसे-जैसे भारतीय शिक्षित होंगे और आर्थिक रूप से संपन्न होंगे, वे अपने ही देश के उन करोड़ों लोगों के प्रति संवेदनशील होने के बजाय उदासीन हो जाएंगे जो अभी भी गरीबी और अभाव में जी रहे हैं। आज जब हम अपने चारों ओर देखते हैं, तो गांधीजी की यह बात हम भारतीयों की ‘बौद्धिक संवेदनहीनता’ के रूप में दिखाई देती है।
मध्यम वर्गीय सक्रियता प्रायः उन्हीं मुद्दों को प्राथमिकता देती है जो सीधे तौर पर खुद उन्हें प्रभावित करते हैं। वंचित वर्गों और समुदायों की छोटी छोटी जरूरतों व संघर्षों को वह पूरी तरह नजरअंदाज कर देती है। यह आत्मकेंद्रित दृष्टि असमानताओं को बनाए रखने में विश्वास रखती है और व्यापक सामाजिक समस्याओं के समाधान के प्रयासों में बहुत बड़ी बाधा बनती है।
एक सफल भारतीय अक्सर अपनी सफलता का श्रेय केवल अपनी कड़ी मेहनत को देता है, जबकि वह उस सामाजिक व्यवस्था और संसाधनों को भूल जाता है जिसने उसे आगे बढ़ने का मंच दिया। इस प्रक्रिया में, वह उन ‘असफल’ या ‘पिछड़े’ भारतीयों के प्रति कठोर हो जाता है जो वैसी ही सुविधाओं के अभाव में संघर्ष कर रहे हैं।
गांधीजी का मानना था कि वास्तविक शिक्षा वह है जो हृदय को उदार बनाए। लेकिन उन्होंने अनुभव किया कि औपनिवेशिक शिक्षा पद्धति ने भारतीयों के भीतर एक ऐसा वर्ग पैदा कर दिया है जो खुद को सामान्य जनता से श्रेष्ठ समझने लगा है।
आज का शिक्षित मध्यम वर्ग अपनी समस्याओं को लेकर तो मुखर है, लेकिन जब बात समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के अधिकारों की आती है, तो वह ‘उदासीन’ हो जाता है।
अक्सर सफल भारतीय ही उन नीतियों या सामाजिक परिवर्तनों का सबसे मुखर विरोध करते हैं जो हाशिए पर रहने वालों को ऊपर उठाने के लिए बनाई जाती हैं। उन्हें डर होता है कि दूसरों की प्रगति उनकी अपनी सुख-सुविधाओं में कटौती कर देगी।
आज के डिजिटल युग में यह “कठोर हृदय” सोशल मीडिया के कमेंट्स,ट्रॉल्स की भाषा शैली और ड्राइंग रूम की चर्चाओं में साफ दिखता है। हम गरीब की लाचारी को उसका ‘आलस्य’ समझ लेते हैं और व्यवस्था की खामियों को ‘किस्मत’ मानकर छोड़ देते हैं। गांधीजी ने इसी प्रवृत्ति को पहचाना था—कि एक शिक्षित व्यक्ति जब संवेदनशील नहीं होता, तो वह समाज के लिए अनपढ़ व्यक्ति से कहीं अधिक घातक साबित होता है।
गांधीजी ने जोर दिया था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल आजीविका कमाना नहीं, बल्कि ‘सर्वोदय’ (सबका उदय) होना चाहिए। यदि शिक्षा आपको अपने समाज के प्रति सहानुभूति से नहीं भरती, तो वह केवल एक कागजी डिग्री है।
गांधीजी की यह निराशा आज हमारे लिए एक चुनौती है। इस ‘लोहे जैसे कठोर हृदय’ को पिघलाने के लिए हमें कुछ बुनियादी बदलाव करने होंगे:
सहानुभूति का समावेश: हमारी शिक्षा और कॉर्पोरेट संस्कृति में सहानुभूति (Empathy) को एक अनिवार्य गुण माना जाना चाहिए।
सामाजिक ऋण की स्वीकारोक्ति: सफल भारतीयों को यह स्वीकार करना होगा कि उनकी सफलता में समाज के हर वर्ग का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष योगदान है।
सक्रिय नागरिकता: मध्यम वर्ग को केवल अपनी सुख-सुविधाओं के खोल से बाहर निकलकर सामाजिक न्याय और समावेशी विकास के लिए आवाज उठानी होगी।
गांधीजी की वह चेतावनी आज हमारे आईने की तरह है। यदि हम एक राष्ट्र के रूप में विकसित होना चाहते हैं, तो हमें अपनी सामूहिक संवेदनशीलता को भी मापना होगा। शिक्षित होने का अर्थ केवल ‘सफल’ होना नहीं, बल्कि दूसरों की सफलता का मार्ग प्रशस्त करना है।
जब तक सफल भारतीय, असफल भारतीयों के लिए बाधा बनने के बजाय सीढ़ी नहीं बनेंगे, तब तक गांधीजी का वह दर्द और उनकी वह हताशा प्रासंगिक बनी रहेगी।
Gandhi Darshan – गांधी दर्शन
15 जनवरी 2026 से साभार
