नेहरू ने उस दौर में जो गुटनिरपेक्षता की नींव रखी थी, उसका सबसे बड़ा इम्तिहान स्वेज की लहरों में ही हुआ था।स्वेज संकट के बाद नासिर ने दुनिया से कहा था ” इजिप्ट के पास अपनी सेना है, लेकिन भारत के पास दुनिया का विवेक Conscience है।”
Paw Paw ने तो कोई वॉर नहीं रुकवाई लेकिन हां चाचा ने जरूर रुकवाई थी ।
बिलियन डॉलर्स का खेल था और दुनिया परमाणु हमले की धमकी खा चुकी थी।
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स्वेज 1956, दिल्ली की एक आवाज़ ने लंदन और पेरिस के साम्राज्य का सूर्यास्त कर दिया।
इजिप्ट का स्वेज नहर गवाह है ,जब एक हाल में आजाद हुए, एक उभरते हुए राष्ट्र के हौसले ने पुरानी दुनिया के सुपरपावर्स का अहंकार चूर-चूर कर दिया था।
1956 का स्वेज संकट महज़ एक नहर का विवाद नहीं, बल्कि एशिया-अफ्रीका के पुनर्जन्म की घोषणा थी।
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स्वेज नहर दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक धमनी थी। यूरोप का 60% तेल यहीं से गुज़रता था।
स्वेज़ नहर 1869 में खुली, जिसमें पैसा फ्रांसीसी और इजिप्ट की सरकारों का लगा था।
नहर का संचालन स्वेज़ कंपनी द्वारा किया जाता था , जो एक इजिप्टियन चार्टर्ड कंपनी थी।नहर के आसपास का क्षेत्र संप्रभु इजिप्ट का क्षेत्र बना रहा।
यानि ये नहर इजिप्ट से गुजरने के बावजूद इजिप्ट की नहीं थी।
यह नहर रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण थी, क्योंकि यह भूमध्य सागर और हिंद महासागर के बीच सबसे छोटा समुद्री रास्ता था।
1875 में, कर्जे और पैसों के संकट के परिणामस्वरूप, इजिप्ट को कंपनी में अपने शेयर ब्रिटिश सरकार को बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा।
उन्होंने कंपनी में 44% हिस्सेदारी 40 लाख पाउंड (आज के तकरीबन 500 लाख पाउंड के बराबर) में प्राप्त की।
1882 में इजिप्ट पर आक्रमण और कब्ज़े के साथ , ब्रिटेन ने देश के साथ-साथ नहर, उसके फाइनेंस और संचालन पर भी वास्तविक नियंत्रण प्राप्त कर लिया।
इजिप्ट के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर ने जब इसका राष्ट्रीयकरण किया, तो वह केवल एक नहर नहीं छीन रहे थे, बल्कि ब्रिटेन और फ्रांस की तिजोरी पर हाथ मार रहे थे।
यह राष्ट्रीयकरण स्वेज नहर पर बलपूर्वक कब्जा करके किया गया।
इजिप्ट को अपनी ही जमीन पर बनी इस नहर से होने वाली अरबों डॉलर की कमाई का बहुत मामूली हिस्सा मिलता था।
नासिर का तर्क साफ था
“हमारी ज़मीन, हमारा खून, हमारा पसीना… तो मुनाफ़ा किसी विदेशी कंपनी का क्यों?”
जब कूटनीति विफल हुई, तो ब्रिटेन और फ्रांस ने एक ऐसी साजिश रची जो आज के दौर के किसी जासूसी थ्रिलर से कम नहीं थी।
उन्होंने इज़रायल के साथ मिलकर पेरिस के बाहरी इलाके सेवरेस।में एक गुप्त समझौता किया।
◾ इज़रायल इजिप्ट पर अचानक हमला करेगा।
◾ ब्रिटेन और फ्रांस शांति बहाल करने के नाम पर हस्तक्षेप करेंगे।
◾वे अंग्रजों वाली पुरानी चाल चलकर फिर से नहर और इजिप्ट की राजनीति पर कब्ज़ा करना चाहते थे।
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इस पूरे घटनाक्रम में भारत और पंडित नेहरू की भूमिका सबसे निर्णायक थी। नेहरू ने इस संकट को भांप लिया था।
उन्होंने नासिर का समर्थन किया, इसे “20वीं सदी में 19वीं सदी की मानसिकता का हमला” करार दिया।
♦️नेहरू ने अपने सबसे भरोसेमंद दूत कृष्ण मेनन को काहिरा Cairoभेजा।
♦️मेनन और नासिर की घंटों लंबी बैठकों के बाद ही वह ऐतिहासिक प्रस्ताव तैयार हुआ, जिसे रूस और भारत ने लंदन में पेश किया।
♦️नेहरू का मानना था कि कानूनन इजिप्ट सही है, लेकिन व्यावहारिक रूप से उसे दुनिया को व्यापार की गारंटी देनी होगी।
अगस्त 1956 ,स्वेज संकट सुलझाने के लिए लंदन में 22 देशों की बैठक हुई, जिसमें इजिप्ट शामिल नहीं हुआ और उसने अपनी बात रखने के लिए भारत और सोवियत संघ पर भरोसा जताया।
सम्मेलन दो गुटों में बँट गया
♦️पश्चिमी गुट…अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस के नेतृत्व में 15 देशों ने नहर पर अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण की मांग की।
♦️भारतीय गुट… भारत ने एक बीच का रास्ता निकाला, जिसे नासिर की मंजूरी प्राप्त थी।
भारत का प्रस्ताव था कि नहर का स्वामित्व और संचालन मिस्र के पास रहे, लेकिन उस पर केवल अंतरराष्ट्रीय Supervision हो।
भारत ने इजिप्ट द्वारा नहर पर अचानक कब्जे की आलोचना तो की, लेकिन उसकी संप्रभुता और मालिकाना हक का पुरजोर समर्थन कर पश्चिमी शक्तियों के मंसूबों को रोक दिया।
♦️ नेहरू ने Commonwealth छोड़ने तक की चेतावनी दे डाली।
उन्होंने लंदन को साफ कहा कि “अगर आप एशिया के एक देश की संप्रभुता का अपमान करेंगे, तो भारत चुप नहीं बैठेगा।”
♦️नेहरू के दूत कृष्ण मेनन ने संयुक्त राष्ट्र में ऐसी कानूनी और नैतिक दलीलें पेश कीं कि ब्रिटेन और फ्रांस अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में पूरी तरह अलग-थलग पड़ गए।
♦️यह इतिहास का विरल क्षण था जब शीत युद्ध के दो धुर विरोधी (USA और USSR) नेहरू के तर्क और विश्व जनमत के दबाव के कारण एक साथ खड़े हो गए।
♦️अमेरिका ने ब्रिटेन को आर्थिक बर्बादी की धमकी दी, तो सोवियत संघ ने परमाणु हमले की।
हारकर भी जीत गए नासिर, जीतकर भी हार गए साम्राज्यवादी
सैन्य रूप से इज़रायल और ब्रिटेन की सेना जीत रही थी, लेकिन वैश्विक दबाव ने उन्हें शर्मनाक वापसी के लिए मजबूर कर दिया।
♦️ब्रिटिश प्रधानमंत्री एंथनी ईडन को अपमानजनक तरीके से इस्तीफा देना पड़ा।
♦️ब्रिटेन और फ्रांस के लिए यह संदेश था कि अब वे दुनिया के थानेदार नहीं रहे।
♦️इजिप्ट को अपनी नहर मिली और भारत को शांतिदूत की नई पहचान।
नासिर ने स्वीकार किया कि अगर भारत की आवाज़ और नेहरू की कूटनीति नहीं होती, तो इजिप्ट का नक्शा ही कुछ और होता।
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उन्होंने नेहरू को लिखा
“जब हम चारों ओर से घिरे थे, तब दिल्ली से उठी आपकी आवाज़ ने हमें यह अहसास कराया कि हम अकेले नहीं हैं। भारत ने न केवल इजिप्ट का, बल्कि उभरते हुए एशिया और अफ्रीका के आत्म-सम्मान का बचाव किया है।”
♦️ नासिर स्वभाव से उग्र थे, लेकिन उन्होंने बाद में स्वीकार किया कि नेहरू की Sober Advice ने उन्हें बड़ी गलती करने से बचाया।
उन्होंने आभार व्यक्त किया कि नेहरू ने उन्हें उकसावे में आने से रोका और अंतरराष्ट्रीय मंच पर इजिप्ट के पक्ष को इतनी मजबूती से रखा कि हमलावर देशों को आक्रामक साबित होना पड़ा।
♦️♦️संकट के बाद के पत्राचार में नासिर अक्सर नेहरू को “मेरे प्रिय भाई” या “एशिया का प्रकाश” कहकर संबोधित करने लगे थे।
उन्होंने लिखा कि स्वेज की जीत जितनी इजिप्ट की थी, उतनी ही भारत की भी थी, क्योंकि भारत ने ही इस विवाद को ‘उपनिवेशवाद बनाम आजादी’ की लड़ाई में बदल दिया था।
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स्वेज संकट ने सिखाया कि जब आर्थिक हितों के लिए ताकतवर देश छोटे देशों को दबाते हैं, तो एक निडर कूटनीति और नैतिक गठबंधन इतिहास का रुख बदल सकता है।
स्वेज संकट के बाद नासिर ने दुनिया से कहा था ” इजिप्ट के पास अपनी सेना है, लेकिन भारत के पास दुनिया का विवेक Conscience है।”
नेहरू ने उस दौर में जो गुटनिरपेक्षता की नींव रखी थी, उसका सबसे बड़ा इम्तिहान स्वेज की लहरों में ही हुआ था।
बंदूकें शायद इलाक़े जीत लें, लेकिन हक़ की आवाज़ अंततः साम्राज्य भी ढहा देती है।
चाचा ने वॉर रुकवा दी थी…
(कपिल शेरोन की पोस्ट से)
