निशिकांत दुबे के भ्रामक आरोपों के संदर्भ में लोकसभा अध्यक्ष ने एक बार भी तथ्यों की प्रामाणिकता को लेकर सवाल नहीं किया। विदित हो कि दुबे ने कहा कि “जब महात्मा गांधी का निधन हुआ तो जवाहरलाल नेहरू शोक मनाने के बजाय एडविना माउंटबेटन के साथ अकेले एक कमरे में थे।”
कथित राष्ट्रवादी पार्टी का कोई नेता हो, उसे गांधी-नेहरू का चरित्र हनन करना ही है। लग रहा इनके यहां प्रमोशन का यही इकलौता मानक है। वैसे छुटभैयों को क्या ही कहा जाय जब शीर्ष नेतृत्व ही संसद के भीतर और बाहर गलतबयानी करता रहा हो। नेहरू ने भारतीयों को आलसी कहा, नेहरू ने पटेल के अंतिम संस्कार में जाने से मना कर दिया आदि-आदि, जाने कितने ही झूठ तैराए गए।
अभी इनके एक नेता दुबे ने अपने बयानों से पार्टी की स्थापित अफ़वाही परंपरा को आगे बढ़ाया है। ऐसे लोग अपनी बात को प्रामाणिक दिखाने के लिए किताब और पन्ना ऐसे लहराते हैं जैसे कोई गूढ़ दस्तावेज लेके आए हों, भले ही उन पन्नों पर उनके घर के दूध का हिसाब लगा हो।
असलियत यह है कि इनका किताबों से दूर-दूर तक वास्ता नहीं है। यह मतभिन्नता को दुश्मनी के रूप में रेखांकित करने तक की सामर्थ्य रखते हैं।
जब ये नेहरू की भांजी नयनतारा सहगल और उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित की तस्वीरों को लेकर के चरित्र हनन कर सकते हैं, तो बाकियों के लिए क्या ही कहा जाय! अभी हाल में इनकी यह घृणित मानसिकता राहुल के ‘भारत जोड़ो आंदोलन’ के समय भी दिखी।
निशिकांत दुबे के भ्रामक आरोपों के संदर्भ में लोकसभा अध्यक्ष ने एक बार भी तथ्यों की प्रामाणिकता को लेकर सवाल नहीं किया।
दुबे ने कहा कि “जब महात्मा गांधी का निधन हुआ तो जवाहरलाल नेहरू शोक मनाने के बजाय एडविना माउंटबेटन के साथ अकेले एक कमरे में थे।”
अपनी बात के पक्ष में इन्होंने पामेला माउंटबेटन हिक्स जो कि एडविना माउंटबेटन की पुत्री हैं, की किताब का हवाला दिया है। जबकि वास्तविकता यह है कि किताब में ऐसा कुछ लिखा ही नहीं है। इसमें बेटी ने साफ लिखा है कि मम्मी यानी एडविना उस समय मद्रास में ही रुक गईं थीं और हम लोग दिल्ली आ गए थे। अब धूर्तता देखिए इनकी कि जो शख़्स मद्रास में हो उसे दिल्ली में होना दिखा रहे हैं। फैज़ का यह शेर कितना मौजूं है –
“वो बात सारे फ़साने में जिस का ज़िक्र न था,
वो बात उन को बहुत ना-गवार गुज़री है”
हमें लग रहा भगवान राम के रावण विजय के उपरांत अयोध्या वापस आने पर माँ सीता पर आरोप लगाने वाले इनके ही कोई पर-पुरखे रहे होंगे।
आरोप लगाते समय ये निधन की सूचना ऐसे दे रहे हैं, मानों गांधी जी की स्वाभाविक मृत्यु हुई हो। कितने छिछले आरोप हैं? क्या कोई बेटी अपनी मां के लिए ऐसा लिखेगी, सोचने वाली बात है। ऐसे लोग नाथूराम गोडसे का तो महिमामंडन करते हैं, लेकिन गांधी के अनन्य अनुयायी नेहरू को लांछित करने के लिए झूठे आरोप लगाने तक से नहीं चूकते।
गांधी जी की हत्या 30 जनवरी 1948 को शाम को हुई थी। लुई फिशर ने गांधी-हत्या का विस्तृत ब्यौरा दिया है।वे ब्यौरे के क्रम में लिखते हैं – “गांधीजी की निरंतर देखभाल करनेवाले युवक और युवतियाँ शव के पास बैठ गए और सिसकियाँ भरने लगे। डा० जीवराज मेहता भी आ पहुँचे और उन्होंने पुष्टि की कि मृत्यु हो चुकी। इसी समय उपस्थित समुदाय में सुरसुराहट फैली।
जवाहरलाल नेहरू दफ्तर से दौड़े हुए आए। गांधीजी के पास घुटनों के बल बैठकर उन्होंने अपना मुँह खून से सने कपड़ों में छिपा लिया और रोने लगे। इसके बाद गांधीजी के सबसे छोटे पुत्र देवदास और मौलाना आजाद आए। इनके पीछे बहुत से प्रमुख व्यक्ति थे।”
गांधी की हत्या कोई सामान्य व्यक्ति की हत्या नहीं थी। गांधी भारत की नैतिक चेतना के सर्वोच्च प्रतीक बन चुके थे। उनकी मृत्यु पर तो पूरी दुनिया शोकमग्ना थी, फ़िर भला उनका प्रिय शिष्य इससे अछूता कैसे रह सकता था। ऐसा आरोप तो नेहरू के धुर विरोधी भी नहीं लगा सकते थे।
लग रहा ऐसे जुगुप्सादायक विचार घृणा के सतत अभ्यास से ही संभव हो सकते हैं।
ख़ैर इस महात्रासदी के बाद पटेल और नेहरू दोनों ने देश को संयत करने और अपने प्रिय नेता को श्रद्धांजलि देने के उद्देश्य से उसी रात आकाशवाणी पर देश के नाम संबोधन दिए। नेहरू शोक के अतिरेक में थे। उनका संबोधन भारत के इतिहास में अनोखी श्रद्धांजलि के रूप में दर्ज हो गई। उन्होंने देश के नाम अपने संबोधन में कहा –
“मित्रों और साथियों,
हमारे जीवन से एक प्रकाश चला गया है और चारों ओर अंधकार छा गया है। मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं आपसे क्या कहूँ और कैसे कहूँ।
हमारे प्रिय नेता, जिन्हें हम बापू कहते थे, राष्ट्रपिता, अब हमारे बीच नहीं रहे। शायद मैं यह कहकर गलती कर रहा हूँ कि वह प्रकाश चला गया है, क्योंकि वह प्रकाश कोई साधारण प्रकाश नहीं था।
वह प्रकाश जिसने इतने वर्षों तक इस देश को प्रकाशित किया, वह आगे भी आने वाले वर्षों में इस देश को मार्ग दिखाता रहेगा।
हजारों साल बाद भी वह प्रकाश इस देश में दिखाई देगा और दुनिया उसे देखेगी। वह प्रकाश हमें सही रास्ता दिखाएगा और इस प्राचीन देश को आज़ादी के सही मार्ग पर ले जाएगा।
आज यह दुख का क्षण है। हम सबको मजबूत रहना होगा और उस रास्ते पर चलना होगा जो बापू ने हमें दिखाया था।”
नेहरू की इस भावपूर्ण अभिव्यक्ति में उनके दुःख को समझना मुश्किल नहीं। बस वही नहीं समझ सकते जो विभीषिकाओं का दिवस मनाने के अभ्यासी हैं।
- संजीव शुक्ल की पोस्ट से साभार
