पं.नेहरू का साहित्यकारों के संग गहरा तादात्म्य था

प्रकाशक तो निराला की किताबों को बेचकर अच्छा-ख़ासा धन कमा रहे, पर निराला मुफ़लिसी में जी रहे हैं। अतः अपने खत में नेहरू ने लिखा कि “निराला का उदाहरण प्रकाशकों द्वारा एक लेखक के शोषण का ज्वलंत उदाहरण हैं”। नेहरू ने अकादेमी से यह आग्रह भी किया कि वह कॉपीराइट कानून में कुछ ऐसे बदलाव कराये, जिससे भविष्य में भारतीय लेखकों का कोई शोषण न हो।

पं.नेहरू का साहित्य जगत की हस्तियों के संग अपनेपन का गहरा तादात्म्य था। अपने शहर इलाहाबाद में तो निराला हों या महादेवी वर्मा अथवा फिराक सभी से उनका गहरा नाता था। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी को एक बार पता चला कि नेहरू आये हैं, तो वह अपनी चाय की प्याली लिये लुंगी पहने ही अमर नाथ झा के घर नेहरू से मिलने जा धमके, पर जब सीढ़ियां चढ़ने लगे, तो वहां तैनात पुलिस वालों ने उन्हें रोक दिया। क्यों रोक रहे‌ हो, पूछने पर उतर था कि ऊपर प्रधानमंत्री हैं। निराला गरजे कि मैं प्रधानमंत्री से नहीं जवाहरलाल से मिलने आया हूं, लेकिन उन‌ लोगों ने नहीं जाने दिया, तो नाराज निराला लौट पड़े। तब तक खबर ऊपर पहुंच गई और कुछ वरिष्ठ लोग‌ भागे आये कि पंडित जी चलें मिल लें, पर नाराज निराला नहीं लौटे।

इसी तरह बताते हैं कि एक बार नेहरू बीमार पी.डी.टंडन को देखने उनके घर गये थे। पता चला निराला जी की भी तबियत कुछ नाशाद है। नेहरू उन्हें भी देखने पास में उनके घर जाना चाहते थे, पर समय नहीं था, इसलिये कार भेज कर उन्होंने निराला जी को लिवा लाने के लिये किसी को भेजा। उसने निराला जी के यहां पहुंच कर कहा गया कि प्रधानमंत्री जी ने आपको बुलाया है, गाड़ी भेजी है। निराला बोले मुझे प्रधानमंत्री से क्या काम और मना कर दिया।

दूसरी ओर एक और भी वाकया है कि एक बार प्रधान मंत्री नेहरू अपने शहर में एक सभा में भाषण कर रहे थे और अखाड़े में निराला को खबर मिली तो वह लुंगी लपेट नंगे बदन और छाती पर चमक रहा मालिश का तेल लपेटे हुये ही सभा में पहुंच कर अग्रिम पांत मेंं बेठ गये। ऐसे रूप में तरह सीधे अखाड़े से पहुंचे निराला का वह निराला स्वरूप अनायास हर किसी का ध्यान खींच रहा था। मंच पर मालाओं से लदे नेहरू बोलने खड़े हुये, तो भाषण के अंत में एक कथा सुनाई कि एक राजा के दो बेटे थे- एक बड़ा प्रतिभा सम्पन्न और दूसरा‌ थोड़ी कम बुद्धि वाला था। राजा को अपने बाद का राजा नामित करना पड़ा तो राजा ने कम बुद्धि वाले को तो राजपाट देने का फैसला कि वो यह काम तो कर लेगा, लेकिन साहित्य का सर्जनात्मक काम तो तीव्र बुद्धि वाला बालक ही कर सकता है। यह कहने के बाद वह‌ भाषण समाप्त कर मंच से उतरे तो अपने गले में पड़ी सारी मालायें निकाल कर निराला जी के चरणों पर डाल दी।

रामचन्द्र गुहा भी एक वाकया बयां करते हुये लिखते हैं कि साहित्य अकादमी 1954 में बनी थी और अगले ही दिन प्रधानमंत्री नेहरू ने अकादेमी सचिव कृष्ण कृपलानी को ख़त लिखा कि “निराला पहले भी काफी सृजनात्मक लेखन कर चुके हैं और आज भी जब अपने रौ में लिखते हैं तो कुछ बेहतर लिखते हैं”। दरअसल निराला की किताबें तब लोकप्रिय थीं और पाठ्य-पुस्तकों के रूप में भी उन्हें पढ़ा जाने लगा था। नेहरू के शब्दों में, “निराला ने अपनी किताबों को महज़ 25, 30 या 50 रूपये पाकर ही प्रकाशकों को दे दिया था। लगभग सारी किताबों के कॉपीराइट निराला प्रकाशकों को दे चुके हैं। सो नतीजा यह है कि “प्रकाशक तो निराला की किताबों को बेचकर अच्छा-ख़ासा धन कमा रहे, पर निराला मुफ़लिसी में जी रहे हैं। अतः अपने खत में नेहरू ने लिखा कि “निराला का उदाहरण प्रकाशकों द्वारा एक लेखक के शोषण का ज्वलंत उदाहरण हैं”। नेहरू ने अकादेमी से यह आग्रह भी किया कि वह कॉपीराइट कानून में कुछ ऐसे बदलाव कराये, जिससे भविष्य में भारतीय लेखकों का कोई शोषण न हो। आगे नेहरू ने लिखा, इस दौरान निराला को कुछ आर्थिक मदद जरूर दी जानी चाहिए। यह आर्थिक मदद सीधे तौर पर निराला के हाथ में नहीं दी जानी चाहिए, क्योंकि वे तुरंत ही इसे किसी जरूरतमंद को दे देंगे। असल में, वे अपने कपड़े और सारी चीजें ऐसे ही लोगों को दे दिया करते हैं। उस समय महादेवी वर्मा और इलाहाबाद के एक साहित्यिक संगठन से जुड़े सदस्य निराला की जरूरतों का खयाल रखते थे और उनकी आर्थिक मदद भी किया करते थे। अतः प्रधानमंत्री नेहरू ने अकादेमी को सुझाव दिया कि निराला को सौ रुपए की मासिक वृत्ति दी जाय और यह रकम निराला के एवज में महादेवी वर्मा को दी जाय। तीन दिन बाद ही अकादेमी के सचिव ने नेहरू को जवाबी ख़त लिखा। सचिव ने लिखा कि उन्होंने अपने मंत्रालय के प्रमुख मौ. अबुल कलाम आज़ाद से बात की और उन्होंने इस बात के लिए अपनी सहमति दे दी है कि “निराला को सौ रूपये की मासिक वृत्ति दी जाए और यह रकम महादेवी वर्मा को ही सौंपी जाय”। राजनीति, साहित्य और पत्रकारिता जगत के बीच ऐसा गहरा आत्मीय और संवेदनात्मक तादात्म्य उस दौर का वैशिष्ट्य था और नेहरू उसके आदर्श प्रतीक।

(प्रो सतीश कुमार की पोस्ट से साभार)

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