गुटनिरपेक्षता की शुरुआती व्यावहारिक परीक्षा वास्तव में कोरिया में ही हुई, और भारत ने नेहरू के नेतृत्व में यह साबित किया कि बिना किसी पक्ष की जेब में गए भी एक देश अंतरराष्ट्रीय शांति में ठोस और निर्णायक योगदान दे सकता है।
1950 के दशक की शुरुआत में दुनिया एक ऐसे मोड़ पर थी, जहाँ तीसरे विश्वयुद्ध का खतरा पूरी तरह सामने दिखाई दे रहा था। कोरिया दो हिस्सों में बँट चुका था उत्तर कोरिया, जिस पर सोवियत संघ और बाद में चीन का प्रभाव था, और दक्षिण कोरिया, जो अमेरिका और उसके सहयोगियों के समर्थन में खड़ा था। 25 जून 1950 को उत्तर कोरिया की सेनाओं ने दक्षिण कोरिया पर हमला किया और देखते‑देखते कोरिया युद्ध शुरू हो गया
संयुक्त राष्ट्र ने दक्षिण कोरिया की मदद के लिए हस्तक्षेप करने का फैसला किया, और अमेरिका के नेतृत्व में बहुराष्ट्रीय सेना कोरियाई प्रायद्वीप में उतर गई। दूसरी तरफ उत्तर कोरिया के पीछे सोवियत संघ था, और जब उत्तर की सेनाएँ पिछड़ने लगीं, तो चीन ने खुलकर हस्तक्षेप किया और लाखों सैनिक कोरिया भेजे। युद्ध कुछ ही महीनों में इतना फैल गया कि कभी दक्षिण लगभग पूरा उत्तर कोरिया तक पहुँच जाता, कभी उत्तर और चीनी सेना दक्षिण कोरिया पर भारी पड़ जाती। यह संघर्ष सीधे‑सीधे अमेरिका बनाम चीन‑सोवियत की टक्कर में बदल रहा था
उसी समय भारत एक नया आज़ाद देश था, और उसके पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक अलग रास्ता तलाश रहे थे। न वे किसी सैन्य गुट में शामिल होना चाहते थे, न किसी एक महाशक्ति के खेमे में खड़े होना। नेहरू को साफ दिख रहा था कि अगर कोरिया की आग भड़कती रही, तो सिर्फ एशिया ही नहीं, पूरा विश्व एक बड़े युद्ध की तरफ बढ़ सकता है
भारत ने संयुक्त राष्ट्र में उत्तर कोरिया के आक्रमण की निंदा की, और कोरिया की सहायता के प्रस्ताव का समर्थन भी किया, लेकिन उसने अपने सैनिक युद्ध में भेजने से साफ इनकार कर दिया। भारत ने सिर्फ एक मेडिकल मिशन कोरिया भेजा, ताकि वह मानवीय सहायता दे सके। यह कदम बहुत प्रतीकात्मक था भारत ने दुनिया को संदेश दिया कि वह युद्ध नहीं, शांति और मानवीय सहायता का पक्षधर है
नेहरू की कोरिया नीति का मूल विचार यह था कि संघर्ष को किसी भी कीमत पर सीमित रखा जाए। वे नहीं चाहते थे कि यह युद्ध कोरिया से बाहर फैले और अमेरिका तथा चीन सीधे व्यापक युद्ध में उलझ जाएँ। साथ ही वे इस बात पर जोर देते रहे कि कोरिया का भविष्य बाहरी ताकतों के बजाय कोरियाई जनता ही तय करे
जैसे‑जैसे समय बीतता गया, युद्ध थकान की स्थिति में पहुँच गया। मोर्चा लगभग 38वें समानांतर के आसपास स्थिर हो गया। दोनों पक्ष समझ चुके थे कि पूरी तरह सैन्य विजय संभव नहीं है। ऐसे में युद्धविराम और समझौते की बातचीत शुरू हुई। लेकिन इस बातचीत में एक गंभीर अड़चन थी, जो महीनों तक हट नहीं पाई युद्धबंदी यानी Prisoners of War का सवाल।
समस्या यह थी कि दोनों पक्ष युद्धबंदियों के मामले में बिल्कुल उलट नीतियाँ लेकर बैठे थे। चीन और उत्तर कोरिया की मांग थी कि जितने भी सैनिक दुश्मन के हाथों पकड़े गए हैं, उन्हें हर हाल में वापस भेजा जाए, चाहे वे लौटना चाहें या नहीं। उनके लिए यह राष्ट्रीय प्रतिष्ठा और नियंत्रण का सवाल था। दूसरी तरफ अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र का तर्क था कि जिन सैनिकों को अपने देश लौटने से डर लगता है, या जो विचारधारात्मक कारणों से वापस नहीं जाना चाहते, उन्हें ज़बरदस्ती भेजना मानवाधिकार के खिलाफ होगा। इसलिए वे “स्वैच्छिक वापसी” के सिद्धांत पर जोर दे रहे थे।
हज़ारों युद्धबंदी, खासकर कुछ उत्तर कोरियाई और चीनी, वापसी से डर रहे थे। उन्हें आशंका थी कि अगर वे अपने देश गए, तो उन्हें देशद्रोही घोषित कर दिया जाएगा, जेल या मौत उनका इंतज़ार करेगी। यही मुद्दा पूरी बातचीत का सबसे बड़ा रोड़ा बन गया। हथियारबंद टकराव रुका रहा, लोग मरते रहे, लेकिन समझौते की मेज पर सिर्फ एक सवाल अटका रहा इन युद्धबंदियों का क्या होगा?
यहीं से भारत और नेहरू की भूमिका निर्णायक रूप से सामने आती है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रतिनिधि और नेहरू के करीबी सहयोगी वी.के. कृष्णा मेनन ने 1952 में एक विस्तृत प्रस्ताव तैयार किया, जिसे बाद में “Indian Resolution on Korea” के नाम से जाना गया। इस प्रस्ताव की आत्मा यह थी कि युद्धबंदियों के लिए न पूरी तरह ज़बरदस्ती हो, न पूरी तरह किसी एक पक्ष की शर्तें; समाधान तटस्थ और मानवीय हो।
भारतीय प्रस्ताव में कहा गया कि युद्धबंदियों की वापसी का आधार स्वैच्छिक होना चाहिए। जिन सैनिकों को अपने देश लौटना है, उन्हें लौटाया जाए, लेकिन जो वापस नहीं जाना चाहते, उन्हें ज़बरदस्ती भेजना उचित नहीं होगा। इन सभी युद्धबंदियों को पहले एक तटस्थ आयोग के हवाले किया जाए, जिसे Neutral Nations Repatriation Commission यानी NNRC कहा गया। इस आयोग में ऐसे देश हों, जो खुद युद्ध में शामिल न हों, जैसे स्वीडन, स्विट्ज़रलैंड, पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया आदि; और इस पूरे तंत्र की अध्यक्षता भारत करे।
योजना यह थी कि युद्धबंदी कुछ समय के लिए तटस्थ निगरानी में रहेंगे। उन्हें दोनों पक्षों की बातें सुनने, प्रचार सामग्री देखने, अपने भविष्य पर विचार करने का समय दिया जाएगा। यह अवधि खत्म होने के बाद उनसे फिर पूछा जाएगा कि वे कहाँ जाना चाहते हैं अपने मूल देश वापस, विरोधी पक्ष के पास, या किसी तीसरे तटस्थ देश में बसना चाहते हैं। जो साफ‑साफ किसी एक विकल्प को चुनेंगे, उन्हें उसी के अनुसार भेजा जाएगा।
इस प्रस्ताव को स्वीकार करवाना आसान नहीं था। पश्चिमी देशों को संदेह था कि भारत कहीं कम्युनिस्टों के प्रति नरम तो नहीं है, वहीं सोवियत संघ और चीन को लगता था कि भारत कहीं पश्चिम के ज्यादा नज़दीक तो नहीं खड़ा है। इन संदेहों के बीच कृष्णा मेनन ने लगातार shuttle diplomacy की वे अरब‑एशियाई देशों से बात करते, कॉमनवेल्थ देशों को समझाते, अमेरिका और ब्रिटेन के प्रतिनिधियों से मिलते, और साथ‑साथ सोवियत और चीनी प्रतिनिधियों तक संदेश भेजते।
1952 में भारतीय प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र महासभा में व्यापक समर्थन मिला। विरोध और संशोधन के बावजूद धीरे‑धीरे सभी पक्षों ने यह महसूस किया कि यही एक व्यावहारिक रास्ता है, जिससे युद्धबंदियों के मुद्दे को सुलझाया जा सकता है। यही प्रस्ताव आगे चलकर कोरिया युद्धविराम का आधार बना।
मार्च 1953 में सोवियत नेता जोसेफ स्टालिन की मौत ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति की हवा कुछ बदल दी। नई सोवियत नेतृत्व टीम कोरिया युद्ध को लंबा खींचने के मूड में नहीं थी। चीन भी समझ चुका था कि लगातार युद्ध उसकी अर्थव्यवस्था और समाज पर भारी पड़ रहा है। इसी माहौल में भारत का प्रस्ताव स्वीकार्य होने की संभावना बढ़ी।
इसके बाद गहन बातचीत का दौर चला। भारतीय फार्मूले और अमेरिकी प्रस्तावों में छोटे‑छोटे संशोधन किए गए, भाषा पर सहमति बनाई गई, और अंततः 27 जुलाई 1953 को कोरिया युद्धविराम समझौते यानी Korean Armistice Agreement पर हस्ताक्षर हो गए। कोरिया में गोलियाँ शांत हुईं, मोर्चे लगभग वहीं जम गए जहाँ आज उत्तर और दक्षिण कोरिया की सीमा है, और एक demilitarized zone बनाई गई, जो आज भी दुनिया के सबसे सख्त सैन्य सीमाक्षेत्रों में से एक है।
इस समझौते के बाद Neutral Nations Repatriation Commission बनाई गई, जिसकी अध्यक्षता भारत ने की। ज़मीनी स्तर पर युद्धबंदियों की देखरेख के लिए भारतीय सेना की एक विशेष टुकड़ी भेजी गई, जिसे Custodian Force of India कहा गया। इस बल का नेतृत्व लेफ्टिनेंट जनरल के.एस. थिम्मैया कर रहे थे, जो बाद में भारतीय थलसेना प्रमुख भी बने। भारतीय सैनिकों ने उत्तर कोरियाई, चीनी तथा संयुक्त राष्ट्र पक्ष के युद्धबंदियों की सुरक्षा संभाली, उनके लिए कैंप बनाए, उनकी काउंसलिंग कराई और उनके निर्णय के अनुसार उनकी वापसी या पुनर्वास की व्यवस्था की।
अगस्त और सितंबर 1953 के दौरान “ऑपरेशन बिग स्विच” नामक अभियान चला, जिसमें हज़ारों युद्धबंदी अपने‑अपने विकल्पों के अनुसार या तो अपने देश लौटे या तटस्थ देशों में गए। कुछ युद्धबंदी ऐसे भी थे जिन्होंने न उत्तर कोरिया वापस जाना स्वीकार किया, न दक्षिण कोरिया में रहना। इन में से एक छोटा समूह भारत आने पर सहमत हुआ। 9 फरवरी 1954 को 76 कोरियाई और 12 चीनी युद्धबंदी इंचॉन से जहाज़ द्वारा मद्रास (अब चेन्नई) पहुँचे और फिर भारत में बसने की प्रक्रिया शुरू हुई। कुछ आगे चलकर अन्य देशों में भी चले गए, लेकिन कुछ भारत में ही रह गए और यहीं की सामाजिक‑आर्थिक धारा में घुल‑मिल गए।
अब सवाल यह है कि “नेहरू ने कोरिया युद्ध कैसे रोका” इसे किस अर्थ में समझें। नेहरू ने न तो अपनी सेना से किसी पक्ष को हराकर युद्ध बंद कराया, न भारत ने अकेले अपने दम पर पूरी लड़ाई रुकवा दी। सैन्य संतुलन तो मैदान में लड़ रही सेनाओं, उनकी थकान और राजनीतिक दबाव से बना। लेकिन यह भी तथ्य है कि जिस राजनीतिक‑कूटनीतिक फार्मूले ने महीनों से ठप पड़ी बातचीत को आगे बढ़ाया, वही भारतीय प्रस्ताव था। युद्धबंदियों की स्वैच्छिक वापसी, तटस्थ आयोग, भारतीय अध्यक्षता और भारतीय सेना द्वारा कस्टडी इन सबको मिलाकर जो रास्ता बना, उसने कोरिया युद्ध के सबसे बड़ी अड़चन को दूर किया। यही वह कड़ी थी जिसके बिना युद्धविराम संभव नहीं था।
इसलिए इतिहासकार यह कहते हैं कि कोरिया युद्ध को रोकने में भारत और नेहरू की भूमिका “पिवट” यानी कुंडी की तरह रही। दरवाज़ा तो कई ताकतों ने मिलकर बंद किया, लेकिन कुंडी वही थी, जिसने उस दरवाजे को बंद खोलने लायक बनाया। गुटनिरपेक्षता की शुरुआती व्यावहारिक परीक्षा वास्तव में कोरिया में ही हुई, और भारत ने नेहरू के नेतृत्व में यह साबित किया कि बिना किसी पक्ष की जेब में गए भी एक देश अंतरराष्ट्रीय शांति में ठोस और निर्णायक योगदान दे सकता है।
(नेहरू रिव्यू से साभार)
